विजया दशमी पर्व असत्य पर सत्य के, अपराध पर न्याय के विजय पर्व हऽ. एकरा के हमनी का बहुविधि मनाइले सँ. रामलीला का मैदान में लागल रावण के बड़हन बड़हन पुतला फूंकल जाला बाकिर हर साल रावण ओहू ले बड़ रूप में फेरु से आ जाला. खाली पुतले बनि के ना, समाज के जिनिगियो में.

वइसने एकाध रावण हमनियो का पलले पोसले रहेनी सँ अपना आँतर का कोना में, जेकरा के केहू ना देख पावे बाकिर जे हमनी के हमेशा संचालित करत रहेला, अपना काबू में लिहले राखेला. ओह रावण के, अपना आसुरी प्रवृति के, अपना बेसम्हार लालच के, दोसरा खातिर घिन, खीस, नफरत, हिंसा के भावना के मारल ओतने जरूरी होला.

त आईं, आजु अपना से वादा कइल जाव कि हम आगा बढ़ब, बाकिर केहू के लंघी ना मारब. अपना फायदा के काम करब बाकिर ओकरा खातिर दोसरा के नुकसान करे के काम ना करब. कवनो आदमी खातिर अपना मन में घिन, नफरत, खीस के जगहा ना देब. हर ओह आदमी के माफ कर देब जे कबो हमनी के नुकसान चहुँपवले रहे भा नुकसान चहुँपावे के कोशिश कइले रहे. संगही संगे अपना के अइसन बनायब कि केहू हमनी के नुकसान ना चहुँपा सके. दिग्विजयी बनला के सपना ना देखब बाकिर अपना के हमेशा बेहतर बनावे में लागल रहब. लाभ कमाये खातिर केहु का साथे बेइमानी ना करब. ना त आपन बलिदान देब ना दोसरा केहू के बलिदान लिहला के कोशिश करब.

एह सब में हर बात हमनी का अपना काबू में बा. एहमें कवनो बाति दोसरा पर निर्भर नइखे. दोसर का करत बा ओकरा से हमनी के फैसला ना बदले के चाहीं. एह बाति में रउरो बहुते कुछ जोड़ सकीले, मन करे त छोड़ सकीलें. आजु रावण के दसो मूड़ी ना काट सकीं त एकाध गो के जरूरे काट गिरावे के कोशिश करीं. ई हिंसा ना होखी, संयम होखी.

चलीं रावण पर राम के विजय पर्व मनावल जाव.

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