भोजपुरी जनमानस के वेदना उभारत एगो उपन्यास

अँजोरिया भोजपुरी के बढ़न्ती आ विकास खातिर हमेशा से प्रतिबद्ध रहल बिया आ एह खातिर ओकर हमेशा से कोशिश रहल बा कि भोजपुरी में प्रतिष्ठित रचना दिहल जाव. अँजोरिया के गर्व बा कि जतना प्रतिनिधि साहित्य एहिजा मौजूद बा ओतना शायदे कवनो दोसरा जगहा भेंटाई. नवही लेखक कवियनो के अँजोरिया ओतने प्रोत्साहित करेले बाकिर प्रतिनिधि साहित्य दिहला के मकसद होला कि पाठक लोग का सोझा स्वादिष्ट आ स्वास्थकरो भोजन परोसल जाव, खाली जंके फूड ना.

एही दिसाईं अंजोरिया पर आवे जा रहल बा दयानन्द पांडेय के उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” के भोजपुरी अनुवाद. ई उपन्यास हिन्दी में लिखल गइल आ बहुते प्रशंसित रहल बा, २००३ में दिल्ली के जनवाणी प्रकाशन से प्रकाशित एह उपन्यास के अबले चार गो संस्करण निकल चुकल बा. एह उपन्यास खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले रहे. एह उपन्यास का बारे में खुद ओकरा लेखक दयानन्द पांडेय का शब्द में,

“लोक कवि अब गाते नहीं” सिर्फ भोजपुरी भाषा, ओकरा गायकी, आ भोजपुरी समाज के गिरावटे के कहानिये भर ना ह, बलुक लोक भावना आ भारतीय समाज के संत्रास के आइनो ह. गाँव के निर्धन, अनपढ़, आ पिछड़ी जाति के एगो आदमी एक जून भोजन, एगो कुर्ता पायजामा पा जाए के ललक आ कबो ना रुके वाला संघर्ष का बावजूद अपना लोकगायकी के कइसे बचा के राखता, लोक गायकी के ना सिर्फ बचा के राखत बा बलुक ओकरा के शिखर तक चहुँपावत बा. ई उपन्यास एह ब्यौरा के बहुते बेकली से बाँचत बा. साथही शिखर पर चहुँपला का बावजूद लोक गायक के के गायकी कइसे अउरी निखरे का बदला बिखरत चल जात बा, बाजार के दलदल में धँसत चल जात बा, एहू सच्चाई के ई उपन्यास बहुते बेलौस हो के भाखऽता, ओकर गहन पड़ताल करत बा. लोक जीवन त एह उपन्यास के रीढ़ बड़ले बा. आ जइसे कि उपन्यास का अंत में नयी दिल्ली स्टेशन पर लीडर ठेकेदार बब्बन यादव के बार बार कइल “लोक कवि जिन्दाबाद” के उद्घोष आ फेर छूटते पलटि के लोक कवि के कान में फुसफुसा के ई पूछल कि, “बाकिर पिंकिया कहाँ बिया ?” लोक कवि के भाला लेखा खोभत बा आ उनुका के तूड़ के राखि दे ता तबहियो उनका से जवाब नइखे दिहल जात. ऊ आदमी जे शिखर पर बइठला का बादो छितराये खातिर मजबूर हो गइल, शापित हो गइल, अपने रचल गढ़ल बाजार का दलदल में धँसत चलि गइल. लोक कवि अब छटपटात बा पानी से बाहर निकलल कवनो मछरी का तरह आ पूछत बा, “बाकिर भोजपुरी कहाँ बा ?” बाकिर बतर्ज बब्बन यादव, “बाकिर पिंकिया कहाँ बिया ?” लोक गायकी पर लगातार चलत जूते त “लोक कवि अब गाते नहीं” के शोक गीत बा. आ संघर्षो गीत.”

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित), आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

हिन्दी में लिखल उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद कवनो मुश्किल काम ना त आसानो नइखे हमरा जइसन गैर साहित्यिक आदमी खातिर. बाकिर उपन्यास हमरा के झकझोरि के राखि दिहलसि आ भोजपुरी से अपना प्रतिबद्धता का चलते हम मजबूर हो गइल बानी एकर अनुवाद करे के. रउरो पढ़ीं आ देखि. उपन्यास के प्रकाशन जल्दिये शुरु होखी.

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