राजनीति में इज्जत आ पांक में सम्बंध

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– जयंती पांडेय

रामचेला बाबा लस्टमानंद से पूछले कि राजनीति में भ्रष्टाचार के अलावा आउर का होला?

बाबा मुस्किअइले आ कहले भ्रष्टाचार त राजनीति के फल होला ओकरा में शामिल ना होला. राजनीति के आपन एगो संसार होला आ ओह में रहेला में इज्जत आ पांक. पांक आ इज्जत जब-जब बिगल जाला, तब-तब राजनीति में तनि गति आवेला. ना त राजनीति पांक भरल नाला अस प्रवाहहीन लउकेला. अइसन राजनीति से लोग बोर हो जाला. नाला के पांक निकल के जब सड़क पर आवेला त, तब कीचड़ के नीचे के धीमा बहाव तेज हो जाला आ बुझाये लागेला कि बहाव केवना ओर जाऽता.

इहे हाल राजनीतिओ के बा. पांक राजनीति के स्थायी भाव ह. राजनीति जहां बा, पांक उहां बा. इज्जत राजनीति के स्वाभाविक अंग ह, काहेकि नेता आ इज्जत के बीच ओसहीं स्थाई स्थायी संबंध ह, जइसन कि राजनीति आ भ्रष्टाचार में होला. माने कि इज्जत बेइज्जत होखला के बावजूद नेता के साथ सटल रहेला. इज्जत, इज्जत ह, भले ऊ कइसनों होखो. चाहे ऊ नेता के हो चाहे केहू अउरी के. इज्जत पर पांक पोतल जा रहल बा. राजनीति में ई बात अक्सर सुने के मिलेला, काहे कि इज्जत आ पांक दूनों राजनीति के स्थाई भाव ह. लेकिन ई जान ल रामचेला राजनीति में अक्सर इज्जत पर पांक ना डालल जाला बलुक इज्जत पर से पांक हटावल जाला.

ई काम जनहित में होला. कहल ना जाला कि जबले इज्जत आ पांक दाबल ढांकल बा तले ठीक लेकिन जब ई ढेर दिन ले दबाइल रहेला त बसाए लागेला. चारू इयोर रहल कठिन हो जाला. ई जान ल कि राजनीति में इज्जत जतने उछली ओतने चमकी. जे लोग एकरा दाबे ला ऊ जमाखोर ह आ रामचेला जमाखोरी पाब्लिक के हित में ना ह.

जले इज्जत एंकाइल रही तले इज्जतदार के असली रुप प्रगट ना होई. ओकर विकास तबे होला जब ओहपर से पांक हट जाला. जब पांक हट जाई त राजनीतीज्ञ नंगा हो जाई आ नंगा आदमी के कवन लाज. राजनीति में जेकर इज्जत दागदार नइखे ऊ दमदार नईखे. एही से पांक ‘आप’ पोते चाहे आप पोतीं. लेकिन राजनीति वालन के असली रूप सामने आवे के चाहीं.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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