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– जयंती पांडेय

ओह दिन साइत बिगड़ल रहे कि आंगछ खराब रहे. गाँव के लरिका मधुमाछी के छत्ता में ढेला मार के परइले सन. ओने रामचेला जेठ के दुपहरिया में पछुआ के झोंका के कम करे खातिर आँख मुलमुलावत पेड़ का नीचे आगे के ठाड़ भइल रहले. दू गो माछी कुठावां बिन्ह दिहलीं सन.

दरद के मारे दुपहरिए में जोन्ही लउके लागल रहुवे उनका. का करस, पहिले उत्पाती लइकन के खबर लेस कि दवा के इंतजाम करस इहे सोचत बुड़बक लेखा ठाढ़ा रहलें कि देखलें कई गो माछी उनका कपारे पर घुमरीपरौंवा खेलत बाड़ी सन. ऊ सरपट्टा भागे लगलें.

अतने में पाछा से एगो नवछेड़िया लइका मोबाइल फोन लिहले दउरत आइल, हाथ जोर के कहे लागल, “ऐ काका, गोड़ लागतानी. आपना संगे एगो सेल्फी खींच लेबे द, पड़ा पुन्न होई.”

रामचेला अचरज के मारे तनि देर खातिर आपन तकलीफ भुला गइलें, पूछलें, “ए बबुआ, ई कब से फोटो खींचावल आ गंगा नहाइल बरोबर होखे लागल?”

लइका रोअइन मुंँह बना के कहे लागल, “ए काका, साल से उप्पर भइल, फेसबुक पर बानी. हमा सुमां गाँव वालन के केहु पूछते नइखे. रऊवां मान जइतीँ त एगो एक्शन सेल्फी बन जात.”

“अच्छा!”

“हँ ए काका, हम रउवा संगे मछिअन अउर पाजी लइकनो के फोटो खींच के फेसबुक पर अपलोड करब. रउवे बुझीँ कि ई अइसन सिचुएशन बा कि बहुते लाइक आ कमेंट मिली. हमहूं के दुनिया जान जाई कि केहु बाटे!”

रामचेला के देहिं आग लाग गइल. ऊ किचकिचा के कहलें, “अरे घोड़ाराम. ई फोटो से तोर गुमनामी ना कटी, कवनो नीक काम कर तब दुनिया अपने आप तोहरा के खोजी, जयजयकार करी.” उनकरा खिसियइला से लइका निराश हो के भुईंया बइठ गइल.

कोरा में फोन राख के कहे लागल, “का बताईं ए काका, जवार में बाढ़ि आइल, सात गो कतल भइल, खसरा फइलल, फागुन में बरखा से गेंहू पलर गइल, इस्कूलन में मास्टर नइखन आवत… हम सब मौका पर रहनी. फोटो खींचि के डलनी लेकिन केहू ना पूछल. जानऽतारऽ एक ओर हमार एतना मेहनत आ दोसरा ओर मऊगी बाड़ी सन. तनि सा अंचरा टारि के, तनि सा टेढ़िया ताकि के सेल्फी डाल देत बाड़ी सन, आन्हीं मे आम नियर कमेंट चुअता.”

रामचेला फूल के कुप्पा भइल आँख सोहरावत कहलें, “ले ल बाबू सेल्फी, अब तोहार दुख देखल नइखे जात.”

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