– जयंती पांडेय सड़क दुर्घटना में एगो वरिष्ठ नेता के मृत्यु हो गइल. उनकर देह तऽ खैर देश के अमानत रहे, से चारू ओर शोक मनावल जात रहे लेकिन नेताजी के आत्मा के देवदूत लोग स्वर्ग के दुआर पर ले आई के खड़ा कऽ दिहल लोग. दुअरा पर एगो सीनियरपूरा पढ़ीं…

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– जयंती पांडेय ई जान जा भाई, मूस चाहे जवना पार्टी में होखो बाकिर सलाह दिहला से बाज ना आवे. ऊ अपने चाहे जवन करऽ सन बाकिर ई ना चहिहें सन कि लोगो ऊहे करो. अइसने एगो मूस जंगल में भाषण ना दे के सलाह दिहला के सरकारी मिशन परपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय ओह दिन जब भगतजी मुअले, तऽ सबलोग कहऽल – भगतजी स्वर्गवासी हो गइले. पर अब मालूम भइल कि भगतजी, स्वर्गवासी ना, नरकवासी भइले हंऽ. हम कहब तऽ केहू मानी ना, पर इहे सही हऽ कि उनका नरक में डाल दिहल गइल बा आ उन पर अइसन जघन्यपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमा नंद के दुअरा पर सबेरहीं पहुंचले रामचेला. बाबा मालगोरू के नादे पर बान्ह के जब फुरसताह भइले तऽ रामचेला के लगे आ के बइठले. रामचेला पूछले कि बाबा हो! ई जमाना के साथ कइसे चलल जाउ. लोगवा कहऽ ता कि जमाना के साथ चलऽ. आखिरपूरा पढ़ीं…

– जयंती पांडेय रामनिहोरा. ऊ गांव -जवार के बड़ा पुरान नेता हवें. कौ हाली तऽ परधानी जीत भइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद के दुअरा पर अइले. बाबा बैलन के सानी पानी दे के गोबर- गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽ तारऽ ? बसपूरा पढ़ीं…

– जयंती पाण्डेय महंगी के बढ़े में सरकार के कवनो दोष नइखे. महंगी के काम ह बढ़ल. अगर ऊ ना बढ़ी त केहु ओकरा ना चीन्ही, ना पूछी. सोसाइटी में रहे वाला हर बेकती आपन एगो पहचान राखेला. महंगी भी इहे रास्ता पर चलेले. महंगी लोगन के अभाव में जीयेपूरा पढ़ीं…

राम निहोरा अपना गाँव जवार के बड़ा पुरान नेता हउवें. कौ हाली त परधानी जीत गइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद का दुअरा पर अइले. बाबा तब बैलन के सानीपानी दे के गोबर गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽतारऽ? बाबा जबाब दिहलें, बस दूपूरा पढ़ीं…

– जयन्ती पाण्डेय पिछला दिने लस्टमानन्द दिल्ली गइल रहलन. का कहीं का नजारा रहे. जब से दिल्ली में मेट्रो रेलगाड़ी चले लागल तबसे ओहिजा का लोगन का जिनिगी में बहार आ गइल बा. कालेज जाये वाली बबुनी के रोमांस करे के एगो नया जगहा भेंटा गइल बा. अब जब बबुनीपूरा पढ़ीं…

– जयन्ती पाण्डे रउआ कहीं चल जाईं, भारत के कवनो कोना में. सब जगहा रउआ पत्थर दिल के लोग भेंटाई. आखिर काहें ना? जेकरा पर जिम्मेदारी बा कि ऊ सबके आदमी बनाई. ओकरो दिमाग में पत्थरे भर गइल बा. हँ, बात मास्टर लोग के कइल जाता. आज के मास्टर लोगपूरा पढ़ीं…

– जयन्ती पाण्डे वइसे त कलकत्ता शहर के बड़ाबाजार के सेठ अमीरचंद का लगे बहुत दौलत रह, करिया आ सफेद दूनो. कारोबारो कई गो रहे. जायज कम आ नाजायज बेसी. धन रहे त नाँवो रहे चारू ओर. समाज में रुतबा रहे. तबो अमरचंद के बुझाव कि कवनो ना कवनो कमीपूरा पढ़ीं…

– जयन्ती पाण्डे बाबा लस्टमानंद से राम चेला पूछलें कि बाबा हो, लक्ष्मी के भंडार, माने जे सरकार के खजाना कहल जाला ऊ असल में कहाँ रहेला? महँगाई में सबसिडी देबे के होला त सरकार अंगूठा देखा के कह देले कि खजाना खाली बा, कहाँ से दिआई? बाबा कहलें, खजानापूरा पढ़ीं…