– जयन्ती पाण्डेय

पिछला दिने लस्टमानन्द दिल्ली गइल रहलन. का कहीं का नजारा रहे. जब से दिल्ली में मेट्रो रेलगाड़ी चले लागल तबसे ओहिजा का लोगन का जिनिगी में बहार आ गइल बा. कालेज जाये वाली बबुनी के रोमांस करे के एगो नया जगहा भेंटा गइल बा. अब जब बबुनी के मोबाइल टुनटुनाता त ऊ गते से कहऽतारी, अबही फोन मत करऽ, मेट्रो में भेंट होइ!

रउआ जइसही मेट्रो स्टेशन में घुसब, सीढ़ी पर बइठल कई गो लोग लउक जाई जे कान में मोबाइल लगवले गते गते अपना संघतिया से बात करत होई. आपन काम धाम कर के जब लवटब त देखब कि दू घंटा बादो उहे लइकी ओहिजी बइठल बतियावत बिया. अब का कइल जाय? बहरी का घाम से इहिजा निजात बा. जब दिल्ली युनिवर्सिटी से मेट्रो केंद्रीय सचिवालय खातिर चलेले त ओमे ना जाने कतना सौ दिल समा जाला. सबके एहिजा खुल के बतिआवे के मौके भेंटाला, काल्हु कहवाँ मिलल जाई इ सब कुछ आजे तय हो जाला. पहिले केतना दिक्कत होत रहे. याद करीं, बस के धक्का आ ओहिमें लटकल भीड़. गरमी में अतना पसीना होखे कि आधे घंटा में कपड़ा से टप टप पानी चुए लागत रहे. शीला जी भले हमनी देहतियन के भाव नाहीं देली अउर कुल गंदगी के जिम्मेदार हमनियेके ठहरावेली, बाकिर दिल्ली के सब कोना में मेट्रो चला के ऊ बड़ा उलकार कइले बाड़ी. अब केहू से मिले के टाइम तय करे के बा त बस इहे कह दे ता लोग कि फलाना मेट्रो स्टेशन का सीढ़ी पर मिल जइहऽ. ओहिजा से साथ हो लिहल जाई.

एह फेरा में देखनीं कि एक दिन मेट्रो में एगो नउकी भउजाई चढ़ली. उनुका मेट्रो के माहौल एतना नीमन लागल कि एहिजे भइया का संगे लिपटे लगली. बेर बेर भईया से चिपकल जात रही. भला बस में चले में ई सुख उनका कहाँ भेंटाइत? कइ गो प्रेमी प्रेमिका त मेट्रो के पहिलका स्टेशन पर रेलगाड़ी में बइठ जाता, फेरू लवटि के दू घंटा बाद एहिजे आ जात बा. भला एकरा से सेफ जगह कहाँ भेंटाई. एइसन सिचुएशन में एगो गीत याद आइल. दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके चुपके. बाकिर दिल्ली का मेट्रो में त खुला खेल फरुखाबादी बा. इहवों दू दिल मिल रहल बा बाकिर खुल के. कलकत्तो के त कमोबेस इहे हाल लउकऽता. नइखे विश्वास त जाईं तनी पार्क स्ट्रीट. तनी मेट्रो स्टेशन घूम आईं.

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