– मुन्ना कुमार पाण्डेय (शोधार्थी)

“अबहीं नाम भईल बा थोरा । जब यह छूट जाई तन मोरा ।।
तेकरा बाद पच्चास बरीसा । तेकरा बाद बीस दस तीसा ।।
तेकरा बाद नाम हो जईहन । पंडित कवि सज्जन जस गईहन ।। (१)

आज हम उनकर जन्मदिन पर इहाँ दिल्ली में पढल लिखल लोगन के बीच उनकर जस २०१० में गा रहल बानी. कवनो कलाकार काहे एतना नामी हो जाला कि ओकरा ना रहला के बावजूद लोग के हृदय में ओकर उहे छवि नाचत रहेला जउन उ देखले रहेला ? ओकरा मूल में रहेला ओ आदमी के कईल काम आ व्यक्तित्व जउन आपन एगो अइसन इमेज हमनी के सामने छोड़ जाला जे हमनी के ओकरा के याद करे पर बाध्य होनी जा. भिखारी ठाकुर आपन इहे छाप छोड़ गईल बाड़े. उनका के याद करेवाला लोग बहुत भावुक होके बतावेला. आज जब देश के दोसरा हिस्सन में पूर्वांचल के श्रमिकन पर हमला हो रहल बा तब अइसन समय में भी भिखारी बहुत प्रासंगिक हो गइल बाडन. काहे से कि एक बेर भिखारी ठाकुर असम में आपन नाच देखवले रहलन तब ओईजा के सिनेमा घर सब में ताला लागे के नउबत आ गईल रहे. ई भिखारी ठाकुर के जादू रहल. ऊ एके साथे कवि, गीतकार, नाट्य निर्देशक, गवईया, संगीतकार आ एगो कुशल अभिनेता रहलन. अईसन समझल जाला कि भिखारी ठाकुर ही पहिला बार खुला मंच प्रयोग भी कईलन. अपना नाटक में कबो सूत्रधार के रुप में आके वातावरण बनावे के होखे चाहे अलग अलग रोल में जइसे बिदेसिया में “बटोही”, गबरघिचोर में “पञ्च”, बेटी बियोग में “पंडित”, राधेश्याम बहार में “बूढी काकी”, कलजुगी प्रेम में “नशाखोर पति”, भिखारी ठाकुर हर खांचा में समा जास. महेश्वराचार्य जी भिखारी ठाकुर के एह कलाकारी पर लिखले बानी, “भिखारी की शोभा मंच पर होती थी. वह मंच के बादशाह थे. स्वांग के क्षेत्र में उतरकर वह किसी भी विषय का जीता जागता रुप खडा कर देते थे. अभिनय में प्राण भर देते थे. जिन्होनें मात्र उनकी पुस्तिकाओं का ही अवलोकन किया है, वे नाटककार भिखारी को पूरा पूरा नहीं जानते. जानते हैं वे जिन्होने भिखारी को जीवितावस्था में उनके नाटकों को मंच पर देखा है. पुस्तिकाओं में यदि भिखारी पचास प्रतिशत हैं तो सौ प्रतिशत थे अपने मंच पर.” (२)

ई कहे में हमरा तनको संकोच नईखे कि हम एही ५०% वाला वर्ग में से बानी, लेकिन भिखारी ठाकुर से हमार परिचय भोजपुरी के मौखिक परंपरा में पहि भइल बाद में किताबी.

खैर,भिखारी ठाकुर मंच के बादशाह रहले एईमे केहू के शक न होखे के चाहीं . ए सन्दर्भ में अईसन बहुत उदहारण बा जब भिखारी ठाकुर के नाटक के दौरान दर्शक उनका पाट (खेला / रोल) से अगल बगल से बेसुध होके स्टेज पर चढ़के बंदूक तान दिहलस. ई भिखारी के कलाकारी के ताकत रहे. उनका नाटक में जब तब दर्शक लोग से भी अभिनेता के सीधा सामयिक, विनोद आ ठिठोली वाला संवाद होत रहे. माने दर्शक के उनका नाटक में सीधा आ सक्रिय भागीदारी होखे. एक समय में सीधे गंभीर आ अगिले पल में हास्य. रंगमंच पर इ हमनी सभे के ठेठ आपन रंग परंपरा रहल बा जउन भिखारी ठाकुर लेके अइलन. पछिम में ऐइसन प्रयोग ब्रेख्त कइले रहलन. एगो बड़ा आश्चर्य के विषय बा कि भिखारी के आपन नाटक “गबरघिचोर” ब्रेख्त के “काकेशियन चाक सर्किल” से केतना करीब बा. ई स्थिति में कहे के पड़ी कि शब्द नीयन लोककथा भी यात्रा करेला. आ थोड़ा बहुत बदलाव के साथ अपना अपना स्थानीयता के अनुसार सामने आवेला. भोजपुरी में इ कथा के माध्यम भिखारी बनले अइसन कहल जा सकेला. जब देश में विपरीत बयार बहत रहे आ हर जगह अंग्रेजी राज के लाठी चलत रहे तब उ भिखारी ही रहलन जिनकर गान, रंगकर्म पूरा भोजपुरिया लोगन के घाव पर मरहम लगावे के काम कईलन.

