नीक-जबून-13

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

बाबूजी के याद कइल अंधविश्वास हटे ?

ओइसे त हर साल पितृपक्ष पर अपना तथाकथित विद्वान मित्र लोगन के टिप्पणी कहीं ना कहीं पढ़त रहींले बाकिर एह साल त मन एकदमे भन्ना गइल. लोग नवका पीढ़ी के का सिखा रहल बाड़े ? बाबूजी के याद कइल अंधविश्वास हटे ? आजु- काल्हु माई-बाप का प्रति लोगन के जुड़ाव कम हो रहल बा, वृद्धाश्रम जइसन संस्था के संख्या देश में बढ़ल जात बा, त ओकर जिम्मेवार के बा ? ईहे तथाकथित पढ़ल-लिखल लोग, जे अपना हर परंपरा आ शास्त्रोक्त बिधि-बिधानन के जब तक धज्जी ना उड़ा लेला, तब तक उनुका पेट के पानी ना पचे. हिंदू धर्म के ऊ हर परंपरा जवन अभी तक ‘रूढ़ि’ नइखे भइल, हमनी के पारिवारिक, सामाजिक आ वैश्विक संबंधन के सुरक्षा प्रहरी के काम करेले. साल में एक बेर अपना माई-बाबू का सङही दिवंगत घर-परिवार के बूढ़-पुरनिया, मामा घर आ ससुराल पक्ष का लोगन के याद कइल अंधविश्वास हटे ? मति जाईं किताबि का भीतर, अपनहीं सोचीं कि पारिवारिक आ सामाजिक समरसता के एह वैज्ञानिक चेतना के कवनो जोड़ बाटे ? कुछे हप्ता पहिले अपना छोट जाना के बुखार का चलते राति भर हमरा पसेना में थक-बक होके जगरम करेके परल आ अगिला दिन छुट्टी लेबेके परल. ईहे होला बाप, जवन अपना बाल-बच्चा के सुरक्षा खातिर पहाड़ बनिके खड़ा हो जाला. ओकरा बितला का बाद जो घर-परिवार में बाँचल केहूँ ‘आपन’ ओकराके याद करता त ई अंधविश्वास हो जाई ?  त ‘विश्वास’ माने का होला ?  छितराइल, वितृष्णा, नफरत, वैयक्तिकता के दंभ ?  आरे भाई, अइसहीं एक पीढ़ी से दोसरा पीढ़ी तक सामाजिक एकजुटता आ समरसता के माला बनेले.

