(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 19वी प्रस्तुति) – अनन्त प्रसाद ‘रामभरोसे’ भोजपुरिहा कतनो परेशानी में रहिहन, मोका पावते केहू से हँसी-मजाक करे से बाज ना अइहन. केहू के रिगावल आ रिगला पर लिहाड़ी लिहल, एने का लोगन के एगो मनोरंजन के साधन ह. मान लीं केहूपूरा पढ़ीं…

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(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 18वी प्रस्तुति) – विनोद द्विवेदी (एक) रोगी ले ढेर बैद मुहल्ला में रिंकू सिंह के बोखार लागल त पड़ोस के कई लोग देखे पहुँचल. केहु कहल काढ़ा, केहु कहल क्रोसिन आ केहू हकीम जी के चटनी चाटे के सलाह दिहल. रामबरतपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 17वी प्रस्तुति) – गदाधर सिंह हम ओह राति में अधनिनियाँ में रहीं. अचके में हमार खटिया हिलल, खट-पट भइल आ हमार आँखि खुलि गइल. हम का देखतानी कि हमरा खाटी के ठीक लगे एगो पाँच-छव बरिस के कमनीय काया खाड़ बा.पूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 16वी प्रस्तुति) – गिरिजा शंकर राय ‘गिरिजेश’ गांव में प्राइमरी स्कूल खुलते चारो ओर खुशी के वातावरण छा गइल. एकरा ले पहिले सब डेढ़गांवा जात रहे. जहिया ना जायेके मन करे कोइरिया का संऊफ का खेत में घुसके सब बइठ जायपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 15वी प्रस्तुति) – आशारानी लाल जब ना तब हमके बइठल देख के ऊ हमरा सोझा धमक जाले. दूर से चलल-चलल आवेले एही से थाकलो लउकेले. ओकरा तनिको अहस ना होला. इहो ना सोचेले, कि बड़ लोगिन के सोझा चाहे हमा-सुमा केपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 14वी प्रस्तुति) – राजगुप्त (एक) पान खइनी, गुटका-गुटकी ट्रेन अपना रफ्तार से दउड़त रहे. गर्मी के दिन ऊपर से बहुते भीड़ि रहे. सज्जी पसिन्जर गर्मी से बेहाल रहले. एही बीचे एगो चना बेचत अदिमी भीड़ि के चीरत आइल. पेट पर खाँचीपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 13वी प्रस्तुति) – कृपाशंकर प्रसाद प्रकाश आ हम कइ बेरि होटल में संगे संगे होटलियवले रहनी जा। जब मांसाहार करे के होखे तबे होटलियाईं जा – ‘ई खस बात रहे।’ शुरुए से हम मार्क करत रहली कि जब मछरी भत खईंपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 12वी प्रस्तुति) – आनन्द संधिदूत ओनइसवीं सदी के आखिरी दशक आवत-आवत ददरी के मेला बलिया में एगो दुर्घटना घट गइल. भइल ई कि कातिक के प्रमुख नहान आ बकरीद एके दिन पड़ गइल. नतीजा ई भइल कि हिन्दू-मुसलमान दूनो का हामाहूमीपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 11वी प्रस्तुति) – मनोकामना सिंह शाम के, घर लवट के अइला पर देख के चेहरा उदास पूछली माधो के मेहरारू रउरा मुँह काहे लटकवले बानीं? बंगला के पाँच अस बनवले बानीं ? कहलें माधो, ”का कहीं, कपार बथऽता टन-टन करऽता“! ”अजीपूरा पढ़ीं…

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 10वी प्रस्तुति) – गंगा प्रसाद अरुण नानी हो, बहुते इयाद आवेला तोहार खास करके तब जबकि पापा-मम्मी दूनो लोग चलि जाला अपना-अपना आफिस-स्कूल बन कइके हमनी के ताला में. जानेलू, घर में कबो-कबो आ जालें स नेउर-बिलाई आ डेरा जाइले हमनीपूरा पढ़ीं…

(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 9वी प्रस्तुति) – रामजी पाण्डेय ‘अकेला’ ‘किरण’ जी का बारे में, हमार छोटकी चाची जे बसाँव के स्व॰ बृजा ओझा के बेटी हई, बतवली कि – ‘बैरी के ‘गनेशदत्त तिवारी’ भोजपुरी में बड़ा निमन कविता लिखेलेपूरा पढ़ीं…