आज जबकि भिखारी ठाकुर के नाटकन के एगो नया सदर्भ में पढल, देखल जा रहल बा तब भिखारी लोक कलाकार के स्तर से बहुत ऊपर उठके वैश्विक रुप ले लिहले बाडन. उनुकर लोकप्रियता के इ आलम रहे कि मगही, मैथिली क्षेत्र में भी उनकर मांग बहुत रहे. बाद में उ देश के अलग अलग प्रांत में भी सराहल गइले. अईसे में उनकर एगो राष्ट्रीय छवि विकसित भइल आ उनकर तुलना शेक्सपियर आ भारतेन्दु जी से होखे लागल. हालांकि भिखारी के पद्यात्मक नाटक के चलते हो सकेला कि शेक्सपियर से उनकर तुलना भईल होखे बाकि हमरा उनकर भोजपुरी के भारतेन्दु उपाधि अधिक जंचेला. हमनी के अपना घर के प्रतिभा के पछिम के मुहर के कौनो जरुरी नईखे. इ बात कहे के पीछे एगो बडका कारण इ बा कि जहाँ शेक्सपियर एगो खास किस्म के एलिट भावभूमि अपना नाटकन में रचले उहे भिखारी उनका से एकदम उलट खांटी भोजपुरिया लोकजीवन के दैनिक आचार व्यवहार, समस्या, परिवेश, कलाकार के अपना नाटकन में जगह दिहले. “बिदेसिया” त एकर सबसे बडका उदहारण बा. “बिदेसिया” भोजपुरिया समाज के लोग के उल्लास के रंगमंचीय कलात्मक प्रस्तुति ना हवे. ए संबंध में अगर कवनो विचार होखे त दिमाग से निकाल देबे के चाहीं. “बिदेसिया” हमनी के माटी के लोग के दर्द के जीवंत दस्तावेज ह, जवना के भोजपुरिया भाई अउर मेहरारु लोग अपना छाती में बरिस बरिस से दबवले बा और भीतरे भीतर आज तक कुहुक रहल बा. “पिया मोर गईलन परदेस, ए बटोही भईया. रात नहीं नीन, दिन तनी न चएनवा” में भिखारी ठाकुर के मार्मिक बानी कबीर के विरहन आत्मा आ जायसी के नागमती जईसन बा. (३) भिखारी ठाकुर के समय में तब इ दर्द कलकत्ता, असम, फिजी, मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद के चलते रहे त आज के समय में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मुंबई, आ खाड़ी के देशन के करते लगातार बनले बा. डॉ.तैयब हुसैन पीड़ित जी के कहनाम बा, “बिदेसिया” तो इस क्षेत्र का दस्तावेज़ है जो तत्कालीन समाज में पनप रहा आर्थिक अभाव का लेखाजोखा प्रस्तुत करता, पेट की खातिर यहाँ के गभरु जवानों के पूरब देश (असम और कलकत्ता) जाने की कहानी कहता है.”(४) तबसे “पिया गइले कलकतवा हे सजनी” के टेर अलग अलग रुप में मौजूद बा. “बिदेसिया” आज एगो स्वतंत्र रुप से नाट्य शैली कहा रहल बा परंतु “बिदेसिया” के नाच के पीछे बदलाव के एगो बड़ा प्रक्रिया रहल बा. पहिले शुरुआती दौर में “बिदेसिया” के नाच के साथे “प्रकरी” नीयन धोबी धोबिनिया के प्रहसन भी भिखारी जोडले रहलन जउन बड़ा फूहर, लंगटा रहे.”(५) संभव बा जे अइसन भीड़ जुटावे खातिर कइले होखिहे. खैर भिखारी ऐसे बड़ा जल्दी पीछा छोड़ा लिहलन, आ तब “बिदेसिया” अपना असली रंग में सामने आइल. दरअसल भिखारी ठाकुर के समय में नेटुआ आ जोगीरा ही परंपरा में रहल. फेर भिखारी ठाकुर पर बंगाल के जात्रा के भी प्रभाव बतावल जाला. भिखारी ठाकुर एगो नया किसिम के रंगमंच जीवित कईलन. “नेटुआ के नाच देखे वाली जनता के सामने जब “बिदेसिया” के खेला/नाच आईल त एकरा एगो नया नाम मिल गइल “बिदेसिया” के नाच”. एकरे बाद भिखारी कवनो नाटक लेके मंच पर आवस उ “बिदेसिया” के नाच ही कहाए.” (६)भिखारी ठाकुर के नाटकन में स्त्री जाति के सामाजिक स्थिति, समस्या आ मनोविज्ञान बड़ी गहराई से व्यक्त भईल बा. गबरघिचोर से लेके बिधवाविलाप तक भारतीय ग्रामीण औरत के दुर्दशा भिखारी से छुपल ना रहे. उनकर नज़र बिदेसियन के पाछे रह गईल मेहरारुन के पीड़ा पर अधिक रहे. भिखारी से इहो बात ना छुपल रहे कि भोजपुरिया समाज के औरतन के दुर्दशा के पाछे कउन कारन बा. एतने ना, कई बेर त इ पढ़ के अचम्भा होला कि भिखारी के कविताई कबो एकदम से जिला जवार, प्रांत देश के सिवान के लांघ जाला. जईसे भिखारी कहेले, जियला पर कुती कुत्ता, कहेला पतोह पूता”. इ बात एगो अमेरिकन मुहावरा से केतना मिलत जुलत बा जहाँ कहल गईल बा, ‘son is son till he gets a wife. but daughter is daughter all her life’.

