– देवेन्द्र आर्य

DevendraArya
आजादी क बाद शायद ई पहिला बेर भइल बा कि मिलल पुरस्कार लवटावे वालन के लाईन लागल जात बा. अलग अलग भाषा, प्रदेश आ विचारधारा के लिखनिहार लोग के साहित्य अकादमी से मिलल सम्मान एलानिया वापस करे के निहुरी राजनीति पाक-साफ लउके वाला लोग के चिन्ता में डाल दिहले बा. जाहिर बा कि एह लोग के चिन्ता गद्दीनशीन पार्टी के माथ पर पड़त बल पढ़े में सक्षम बा. एहीसे ई लोग एह वापसी-विरोध के पीछे के हालात ना समुझत एकरा पीछे राजनैतिक मंशा सूँघत बा, अकादमी अध्यक्ष समेत अनेके इनामिया आ बेइनामिया (बाकिर इनाम खातिर तिकवत) लिखनिहारन के बयान आवत बा कि अकादमी पुरस्कार रउरा सभे के लिखना खातिर दिआइल रहुवे जवना के सामाजिक-राजनैतिक कारण बता के लवटावे के कवनो तुक नइखे बनत. माने कि लेखक आ ओकर लिखना अपना अगल बगल के परिवेस से अलगा होला आ ओकर तात्कालिके सन्दर्भ आ महत्त्व हो सकेला, भावी भा भविष्यगत ना. कब लिखाइल, कब पुरस्कार मिलल ओकरा के आजु के कवनो घटना भा हालात से जोड़ के पुरस्कार लवटावल गलत बा. इहो कहात बा कि ई सुहागरात मनाके शादी के जोड़ा लवटवला जइसन हरकत बा. आम चूस के गुठली वापस कर दिहला जइसन.

मतलब ई कि पुरस्कार ना भइल गरदन में डालल पट्टा हो गइल. एक बेर ले लिहलऽ त पालतू हो गइलऽ ओह समय के शासन के कार्यकाल में काम करे वाला ओह स्वायत्त अकादमी के. लवटावहीं के बा त ओही सरकार के लवटावऽ. अइसन कहे वाला विद्वान शायद घुमाफिरा के मानत बाड़न कि साहित्य अकादमी के स्वायत्तता त छलावा रहुवे, असली ताकत त ओह घरी के सरकार मे रहुवे.

पुरस्कार वापसी के सन्दर्भ में इहो तर्क दिआत बा कि फलाँ फलाँ हत्याकाण्ड के विरोध तब काहे ना कइलन. आज काहें करत बाड़न. माने कि आज साँच बोले के अधिकार सिर्फ ओहने के बा जे पहिलहूँ साँच बोललत रहुवे. इहो कहात बा कि ई लिखनिहार आपातकाल के विरोध ना कइले रहले. ई तर्क राजनैतिक चालाकी भरल आ आपातकाल विरोधी मौजूदा सत्ता के नीक लागे वाला तर्क बा. माने कि जे लोग कवनो कारण से आपातकाल के विरोध ना कइल से काल्हु ले भलही खास आ असली लिखनिहार रहल होखसु बाकिर आजु पुरस्कार वापसी के एलान करते ऊ लोग खास नइखे रहि गइल. ओह लोग के पुरस्कार वापसी के एलान नौटंकी भर बावे.

गाँधीवाद में अटूट आस्था राखे वाला एह सदाचारी आ अखण्ड सत्यवादी लिखनिहारन आ साहित्य अकादमी अध्यक्ष महोदय के याद दिआवल चाहत बानी कि खुद महात्मा गाँधी के घोषित पहिलका सत्याग्रही विनोबा भावे तकले आपातकाल के समर्थन कइले रहले आ ओकरा के ‘अनुशासन पर्व’ के नाम दिहले रहले. ओह समय के प्रिय आ अबहियों बहुते लोग के आदर्श कवि श्रीकान्त वर्मा तब तानाशाह खातिर लोक-लुभावन नारा गढ़त रहलन.

