‘कटिया’ के बहाने, मोती बी.ए. के कविता पर चर्चा


– डॉ अशोक द्विवेदी

लोक के संस्कृति, लोक-हृदय के भीतर निरन्तर बहत रहे वाली आत्मीय अन्तर्धारा हऽ। जीवन में तमाम आधुनिक बदलाव का बादो ई अन्तर्धारा, संवेदन-स्तर पर, लोगन का मन के बन्हले, अपना धारा में अपने आप बहाइ ले जाले। ऋतु चक्र आ मौसम का फेर बदल का साथ, प्रकृति से आपरूपी सटाव, लगाव का कारन, खेतिहर-संस्कृति जीवन के हर उत्सव आ अनुष्ठान, उछाह से करेले। फागुन आ चइत के हुलास में अन्तर लउकेला, चइत में हुलसल गँवई सरेह लोकमन में जागरन के एगो नये हलचल पैदा करेला। खेतन में गदराइल पाकत फसल, ‘कटिया’ का अनुष्ठान खातिर नेवतेले आ जब सुतार आ जाला त लोक-धड़कन तेज हो जाले। मोती बी0ए0 के एगो कविता हऽ ‘कतिया के सुतार’। जवना घरी मोती जी एकर रचना कइले रहलन, ओघरी के गाँव के मय-सन्दर्भ तनी दोसर रहे। तब हर-फार, फरुहा-कुदार, खुरुपी-हँसुआ क चलती रहे। आज एकर मोल तनी कम हो गइल बा।

आग-पाछ होत मौसम आ ट्रैक्टर-हार्वेस्टर का जमाना में खेती-बारी क पुरनकी तकनीकी आ ब्यवहार बदल गइल बा, लोक-संबेदन आ ओकरा उमंग-उछाह में कमी आ गइल बा। ऊ आपुसी आत्मीयता आ प्रेम घटल बा, जवन खेतिहर के सामूहिक आ पारस्परिक भाव में एक-दुसरा से नथले-जोरले रहे, जवन बोअनी, रोपनी, कटिया का समय होखे वाला ‘जन-जागरन’ के उछाह-उमंग से भरत रहे। समय-साँच आजु ले नइखे बइलल। अभाव आ औचक नियति के मार का बावजूद कबो निराश ना होखे वाला किसान, हर आफत-बीपत आ चुनौती से जूझत, अपना कृषि-कर्म से बिमुख ना होला। पाथर-पाला, अति-बरखा, बेमौसम बरसात, बाढ़ आ सूखा सब किसाने का खेत-खरिहान से होके गुजरेला। सगरी बिपरीत स्थिति का बादो किसान कबो जोते-बोवे से ना चूके, ऊ हर ‘रिस्क’ उठाइ के आपन धरम निभाई- बोई, रोपी आ कवनो उपाइ से जियका जियावत, फसल के अंत ले अगोरिया करी। खाली एही उमेद में कि फसल तेयार होते ओकरा हर समस्या आ दुख के अंत होई। सचहूँ जब फसल तइयार होले त खेत में झपर-झपर झूमत बालियन के देखते-मातर, स्रम सुफल हो जाला- खाली खेतिहरे ना, ओकर पूरा परिवार मगन हो जाला, एगो नया आत्मविश्वास उमगि आवेला –

गाँठे खइनिया, माथे पगरिया
हाथे हँसुववा काँखे लउरिया
ले लिहले बलमा हमार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार।

ई ‘स्केच’ हऽ ओह किसान के अगराइल भाव-भंगिमा के, जवना में स्रम-साधना फुरला के आत्मविश्वास आ उछाह बा। ‘कटिया’ के ‘सुतार’ ऊ शुभ घड़ी हऽ, जवन समूचा वातावरन के नया चेतना,
नया हुलास से भर देत बा, जइसे कवनो पुनीत अनुष्ठान होखे जा रहल होखे आ घर क मलिकार उछाह से तइयार हो गइल होखे, ओकरा सँग-सँग पूरा घरवे एकाएक क्रियाशील हो उठल होखे। ‘कटिया’ से जुड़ल लोक-संबेदन आ क्रियाशीलता के जियतार-उरेह करत मोती जी एह अवसर के साक्षी बाड़न –

