• गंगा प्रसाद ‘अरुण’

जा हो निझाइल जवानी! एह भरल बसंत के भोरहरिया में इयादो आवे के रहले त रामेटहल काका आ कपार पर चकरघिन्नी खात उनकर कहटर पुरान! असल में अभी निनिआइले रहीं कि सुतले-सुतले सुरता पर चढ़ गइले भोजपुरी के अमर गायक खलील जी अपना पूरा लय-सुर में भोलानाथ गहमरी जी के सरब सुखकर गीत- ‘प्रीत में ना धोखा देई, प्यार में ना झाँसा, प्यार करीं अइसन जइसे कटहर के लासा’ – प्रीत-परेम के एगो अजगुत बरनन। आ एह फागुन में के ना प्रीत-परेम के इयादे से बिखिया जाला! अइसहूँ त कहल जाला ‘भर फागुन बुढ़वा देवर लागे’ आ ‘बासियो कढ़ी फफा जाय फगुनहटा के आँच लगले’। फेर ई ‘कटहर के लासा, केकरा के नहिं फाँसा?’

अबहीं परेम-वरेम के परे धरीं, कटहर से हमार परेम खानदानिए हऽ। हमार बाबा रहलीं पूरा-पूरा कटहरिया। कतहूँ कवनो गाछ पर लेंढा लउकल ना कि ‘गाछे कटहर, ओठे तेल’ अइसन उनका मन पर चढ़ जाय कटहर। अइसे ऊ बड़ा गेआनी रहले आ हरमेसे कहत रहलें- ‘कटहर हऽ केहू खातिर ‘कष्टकर’, त केहू खातिर ‘कष्टहर’’ – बाबा खातिर त पूरा-पूरी ‘कष्टहर’। आ एह कटहर-प्रेम के कई-कई प्रेरक-पीड़क प्रसंग आइल हमरो जिनिगी में। गहमरी जी ई गीत गवला-बजवला से त एकबेर हमरा पड़ोसिये से कहासुनी-तनातनी हो गइल – ‘का दो उनकर सेआन लइकी के देख के ई, उनका विचार में, फूहर गीत पर हमार साहित्यिक साथी लोग के गोल अलगे धुमगज्जर मचवले बा।’ जाकी रही भावना जैसी! छोड़ीं एह बतंगड़ के – ‘ग्वाल बेचारा बिरहा टेरे, भँइस बइठ पगुराय’।

अब देखीं ना, हमरा सोचावट के अमावट पर लाल मिरचाई के झाल आ गइल। कहानी त शुरू भइल रामटहल काका से कहाँ बीच में ‘जिनि करुना मँह बीर रस, आइ गएउ हनुमान’ अइसन टपक पड़ले गहमरी जी। रामटहल काका के सुरता पर चढ़़ले बरबस उनका बगान में तब विराजमान कटहर के ऊ फेंड़ इयाद में दोल्ह मारे लागेला आ तब हमार रामटहल काका सुघर-निखर के ‘रामकटहल’ काका हो जालन। हिन्दी से भोजपुरी में आवत-आवत कटहल ‘कटहर’ हो जाला। ई कटहर ‘वैष्णव’ लोगन खातिर फगुआ के दिने माँस-मछरी-मुरगा से कम ना होखे। ओह दिन उनका मनसा में कटहरे के लहार-बहार। पता ना कइसे हाथ के अँगूठा एकर प्रतीक-पर्याय बन गइल- ‘अब का लेब, बाबाजी के कट (कटहर)’!

एह कटहर-प्रसंग में रामटहल काका के लंगोटिया इयार मुरली बाबू के इयाद कइसे ना आवे? असल में काका के गाछ से कटहर के जतना मूअल लेंढ़ा गिरे, सब चुन-बचा-जोगा के राखल जाय उदारतापर्वूक मुक्त-हस्त से बाँटे खातिर। कहल गइल बा- ‘उधिआइल सातू पितरन के’ आ ‘सूखल सीठी, पंडीजी के लीटी’

बूझ जाईं भाई साहेब कि कटहर के मूअल लेंढा के उदरदानी रहलें काका। मजाल कि ऊ गाछ के साबुत कटहर दे देस केहू के! घरहीं में रहबत ना होइत। एक बेर बंदी-करफू के बेर सब्जी-भाजी के ना मिलला के चलते आ गइलन, एक जाना दाँत चिहरले- ‘एगो कटहर मिल जाइत त…..’। ऊ का बोलतें, उनकर बडक़े बेटा बोल गइल- ‘फलना परसाद, जानत नइखऽ, सब कटहर पाके खातिर नूँ छोड़ल जाला!’ – आ फलना परसाद के बोलती बंद। अइसे मालूम होत रहे एने ओने से कि भर-भर बोरी कटहर पार्सल होला गाँवे, बस से चुपका चोरी। डिठार में त बस वाला का दो लदबे ना करेलन स कटहर।