हिंदी हमनी के राष्ट्रभाषा हटे

एह साल जुलाइये-अगस्त से सोशल साइट पर हलचल मचि गइल. लोगन में सभसे पहिले बतावे के होड़ लागि गइल कि हिंदी राष्ट्रभाषा ना ह, राजभाषा ह. कुछ लोगन के त ईहो पता ना रहे कि राजभाषा का होले, एहसे राज्यभाषा शब्द के भी इस्तमाल शुरू हो गइल. ओइसहूँ हिंदी के सोरि काटे खातिर लोगन के कमी नइखे, फालतू के ज्ञान-प्रदर्शन से अउर नुकसान कइल जरूरी बा का ?  अब इहाँ सभ के के बताओ कि हर बात के नोटिफिकेशन आ प्रमाण-पत्र जरूरी ना होला. जवन जन्म-प्रमाण-पत्र आजु हर जगह खोजल जा रहल बा आ मिल रहल बा, ऊ पचास साल पहिले रहे का ? हिंदी के ‘राष्ट्रभाषा’ आजादी के लड़ाइये के दौरान मानि लिहल गइल रहे. अब ओकर साटिकफिटिक आजुके गृह मंत्रीजी कहाँ से दीहें. आ जो अइसने रहे कि हिंदी के ‘राष्ट्रभाषा’ कहल अवैध भा अज्ञानतामूलक बा त स्वतंत्रता से पहिलहीं भा शुरुआते से हिंदी के प्रचार-प्रसार खातिर संघर्ष करत संस्थन के नाँव आजुओ काहें नइखे बदल देत सरकार ?  महात्मा गांधी 4 जुलाई, 1936 के अपना निवास आश्रम सेवाग्राम में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ के स्थापना कइले, जवन आजुओ राष्ट्रभाषा का प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण स्थान राखेले. 1948 में बिहार विधान सभा में राष्ट्रभाषा हिंदी के चउमुख विकास खातिर ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्’  के स्थापना के एगो संकल्प पारित भइल. एकर स्थापना 1950 में भइल आ 11 मार्च 1951 के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम माधव श्रीहरि अणे का गौरवपूर्ण अध्यक्षता में एकर विधिवत उद्घाटन भइल. बिहार सरकार का शत-प्रतिशत अनुदान से ई संस्था चलेले. अइसन अनेक उदाहरन गिना सकींले हम. त का मानल जाउ कि राज्य सरकार आ केंद्र सरकार के ई कुल्हि मालुम नइखे. हमनी का टाइम में इंटर-बी.ए. में ‘राष्ट्रभाषा हिंदी’ नाँव से एगो अनिवार्य पत्र रहत रहे (पता ना, अब बाटे कि ना), बाकिर हमरा जानकारी में अभी तक ई नइखे आइल कि एकरा खातिर बिहार सरकार आपन गलती मनले होखे आ कान पकड़ि के माफी मङले होखे. हँ, हमरा जानकारी में ई जरूर आइल बा कि हमरा देश में राष्ट्रभाषा का रूप में हिंदी के जरूरत सबसे पहले अहिंदिएभाषी  लोग महसूस कइले रहन. हिन्दीभाषी लोग त ओह लोगन का हँ में हँ मेरवले रहन, ऊहो एह खातिर कि केहूँ ऊहन लोग के ‘बेमतलब के आदिमी’ मत मानि लेउ.

हिन्दी के संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी भा अंगरेजी नियन कबो राज्याश्रय नइखे मिलल, ई अपना सुभाव से आगे बढ़ल बिया. जब देश के एके धागा में पिरोवे के जरूरत परल त ओकरा विद्रोह के  हिंदिए सुर दिहलसि. एही से राजा राममोहन राय के पहिल समाचार-पत्र के भाषा हिंदिए बनलि. अफ्रीका से लौटला पर गांधी जी आपन पहिल भाषण हिंदिए में देले रहन.  जब कुछ लोग एकर बिरोध कइले त ऊ कहलन कि हम हिंदी में ना,  भारत का भाषा में बोलतानी. सुभाषचंद्र बोस के गगनभेदी ललकार हिंदिए में गूँजल रहे. एही तरह के हिंदी के सेवा के याद कइके स्वतंत्र भारत का संविधान में हिंदी के राजभाषा के सम्मान दीहल गइल. त का अब देश के एकर जरूरत साँचो नइखे रहि गइल ?  भारतीय संविधान में पनरह साल में हिंदी के पूर्ण राजभाषा के दरजा देबे के संकल्प लिहल गइल रहे, जवन चौगुना टाइम बितला का बादो पूरा ना भइल आ नु संभव लागता. अइसना में तकनीकी बातन के हवाला देके देश के आस्था पर आपन खीसि काहें निकालतारे लोग ? साँच त ई बा कि जब भी देश कबो एकता भा संवाद के संकट का दौर से गुजरी त संपर्क भाषा का रूप में राष्ट्रभाषा हिंदिए माथा पर आश्वासन के हाथ फेरी आ हमनीके आत्मबल मजबूत करी, अंगरेजी त लोरो पोंछे ना आई. हिंदी हमनी के राष्ट्रभाषा हटे. गांधीजी आ उनुका पीढ़ी के महापुरुष लोगन का मन में जो एह तरह के संदेह पहिले आइल रहित त निश्चित रूप से पहिले राष्ट्र के नामकरण ना कइले रहित लोग, ‘राष्ट्रभाषा’ के करित, काहेंसे कि एकरा सहजोग का बेगर आजादी के कल्पना संभव ना रहे. कुछ दिन से हमरा मन में एगो चिंता समाइल बा कि भावना का साथे खेले जाएवाला एह तरह के खेल का पाछा कवनो विघटनकारी ताकत के खड़यंत्र त काम नइखे कर रहल. सावधानी जरूरी बा.

 

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