छुपे भागिकर नाच में जाई, बात बनाके दाम कमाईं. तनिको ना आवे गावे बजावे, काहे दो लागल लोग के भावे”. पढ़ सुनके जे ए बात के माने वाला होई कि भिखारी के नाच खाली उनका रोज़ी रोजगार के माध्यम रहे, उ मानत रहे, बाकिर आज ए बात के कवनो अर्थ नईखे रह गईल. उनकर इहे नाच आदि अपना भीतर केतना बड़ा अर्थ रखले रहे, उ सबके आँखिन के आगे बा. भिखारी ठाकुर जवना परिवेश में जनमल रहले उहे तनिमनि अपना तरफ से कांट छांट आ कुछ जोड़ के हमनी के आँखिन के आगे रख दिहले. जउन उनकर नाटक आ गीतन के माध्यम से सामने आइल. आज भी समाज में तिलक दहेज के समस्या, नशाखोरी, ननद भउजाई के नोंकझोंक, गंगा नहान के महिमा, विधवाओं की दुर्दशा, बेमेल बियाह आदि के दृश्य आम बात बा. रोज़ी रोज़गार से शुरु भईल उनुकर रंगयात्रा जल्दिये सामाजिक जागृति के मंच बन गईल. भिखारी के रंगकर्म बंद सभागार आ तामझाम के सामने एगो लोक कलाकार के सामाजिक कुरीतियन के खिलाफ खुला सांस्कृतिक मोर्चा बा, जवना के जड़ हमनी के परंपरा से रस लेके बढल. भिखारी अपना परंपरा के साथे प्रगतिशील रहले. परंपरा से निमन बात लेके आज के संदर्भ में समाज के सामने ठेठ आपन प्रस्तुति ही भिखारी के आपन शैली रहे. कुछ लोग पढ़ के, कुछ लोग देख सुन के प्रगतिशील होला बाकि भिखारी ठाकुर जी के नीयन उ जउन सामने देखईले, उ सब उनकर आंखन देखल आ भोगल यथार्थ रहे.