हँ, त भर झोरा मूअल लेंढ़ा एक बेर अपना लंगोटिया दोस्त मुरली बाबू के जबरदस्ती धरवलें- ‘ले जा मुरली, आज तोहरो चुहानी गमके।’ मुरली बाबू उछाहे घरे अइलें- ‘सुनत बाड़ू, रामटहल भाई ई कटहर दिहले ह। तनी परेम से बनइहऽ एकरा के।’ मरल लेंढ़ा देखते मेहरारू के मन मउराइल- ‘एजी, ई कुल्हि त मरल-सरल बाड़े स, एकर तीयन-तरकारी के त तेलो-मसाला बरबादे होई।’ अब गरमइले तनी मरुली बाब-ू ‘तोर बाप-दादा खइले बाड़न कबो कटहर! रामटहल भाई जतना परेम से देले बाड़न, ओतने परेम से बनावऽ एकरा के।’ बेचारी अनबोलता धन का करस! बनवली आ परोसली डबलाहे मुरली बाबू के। पहिला टूक मुँह में डालते मुरली बाबू झवान- ‘ई त अरघाते नइखे हो, ठीके कहत रहलू तूँ।’ उनकर गइयो ओह कटहरदम के सूँघिये के भाग गइल। तब से रामटहल भाई मुरली बाबू के नजर में ‘हरामकटहल’ गोसाई हो गइलन।

खैर, कटहर पाके के समय आ गइल- पाकल के भोज के जोगाड़ भइल- ‘पांडेजी, रउरा अपना घरे से पूआ पकवा ले आइब, दस-पनरह आदमी खातिर। कटहर के कोआ हम ले आइब। भाँग रहबे करी। चाननी रात में पहाड़ी पर पिकनिक के चनन-मनन रही। मन के मूअल मुरली बाबू के माथे छोटहन तसली में कोआ के जिम्मेदारी। पांड़े जी के कठवत भर पूआ। सभे भंग के तरंग में गोताइल। एकक आदमी के हिस्सा में दुदुइयो गो कोआ ना। पांड़े जी के पुअवे सम्हरलस ओह पिकनिक के।

’‘का मुरली भाई, अइसन बहार में, एक मधुर-मदिर बयार में आ ऊपर आसमान में खिलखिलात चाननी के लहार में कवनो गीत-गवनई ना होई।’ अब भला मुरली बाबू से अड़ाव! अपना ‘रामकटहल’ के आदेश पर, पिहिंक उठले- ‘चान निकलल, चननिया निकलल, बाकिर नाहीं निकलल रे कटहरिया’ – ‘हवा डोलल, बेयरिया डोलल, बाकिर नाहीं डोलल रे कटहरिया’ – हई निकलल, हऊ निकलल, बाकिर नाहीं निकलल रे कटहरिया-कटहरिया-कटहरिया’ – भंग के तरंग में मुरली बाबू के दिल-दिमाग पर जइसे कटहरिया छोड़ के अउर कुछ रहले ना रहे। देर रात के ओह पिकनिक के सराहत-सरापत सभे अपना-अपना घरे। हँ, अतना त भुलाइये गइलीं कि पाकल कटहर के मुंगड़ी आ कोआ के बीया घरहीं रखा गइल रहे रामकटहल जी के, – दू-चार साँझ तीयन-तरकारी के उबार होई।

‘हरि अनंत, हरिकथा अनंता’ अइसन र्इ कटहरो पुरान अनंते रहित, बाकिर अइसन भइल ना। केहू सलाह दिहल रामकटहल काका के कि समय-समय पर कटहर के फेड़ के डेहुंगी-टहनी के जतने छेंवटल जाय, ओह में ओतने बतिया-लेंढ़ा लागी। आ ऊ कके का जे जादे से जादे लाभ पावे के सुझाव बूझ ना पावे। आदमी एह काम पर लगावल गइल आ गाछ के डाढ़े-डेहुँगी काहे, ओकर फुलुंगी-मथेला तक छेंवटा गइल। कटहर के गाँछ त अपने टुनुकाह, फिर कवनो गाँछ त पतइये से नू आपना भोजन बनावेला। जादे फरावे के लोभ में गछिये सुखा गइल आ एह अनन्त कटहर-परुान के एगो दुखद अंत हो गइल। रामकटहल काका के जिनिगी भर एकर अफसोस रहल।


लेखक संपर्क – 21बी, रोड-1, जोन-4, बिरसानगर टेल्को, जमशेदपुर – 831019

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