– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी बियहल तिरिया के मातल नयनवा, फगुनवा में ॥ पियवा करवलस ना गवनवां, फगुनवा में ॥ सगरी सहेलिया कुल्हि भुलनी नइहरा । हमही बिहउती सम्हारत बानी अँचरा । नीक लागे न भवनवा, फगुनवा में ॥ पियवा ….. पियराइल सरसों, मटरियो गदराइल । फुलल पलास बा महुअवों अदराइलपूरा पढ़ीं…

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– अशोक द्विवेदी फागुन बाट ना जोहे, बेरा प’ खुद हाजिर हो जाला. रउवा रुचेभा ना रुचे, ऊ गुदरवला से बाज ना आवे. एही से फगुवा अनंग आ रंग के त्यौहार कहाला. राग-रंग के ई उत्सव, बसन्त से सम्मत (संवत् भा होलिका दहन) आ होली से बुढ़वा मंगर ले चलेला.पूरा पढ़ीं…

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी होरी आइल बा जरत देश बा-धू धू कईके सद्बुद्धि बिलाइल बा. कइसे कहीं कि होरी आइल बा. चंद फितरती लोग बिगाड़ें मनई इनकर नियत न ताड़ें मगज मराइल ए बेरा मे भा कवनों चुरइल समाइल बा. कइसे कहीं कि होरी आइल बा. बुढ़ पुरनियाँ लईका औरतपूरा पढ़ीं…

– डा. अशोक द्विवेदी छोट घर-बार में हमहन क, अब समाव कहाँ नेह ऊ बा कहाँ अपनन में, ऊ लगाव कहाँ जीउ टेघरे लगे गैरन के लोर चुवला पर अब भला गाँव के लैनू नियर सुभाव कहाँ बा खनक दाम के, अइँठन बा कुछ कमइला के यार पहिले नियर उपूरा पढ़ीं…

– बलभद्र सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा बेंचा गइलें स बैल दुआर कुछ दिन रहल उदास बाकिर सन्तोषो ई कम ना रहल कि अतना जोतइला के बादो निकल गइल दाम गहँकी अइलें स तय भइल दाम धरा देल गइल पगहा पगहा धरावत दाम धरत माथ पर गमछा धइल नापूरा पढ़ीं…

– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ सीमा के पाती, बॉंची जा एह चिठ्ठी में चीख बा। दिल्लीवालन भूल ना जाईं समाचार सब ठीक बा।। धान-पान सब सूख गइल बा खेत-मजूरा चूक गइल बा। पेट-पेट में कोन्हू नाचत हियरा-हियरा हूक गइल बा। घर में कहॉं बचल अब दाना? एक आसरा भीख बा समाचारपूरा पढ़ीं…

– ऋतुराज आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। चोरी, हत्या, गरीबन के लूटल होखेला रोज कुछ बलात्कार पढ़ेनीं।। आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। तेज हो रहल विकास पढ़ेनीं उठ रहल भरोसा-विश्वास पढ़ेनीं। सड़ रहल गोदामन में अनाज भूख सेपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ सन् 1976-77 में, जब हम गाँव के प्राथमिक विद्यालय में तीसरा-चउथा के विद्यार्थी रहीं, ओह घरी हर सनीचर के अंतिम दू घंटी में सांस्कृतिक कार्यक्रम होखे. ओकरा में हमनी कुल्ह विद्यार्थी इयाद कइल / ईया,दादी,नानी वगैरह से सुनल-सिखल कथा – कहानी, कविता – गीत, बुझउवल-पूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ कलाम के शत शत नमन माथ ऊँचा हो गइल दुनिया में भारतवर्ष के सफल परमाणु परीक्षण बा विषय अति हर्ष के देश का ओह सब सपूतन के बधाई आ नमन जिनका पाके आज पवलस राष्ट्र एह उत्कर्ष के. शांति निरस्त्रीकरण के पक्षधर ई आजो देशपूरा पढ़ीं…

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ लोर ढारत निहारत रहे राह जे, ओह अँखियन से पूछीं ह का जिन्दगी। पाके आहट जे दउड़ल दरद दाब के, ओह दिल से ई पूछीं ह का जिन्दगी।। पीड़ पिघले परनवा के जब जब पिया हिया हहरे मिलन लागी तड़पे जिया सुहाग बनके जे मँगियापूरा पढ़ीं…

– अशोक कुमार तिवारी जीए द जनता के चाहे गरदन जाँत मुआव, हटे देश बपौती तहरे जइसे मन चलावऽ. स्वास्थ सड़क शिक्षा तीनोें के धइले बा बदहाली, तोहरा एकर कवन फेर बा काटऽतारऽ छाल्ही. एहिजा जरे बदन घाम में, ओहिजा चले एसी, इहाँ तियन से भेंटे ना बा, उहवाँ मुरगापूरा पढ़ीं…