ओमप्रकाश अमृतांशु

KabiraKhadaBazarMe
मंच पे काशी के बाजार . एक ओर मस्जिद, बीच में मंदिर, किनारे में छोटहन फूस के झोपड़ी. झोपड़ी पे पसरल अंजोर, जहंवा कबीर आ उनकर मतारी नीमा के संवाद चलत बा.

नीमा – आज बाजार में का भइल रहे ?
कबीर – मुसुका के कुछुओ ना माई. दोकान में सेठिया सुतल रहे. हम सोंचलीं जाग जाई त थान बेचे के बात करब. देखलीं ओने दू गो कसाई एगो गाय के बन्हले जात रहलें सं. पीछे-पीछे गाय के बछड़वो जात रहे. हमके बहुते बुरा लागल.
नीमा- आ तु बीच में कूद पड़लऽ.
कबीर- ना त. हम ओकनी से कुछु ना कहलीं. बाकिर, हमरा एगो कवित सूझ गइल. हम खड़े-खड़े कवित कह देहनी, माई.
नीमा- लोग तोहार कवितन से चिढ़ेला त तू काहे कहेलऽ ? का कहले रहलऽ ?
कबीर- हम कहलीं –
दिन भर रोजा रहत है, रात हनत है गाय .
यह तो खून से बंदगी, कैसे खुशी खुदाय ..

कबीर पढ़ल-लिखल ना रहतो बहुते विद्वान रहन. पन्द्रहवी शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली आ प्रभावशाली आदमी रहन. उ मुसलमान होइओ के मुसलमान ना रहन आ हिन्दू होइओ के हिन्दू ना. घूम-घूम के हिन्दू-मुस्लिम लोगन साथे सत्संग करत रहन. एही से उनकर रूझान निर्गुण उपासना के तरफ हो गइल रहे. कबीर हिन्दू-मुसलमान दुनो के कुप्रथा आ बाहरी आडम्बर के खुल के विरोध कइलन. कबीर के भाषा के खिचड़ी आ साधुक्कड़ी कहल जात रहे.
माला पहन तिलक लगाया, लंबी जटा बढा़ता है .
अंतर तेरे कुफर कटारी यूं नही साहिब मिलता है ..

कबीर के फक्कड़पन से प्रेरित होके रचनाकार भीष्म साहनी उनकरा उपर नाटक लिखलन जेकर नाम हउए ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ जवन हिन्दी रंगमंच पे खूब सराहल गइल. नाटक के मंचन पहिला बेर दिल्ली में त्रिवेणी के खुला नाटक गृह में भइल.

kabira2पिछला दिने ग्यारह मार्च दिल्ली के एल. टी. जी. आडिटोरियम, मण्डी हाउस, नई दिल्ली, रंगश्री के बैनर तले एह नाटक के रस भोजपुरी में चखे के मिलल. अइसे त एह नाटक के भाषा हिन्दी में बा, बाकिर कबीर बनारस के रहन. उनकर भाषा भोजपुरी-अवधी रहे. नाटक में उनका समय के धर्मान्धता, अनाचार, तानाशाही वगैरह के सामाजिक परिपेक्ष्य में उनकर निर्भीक, सत्यान्वेषी, प्रखर व्यक्तिव के देखावे के कोशिश बा. नाटक के जीवंत बनावे खातिर जेतना कलाकार लोग अभिनय कइल, से सराहे जोग रहल. सौमित वर्मा कबिरा के भूमिका में साक्षात कबीर बनके सामने अइलन. धारा प्रवाह संवाद आ अभिनय के गहराई में गोता लगा के दर्शकन का सामने अपना आप के कबिरा साबित करे के प्रयास कइलन. कोतवाल के भूमिका में अंकुर के सिर हमेशा उँचा रहल. जहंवा अखिलेश कुमार कायस्थ के रोल में रम गइलें, ओहिजे नुरा आ भिखारी के भूमिका निभावे में दीपक कुमार कवनो गलती ना कइलन. दिलीप कुमार चौरसिया जुलाहा बनके खूब सराहल गइलन, त महंत के भूमिका में निर्देशक महेन्द्र प्रसाद सिंह खूद नजर अइलन. साधु के भेष में रविकांत आ चोबदार बनल आदर्शो आपन जिम्मेदारी संभरलन. रैदास के अभिनय खातिर धीरेन्द्र कुमार के चुनल बढ़िया रहे. अधिकारी एक योगेश कुमार, शेख आ अधिकारी दू राकेश कुमार, सेना रवि शंकर तिवारी, पीपा योगेश कुमार, बशीरा ललित कुमार, भक्त मुन्ना कुमार, सिपाही एक शैलेन्द्र यादव आ सिकन्दर लोदी के अभिनय में अवधेश कवनो कसर ना छोड़लन. स्त्रीओ पात्रन के भूमिका दमदार रहल. नीमा कबीर के माई के अभिनय रजनी सिन्हा कइली. लोई के भूमिका में महिमा, आन्हर भिखारिन मीना राय आ गाँव के औरत लोगन में सुचित्रा सिंह, अंजू सिंह आ आरूषि के सभे देखल.

रूप सज्जा बलवीर सिंह रावत, रश्मि गोदरा के रहल. प्रकाश व्यवस्था में योगेश कुमार आ अशोक नागर के, त मंच के सजावट राजेश दुआ आ संजय कुमार शाह लोग मिलके कइलस. संगीत संतोष मिश्रा, सुशांत मिश्रा, एस के उपाध्याय के नीमन लागल. पार्श्व ध्वनि शोभा मिश्रा, बिन्द्रा, कृष्णा, बजरंगी के कंठ से निकलल.

रंगश्री के संस्थापक महेन्द्र प्रसाद सिंह के निर्देशन में एह नाटक के मंचन बहुत सार्थक रहल. एह नाटक के भोजपुरी रस में सराबोर करके मंचन करे खतिर रंगश्री के संउसे लोग बधई के पात्रा बा. जय कबिरा !

जय भोजपुरी ! जय भारत!

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