तकनीकी विकास का साथही तानाशाही के स्वरूपो में बदलाव आ जाला. अब तानाशाह बिना आपातकाल घोषित कइलहु आपातकाल वाला तानाशाही लागू कर सकेला. बात के बकवाद में बदल के मुद्दा से भटकावे के राजनैतिक चाल नया नइखे. तनिका सोचीं कि आजु महात्मा गाँधी अकादमी अध्यक्ष रहतन त का करतन ? कलबुर्गी के हत्या के बाद पहिलका इस्तीफा, पहिलका अनशन उनकरे होखीत. आपन आधा लंगोटी खोल के, खुद के लंगटा भइला के चिंता छोड़ ई ओह बेवस्तर क दिहल दलित महिला के लाज ढँकले रहीतन जवना के सरेआम बाहुबली ‘यत्र नार्यस्त पूज्यन्ते’ के देश में नंगा, मादरजात नंगा कर दिहले रहले. ई कवनो पहिलका घटना ना रहुवे. पिछला डेढ़-दू साल में अइसन घटना के बाढ़ आ गइल बा. बाकिर संवेदनशील, लेखक-बुद्धिजीवियन से उम्मीद कइल जात बा कि ऊ सहित के भाव से निर्द्वन्द्व बइठल रहे. कविता-कहानी करत रहे, पुरस्कार लेते रहे, सरेआम राजनेता लोग के गोड़ छूअत रहे.

भारत भवन के सरकारी बाकिर स्वायत्त पइसा से हवाई यात्रा, रस-रंजन करे वाला, अपना पत्रिकन में भारत-भवनी विचारधारा के साहित्य के भूरि-भूरि प्रशंसा छापे वाला कवि-सम्पादक लोग आजु अशोक वाजपेयी के भोपाल गैस काण्ड के याद दिआ के पुरस्कार वापसी के उनका एलान पर सवाल उठावत बाड़े. निश्चए ऊ गलत बयानी रहुवे आ ओकरा ला अशोक वाजपेयी के भरपूर लानत मलामतो हो चुकल बा. बाकिर याद करीं कि उनुका अलावे कवन लिखनिहार बावे जे अविकल साम्प्रदायिकता पर तुरते आ बेबाक टिप्पणी कइले होखे.

जब नया सिरा से पाला बनावल जाला त कुछ जगहा खाली रहेला जवना पर आगे चल के बहाली होखे वाला होला. अइसनके मौका पर लिखनिहारन-बुद्धिजीवियन के गोपनीय रपट तइयार कइल जाला जेहसे आगे चल के प्रताड़ना भा पुरस्कार तय कइल जा सके. साहित्य अकादमी के स्वायत्तता का बा जब ऊ अपने पुरस्कृत लेखक के हत्या पर चुप बा. जन सामान्य के दिक्कत आ सामाजिक हत्यन के त बाते अलगा बा. अकादमी स्वतन्त्र बा त सिरिफ माल उड़ावे खातिर. जेकरा के मन करे दे देव, जइसे मन करे खरचा करे. कवनो दखल ना. बस रसीदी टिकट चिपकल होखे के चाहीं जेहसे सरकारी आडिट कइल जा सके.

अकादमी पुरस्कार वापस करे वाला आ ओकरा के सही समझे वाला लिखनिहारन के एकजुट होके देश के मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक हालात पर अापन नजरिया साफ साफ राखे के चाहीं आ जनता के पक्ष में खड़ा होके सकारात्मक संघर्ष करे के चाहीं. ओह लोग के एहू सम्भावना पर विचारे के चाहीं कि का सरकारी पइसा पर चले वाला स्वायत्त साहित्य अकादमी के समानान्तर का कवनो जन अकादमी बनावल जा सकेला. कम से कम शुरुआत खातिर हिन्दीए भाषा के जन साहित्य अकादमी. जरूरी नइखे कि फण्ड होखे आ हमनी का लखटकिया पुरस्कार देब तबे लेखक के सम्मान होखी. सम्मानित लेखक के सौ पचास किताब खरीद के बाँटलो जा सकेला. किताबन का साथे त दुहरा मार बा. एक तरफ त पुस्तकालए नइखी सँ. जवन बड़लो बाड़ी सँ तवन खतम होखत बाड़ी सँ.दोसरा तरफ पुस्तकालय किताबन के कूड़ाघर में तबदील होखल जात बाड़ी सँ.

हमनी के किताबन के ना सिरिफ पुस्तकालयन से बाहरे निकाले के बा, किताबन के पुस्तकालयन तक पहुँचावहूं के पड़ी. एकरा बिना ना त साहित्य जिन्दा रह
पाई, ना विचार. बस अकादमिए जिन्दा रह जइहें सँ. आ व्यवस्था इहे चाहबो करेले. आ बहुते काम जे लिखनिहार के पुरस्कार-व्याधि से बचा सके. वैकल्पिक अकादमी, वैकल्पिक साहित्य आ वैकल्पिक मीडिया के बिना वैकल्पिक राजनीति के आकांक्षा दूर के कौड़िए रह जाई.


देवेन्द्र आर्य
ए – 127, आवास विकास कालोनी
शाहपुर, गोरखपुर – 273006
मोबाइल: 09451565241 आ 09794840990

[Total: 0    Average: 0/5]
Advertisements