आज भिखारी ठाकुर के “बिदेसिया” से आ “पिया गईले कलकतवा हे सजनी” से (सुधीर मिश्रा के फिल्म हजार ख्वाहिशें ऐसी के कारन ) सभे परिचित बा, ओतना परिचित जेतना कि लोग भिखारी के अउर रचना से भी नईखे. इ बहुत तीत साँच बा. “बिदेसिया” के देश बिदेश में ५०० से ऊपर प्रस्तुति दे चुकल रंगकर्मी संजय उपाध्याय के कहनाम बा कि “लोग सिर्फ इतना जानते हैं कि भिखारी था कोई लवंडा नाच करने वाला कलाकार और कुछ नहीं. इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे” .(७)

भोजपुरी सिनेमा के उभार के ए समय में जब भोजपुरी संगीत में भरपूर बेहूदगी के दौर आ गईल बा तब भिखारी एक बेर फेर प्रासंगिक हो गईल बाड़े. उनका साहित्य के फेर से वृहद स्तर पर देखे के जरुरत बा. आज जब दिन पर दिन रंगमंच के प्रयोगशीलता बढ़त जाता तब इ काम जरुरी हो गईल बा. भिखारी ठाकुर के रचना में प्रयोग के अपार संभावना बा लेकिन इ प्रयोग खाली अपना लोकप्रियता खातिर ना होखे. काहे से कि भिखारी आज भी जन सामान्य के कलाकार हवें. उनका के जनता के बीच में ले जाके नयका पीढ़ी के आगे जिंदा राखल जा सकता. बंद प्रेक्षागृह में खास किसिम के लोग के सामने त उनकर रचना ना खुली ? एकर कारन बा कि भिखारी ठाकुर के कवनों पात्र साधारण नईखे. नाम तक में एगो खास समाज के बोध बा. उनकर हर पात्र बहुआयामी बा. उनका मंच पर दर्शक आ कलाकार के दुराव नईखे. सीधा खुला प्रश्न, खुला खेल, खुला तमाचा, भिखारी के बात के मर्म जबले समझ आई तबले मलाल के अलावे कुछो न बची, अईसन रहे भिखारी के जादू. रहलन उ भोजपुरी के भारतेन्दु, होइहें उ भोजपुरी के शेक्सपियर. बाकि ए सबसे बढ़के उ भोजपुरिया माटी के दूसर कबीर रहलन जउन एगो कलाकार के जामा पहिन के आयिल रहलन. हालांकि हिंदी के रंगजगत के खतियान, रंगकर्मी कोश में से भिखारी ठाकुर (साजिशन) गायब बाड़े. करोड़ों लोगन के हृदय पर जेकर इतिहास अंकित होखे ओकरा कागज़ के खतियान के जरुरत नईखे. बाकि के आवे वाला पीढ़ी खातिर कम से कम इ पुनीत काम हमनी सभे के करके चाही. काहे से कि भिखारी ठाकुर पर आज भी गिनल चुनल ग्रंथ आ किताब बा. एकर जिम्मेदारी जेतना इ समाज के विद्वतजन् के बा ओतने छात्र शोधार्थी लोग पर भी बा. इहो बडका सच्चाई बा कि भिखारी ठाकुर के धकिया के हिंदी रंगमंच के मुकम्मल इतिहास भी ना लिखल जा सकेला. नित नया विमर्शन के बीच अब ए बात पर हमनी के कवनो शक न होखे के चाही कि भिखारी ठाकुर के प्रतिभा लोककलाकार के फ्रेम से कहीं ऊपर एगो वैश्विक फलक के बा. एइसे में उनुका के लोक कलाकार कहके उनका प्रतिभा के कमतर आंके वाला बात होई. भिखारी भोजपुरी लोकरंग के वैश्विक कलाकार बाडन, जिनकर बखान आ गीत देस परदेस में फईलल आपन भोजपुरिया समाज गा रहल बा.

खैर, जबले रोज़ी रोजगार के फेर में भोजपुरिया जमात आपन गाँव घर छोड़ी, जब तक उनकर बियाह…ता औरतन के आँख में लोर रही. जब तक मेहरारुन पर जुलुम होत रही, जबले शराबियन के बटोर गाँव के चौपाल पर रही, सामंती मानसिकता के जमात रही भिखारी ठाकुर के प्रासंगिकता बनल रही. भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व तथाकथित सभ्य समाज के आबोहवा में व्याप्त कुरीति आ छुपल नृशंसता के कच्चा चिट्ठा ओही सामंती समाज के बीच चौकी पर खड़ा होके सूत्रधार के रुप धरके खोल देबे वाला रहल. अईसन साहस एगो कूटनीतिक चतुराई के मांग करेला, जउन भिखारी जईसन कलाकार खातिर कवनो कठिन काम ना रहे. अंत में भिखारी ठाकुर के जन्म दिवस पर उन का याद के नमस्कार एगो कविता से, जउन भिखारी ठाकुर के ऊपर तारकेश्वर राय जी ‘भिखारी’ शीर्षक से लिखले रहलन.

