प्रेमचंद समाज के हर पहलू के जवन सूक्ष्म चित्रण कर गइल बानी, सहज सरल रूप में जवन आईना सबका सामने रख गइल बानी, ऊ अद्भुत बा. आज के समय में भी उहाँके लिखल तमाम रचना ओतने समसामयिक बा. भाई-बंधू के ताना बाना पर भी प्रेमचंद बहुत खूब लिख गइल बानी. उहें के लिखल अत्यंत लोकप्रिय रचना “बैर का अंत” के भोजपुरी रूपांतरण “बैर के अंत” के मंचन विगत 31 मार्च के मुक्तधारा प्रेक्षागृह में रंगश्री द्वारा भइल. नाटक के परिकल्पना अउरी नाट्य रूपांतरण रंगश्री के संस्थापक महेंद्र प्रसाद सिंह जी कइनी.
ई धरती पर सभ्यता के रचे-बसे के साथे भाइयन के बीच जर,जोरू अउरी जमीन के अलावा कई कई बातन के ले के खीसा-खीसी चलत आवता.”महाभारत” के त रचना ही हो गइल राज्य अउरी सिंहासन पर आपन हक खातिर. गांव जवार में बड़-बूढ़ लोग कहबो करेला कि “आज तक कही दूगो भाई एक साथे रहल बा !”
नाटक ऊ ना होला,जवन नाटक देखे के बेरा,नाटके लागे.अच्छा नाटक ऊ होला जवन देखे के बेरा आपन कहानी, आपन दुखड़ा,अपने घर-गृहस्थी,गांव-गिरांव के रोजमर्रा के स्वाभाविक दृश्य लागे. कुछ अइसने अनुभव प्रेक्षागृह में बइठल दर्शक लोग के ई नाटक देखत समय भइल.
नाटक के सुरुआत एगो निर्गुण “मनवा ,तू जइबे हम जानी रे मनवा” से होता.साँची बात बा नू, अंतिम गति के जानकारी त सबके होला, बाकिर तबो हमनीके कवन ताना-बाना में उलझल रहेनी.बेकार के आपा-धापी, चक्र-कुचक्र, षड्यंत्र के जाल अउरी फेरु ए सब के परिणाम..क्रोध-मोह, लोर- बिछोह..ईहे नू जिनगी हऽ अउरी ईहे देखावल गइल बा ई भोजपुरी नाटक “बैर के अंत” में.
भाई, भाई के बैरी हो जाला.माई के हाथ से भात के कौर साथे खाये वाला भाई जमीन खातिर भाई के दुस्मन बन जाला,छल करेला, जमीन हथियावे के सब हथकंडा अपनावेला..कवनो तरस ना खाला भाई पर,बाकिर अंत समय में जब काल के एहसास होला त ओही भाई के दुआरी टुकुर-टुकुर ताकेला. छोट भाई बिसेसर राय(ठाकुर उपेन्द्र सिंह) के छल से बड़ भाई रमेसर राय (अखिलेश पांडे) के करेजा छलनी छलनी हो जाला. टूटल भरोसा छोट भाई के मौत के बादो जुड़ नइखे पावत. कड़वाहट के बीज कबो नेह ना उगाई.नाटक के मुख्य पात्र रमेसर के बेटा जोगेसर (सौमित्र वर्मा) के दर्शक लोग आपन ताली से खूब नवाजल.एक ओरी चाचा से जमीन खातिर बदला के आग में जलत जोगेसर,तऽ दोसरा ओरी ओही चाचा के मौत के बाद उनकर कुल परिवार के आगे बढ़ के अपना अक्वारी में ले लेवे वाला जोगेसर.. दुनू रूप के बखूबी निभावत ई किरदार मंच पर छा गइल. समय एगो विधवा के, के तरे दुनिया से लड़े खातिर कठ-जुबान बना देवे ला..पति के ना रहला पर , लइकन के सुरक्षा खातिर एगो विधवा के मन मे पटीदार से डर-शक के तरे घर कर जाला..वीणा वादिनी द्वारा बखूबी अभिनीत भइल. पइसा पा के बहिन (रश्मि पाण्डेय) भाई के दुख दर्द ना समझ के कन्नी काट लेतारी..रिश्ता नाता के तरे पइसा के मोल बिकाता..एह नाटक में बखूबी देखावल गइल बा. मर्द लोग के लड़ाई में घर के मेहरारू के बात कवनो महत्व के ना रह जाला,एह रूप में कल्पना मिश्रा, जोगेसर के पत्नी के किरदार में निभावल गइल.आपन सान खातिर खेत अउरी घर त रेहन रखाते बा, घर के एक एक जेवर भी बन्हकी धरा जा ता. ग्रामीण, महाजन अउरी बाल कलाकार लोग भी अपना अपना किरदार के बखूबी निभावल.
सब किरदार मंच पर सहज रूप में प्रस्तुत भइल लोग. नाटक के रूप रेखा कसल रहल अउरी प्रकाश आ ध्वनि के बढ़िया संयोजन देखे के मिलल. प्रेमचंद के अनेक कहानी गाँव के पृष्टभूमि पर लिखल गइल बा.अगर नाटक के रूप में एही तरे हिंदी साहित्य के नाटकन के भोजपुरी में मंचन होई , चाहे भोजपुरी के प्रसिद्ध नाटकन के हिंदी अनुवाद कर के मंचन होई, त ई उल्लेखनीय काम होई.
रंगश्री के तमाम कलाकार, एह नाटक में शामिल हर एक पात्र के बधाई..शुभकामना. भोजपुरी के सेवा होत रहो..माई भाषा के कारवा चलत रहो.