कोरा के बचवा के हाली पिया दऽ
बड़का लरिकवा के बसिया खिया दऽ
गइया-बछरुआ के नादे लगा दऽ
बैला के नादे में सानी चला दऽ
कबके भइल भिनुसार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!
— — —
मोटे-मोटे लिटिया पर नून-मरिचाई
खाये के बेरिया ना होला ओझाई
बनि, घरे आई, पिटाई-कुटाई,
गोहुआँ पिसाई त गितिया गवाई
भइले मगन बनिहार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!

ई क्रियाशील जन-जागरन, फजीर होते खेत में तइयार फसल का कटिया वाला अनुष्ठान खातिर बा। गौर करे वाली बात बा कि ई पारस्परिकता कुछ दशक पहिले खेतिहर आ खेतिहर-बनिहारन का परिवार में आत्मीय तत्परता का साथ कायम रहे। पूर्वांचल का भोजपुरी भाषा-समाज के अब नवका पीढ़ी तइयार हो गइल बा। शहरी-रुझान वाली आधुनिकता आ जातीय आधार पर घर-घर में घुसल राजनीति एह साझा-संस्कृति का आपुसी ताना-बाना के तूरि चुकल बिया।

कविता के समय आ समय के कविता दूनों कसौटी पर मोती बी0ए0 के ई कविता ‘कटिया के सुतार’ जियतार आ अरथवान कविता बिया। एम्में भोजपुरी लोक आ ओकरा भाषा के क्रियाशीलता के सुभाविक शब्द-स्पन्दन आ ओकर जीवन ‘लय’ बा। ऋतु-चक्र महीना के ज्ञान, बोध आ अनुभूति बा। जवना संपृक्ति आ आत्मीयता से कवि स्मृति-चित्रन से अपना भावाभिव्यक्ति के सजावत बा, ओइसहीं अगर पढ़हूँ वाला का भीतर रचना के ग्रहणशीलता आ आत्मीयता रहे त ओकर आस्वाद बढ़ जाई। ‘कटिया’ का पाछा के वृत्तान्त, वर्तमान के चोट आ भविष्य के चिन्ता के समेटत ई कविता समय का साँच के बहुत कुछ बयान करत लउकी –

चितरा-सेवाती में सेवता घुमवलीं
अगहन में मरि-मरि पानी चलवलीं
ताले के लेंड़ई आ नेती के छींटा
गोरुवा-बछरुवा-लइकवा जियवलीं
अब लागी मुँहें अहार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!

चइती में जौ-मटर, गेहूँ-चना, अरहर, सरसों सब कुछ बा। सिंचाई क पुरान, परंपरिक साधन गड़ही, ताल कुआँ। बरखा क बटुराइल पानी उबिछि के भा, ‘ढेंकुल’ – ‘मोट’ चला के पहिल सिंचाई होइयो जाय त पूस-माघ का सितलहरी के दुख अलगे बा। नियति के मार कहहीं लायक नइखे, कबो-कबो कम बरखा का चलते कुइँयों क पानी पताले चल जाला…. ”गइले पताले इनार हो सजनी!“ कटिया का पाछा के दुख आ चिन्ता-फिकिर कवि का भीतर अलग बा आ, अनाज होते बसूली, मलगुजारी आ साहू क तगादा के भय अलग। किसान का अंतरमन का व्यथा-कथा के उकेरत खा कवि केहू के नइखे बकसत। हाकिम, दइब, सरकार सबका हृदयहीनता पर किसान का मुँहें कारुणिक टिप्पनी जरूर करावत बा –

पुसवा आ मघवा बिपतिया क खनिया
एही में कुड़की सभापति के घुड़की
ढेबुआ की खातिर उजारे पलनिया
हाकिम दइब हतियार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!