“गौरी गणेश पद, बोली में भरल मद
गावत बानी गीत में बनाई के भिखारी के.
गाँव के कगरिया में, सड़क बघरिया में
चलत डगरिया में गीत बा भिखारी के.
चमकत चमचम, गमकत गम-गम
मह मह महकत सगरो भिखारी के.
खेतवा किसनवा में, जंतवा, पिसनवा में
बंसुरी के तानवाँ में सुनी ने भिखारी के.
गंगा के लहरिया में, गाँव आ सहरिया में
घरघर हरहर बहत बा भिखारी के.
बिदेसी निरमोहिया के, बनी के बटोहिया जे
पथलs पर लोहिया घुमल बा भिखारी के.
बेटीया बियोगवा के, रोगवा समुझकर
छतिया में बतिया जरत बा भिखारी के.
बिधवा बिलाप, उदबास के आलाप सुनी
दुखवा से मुखवा मलिन बा भिखारी के.
गंगा असनान आ दहार के बहार लिखी.
गोरवा के तोरवा खींचत बा भिखारी के.
ननदी भउजिया के खोज बाटे कुंजिया से
गलवा में तुलसी के मालवा भिखारी के.
गोखुला नगरिया में, नन्द कचहरिया में
ओरहन रगरिया मचल बा भिखारी के.
भाई के बिरोध के करत अनुरोध रोज
लाश ना मिलत बा तलाशे से भिखारी के.
गबर घिचोर के अंजोर, पुत्र वधु बाटे
बिरहा बहार में अलाप बा भिखारी के.
कीरतन के भालावा भालावा समान देखीं
नशवा के दशवा उतारल बा भिखारी के.
दोहा चौपाई छंद, पल ना परत मंद
बोल चौबोला के बोलल बा भिखारी के.
गीत वो कवित नित, लोग के करत हित
पूरबी के खुरपी बनावल बा भिखारी के.
हरवा से रसवा चुअत नवो दसवा में
चासवा पर चासवा चलावल बा भिखारी के.
दईब संजोगवा होखत अब खोजवा से
भोज से भरल भोजपुरिया भिखारी के.(८)


मुन्ना कुमार पाण्डेय (शोधार्थी)
हिंदी विभाग,
दिल्ली विश्वविद्यालय,


संदर्भ :

(१) भिखारी ठाकुर रचनावली, संपादक नगेन्द्र प्रसाद सिंह, पृ ३१९
प्रकाशक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद,पटन ८००००४. प्र.स.२००५.

(२) भिखारी ठाकुर : भोजपुरी के भारतेन्दु, भगवती प्रसाद द्विवेदी, पृ ५४,
आशु प्रकाशन, इलाहबाद २१००२. स.२०००.

(३) लेख सामाजिक चेतना के लोककलाकार भिखारी ठाकुर, रामशोभित प्रसाद सिंह, नई धारा (द्वैमासिक) सं. प्रमथ राज सिंह, अंक ९ १०,
दिसंबर २००७ जन. २००८,पृ. २०.

(४) देखें ,”बिदेसिया” अंक १,पृ.१६

(५) देखें रघुवंश नारायण प्रसाद सिंह का लेख जनकवि भिखारी ठाकुर, अंजोर (भोजपुरी पत्रिका) अक्टूबर १९६७ जनवरी १९६८, पृ ८.

(६) देखें भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका : दिसंबर १९८७,पृ .३३.

(७) देखें bidesia.co.in पर रंगकर्मी संजय उपाध्याय का साक्षात्कार.

(८) भिखारी(कविता), अंजोर (भोजपुरी पत्रिका) सं. नर्मदेश्वर सहाय पाण्डेय, अप्रैल जुलाई १९७६, पृ.१७.


संपादक का ओर से

समयाभाव का चलते एह लेख में कई गो वर्तनी के गलती छूट रहल बा. आशा बा कि सुधी पाठक एह लेख के महत्ता सोच छोट मोट गलतियन पर धेयान ना दीहें.

(तीन साल पहिले १८ दिसंबर २०१३ के पहिला बेर प्रकाशित)

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