जे भोजपुरी में, भोजपुरी खातिर, बिना लोभ-लालच आ मान-प्रतिष्ठा के परवाह कइले बरिसन से चुपचाप रचनात्मक काम कर रहल बा आ कइले जा रहल बा, ओके नजरअन्दाज कइ के, एक-दूसरा के टँगरी खींचे वाला ई कथित भोजपुरी-हित चिंतक मठाधीशे लोग बा। हमरा त चिंता होला कि भोजपुरी के कबो अगर मान्यता मिल गइल आ ओकरा नाँव पर पढ़े-पढ़ावे भा पुरस्कार-सम्मान के इन्तजाम होइयो गइल त ओकरा बाद के स्थिति केतना बिद्रूप आ भयंकर होई? तब त एक दोसरा क कपार फोरे में ना हाथ लउकी, ना ढेला।

Advertisements

– शिवजी पाण्डेय ‘रसराज’ हम गरीबने पर अइसन, अन्हेर काहें? देहि धुनलो पर खइला में देर काहें? दिन भर करत-करत काम, झाँवर हो गइले चाम, छिन भर देहिया के सुबहित ना, मिलले आराम, नीक कइलो पर विधना क फेर काहें? का अंजोर का अन्हार, एकही लेखा हमार, कबो सूखा केपूरा पढ़ीं…

– शिवजी पाण्डेय “रसराज” हाथ जोरि करतानी बिनति तहार, मईया शारदा. सुनी लिहितू हमरी पुकार, मईया शारदा.. गरे कुंड हार शोभे, श्वेत रंग सारी, नीर क्षीर जाँचे वाला हंस बा सवारी, बीनवा बजाई के जगइतू संसार, मईया शारदा. सुनी लिहितू हमरी पुकार, मईया शारदा.. अन्हरी रे अँखिया अछरिया देखवलू, सूरपूरा पढ़ीं…