‘कविता’ के ‘गुनीजन’ लोग सहिये कहले बा कि ‘जथारथ’ के जस क तस परोस दिहल कविता ना हऽ। परोसहूँ के लूर-ढंग चाहीं। मोती बी0ए0 कविता- कला के सिद्ध; कइले रहलन। उनका पता रहे कि उक्ति के काव्यात्मक बनावे खातिर ‘जथारथ’ से कतना लेबे आ कतना छोड़े के चाहीं। कविता खाली कवि का इच्छा जगले से ना बने, रचना-रूप में आवत-आवत ऊ ‘कला’ में बदल जाले, जवना के कवि क काव्य-विवेक साधेला। मोती जी अपना एह लमहर कविता में खेतिहर जिनिगी के जथारथ का उल्लास, प्रेम आ सपना का साथ, चिन्ता-फिकिर आ बिसंगतियनो के उकेरे के कोसिस कइले बाड़न।
उनका कविता में स्रम-संघर्ष का संगे भविष्य के आस आ उमेद बा, नीमन के कामना बा। संकेत भा उक्ति-वक्रता का जरिये, बिडम्बना पर प्रतिरोध खातिर अइसन टिप्पनियो बा, जवना से पाठक का मन में करुण टीस उदबेग आ क्षोभ पैदा होत बा। एह लमहर कविता का कुछ ‘बन्द’ के आखिरी पाँतियन से एह बात के खुलासा होत बा –

बिटिया न रहिहें कुँवार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!
— — —
रोवें किसान धके हाथे कपरवा
छवलसि अकासे अन्हार हो सजनी…
— — —
दुअरा उदास, सून लागे खरिहनवा
बउक भइल सरकार हो सजनी
कटिया के आइल सुतार!

श्रमजीवी किसान भा बनिहार का नियति, दुख आ पीर का दिसाईं साहूकार, सरकारी नुमाइन्दा आ हाकिम के हृदयहीन व्यवहार, सीधा-सादा भोला-भाला गँवई लोगन से ओके दूर क’ देला आ उनहन लोग क ‘छवि’ ‘हतियार’ क बना देला। इहे ना एह सब से आँख मूने वाली सरकार ‘बउक’ (मूरुख) के संज्ञा पावेले।

मोती बी0ए0 ‘लोक’ का भाव-भूमि से जवन जीवन-रस पवले रहलन, संवेदन आ अनुभूति का स्तर पर जवन जियले-बुझले रहलन, ओके इमानदारी से उरेहे के सार्थक कोसिस कइलन।उनका कवि-कर्म में निष्ठा आ लोक का प्रति आत्मीय ‘प्रतिबद्धता’ (कमिटमेन्ट) रहे, ठीक ओइसहीं, जइसे कवनो स्रमजीवी-किसान के अपना खेत आ कृषि-कर्म से होला। खाँटी खेतिहर-किसान, ‘बलाय टारे वाला ढंग से’ खेती क काम ना करे, ऊ जवन करेला मन-प्रान से करेला, अपना जीवे-जँगरे उठा ना राखे। ओके अपना कर्म पर आस-भरोस रहेला। मोती जी अइसने निष्ठा से ‘कविता’ रचलन। कृषि-कर्म में लागल लोगन का प्रति उनका आत्मीय-भाव के दरसावे वाली उनकर अउरियो कविता बाड़ी सऽ, जवना पर आगा चर्चा होई।

अबहीं त हमहूँ उनका कवि का सँगे-सँगे श्रम-शक्ति आ श्रम-औजारन के धन्य-धन्य कहत नइखीं अघात –

”धनि रे गुजरिया के खुरुपी पियारी
धनि रे सँवरिया के फरुहा कुदारी!
चलऽ, चलीं बैलन के ले लीं बलइया!!“


(भोजपुरी दिशाबोध के प्रतिनिधि पत्रिका पाती के मार्च 2008 अंक से साभार)

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