– जयंती पांडेय

पाकिस्तान आ भारत के प्रधानमंत्री लोग बतियावता कि झगरा मेटा लिहल जाउ लेकिन झगरा मेटी का? कबहुओं ना. ई झगरा ओइसने बा जइसन खदेरन आ मनरखन के झगड़ा. ई झगड़ा के चर्चा गांव भर में रहे. दूनो जाना पड़ोसी आ दूनो में भारी झगरा. रामचेला दुपहरिया में बाबा लस्टमटनंद के मड़ई में अइले आ आवते कहले, बाबा हो, अरे मनरखन आ खदेरन के समझावऽ ना कि दूनो जाना चैन से रहो लोग आ गांव भर के बेचैन होखे से बचावे लोग.
बाबा कहले, देखऽ हमनी के अच्छा पड़ोसी बने के चाहीं लेकिन ई जान ल कि अच्छा पड़ोसी भागे से भेंटाला. अच्छा पड़ोसी के गुण निर्धारित कइल बड़ा कठिन काम ह. काहे कि कब ऊ अच्छा ना रही ई त भगवानो ना जानेले. अच्छा पड़ोसी आ अच्छा पटीदार हमेशा अपना पड़ोसी इयोर कान आ आंख लगवले रहेला आ ओकर फाटल में आपन गोड़ फंसावत रहेला. पड़ोसी आ पटीदार के पुरान शौक ह कि ऊ दोसरा में गोड़ लगवले रहेला. ओकरा हर मामला में इंटरेस्ट राखेला.
इहां ले कि खाए में तीनो बेरा दाल बनऽता, काहे बनऽता, नया तरकारी बजार से कीना के आइल त काहे आइल, सब मालूम करेला. एकर माने रामचेला ई मत समझिह कि ऊ तहरा प्रति संवेदनशील बा. अब देखऽ कि हमनी के एगो पड़ोसी बा पाकिस्तान. ऊ हमनी के देश के तरक्की से हरान बा. कभी हमनी के जवान के मूड़ी काट के ले जाला, त कबो देश में अशांति फइलावे के चक्कर में रहेला. ई दोसर बात ह कि ओकरा अपना देश में लोग के जिनगी जनावरो से ओने बा. अब गांव में देखऽ जे पड़ोसी के लइका इम्तहान पास क गइल त ओकरा पेट में कलछुल घूमे लागेला. तहरा घर में रंग पोताई होखो त ओकरा घर में चूल्हा ना जरी. अच्छा पड़ोसी के ई पहिला काम ह कि ओकर पड़ोसी कबो चैन से ना रहे. अब देखऽ पाकिस्तान के काम.
अरे अपना गांव के कई लोग का हमनी के देशो भाग्यवान बा कि ओकरा चारू इयोर अच्छा पड़ोसी बाड़े सन. एक ओर पाकिस्तान बा त दोसरका ओर चीन. बाँया ओर बंगलादेश त नीचे श्रीलंका. एक से एक पड़ोसी. एक से एक नीच. पिछला 65 बरिस से आपन देश ओकनी से संबंध सुधारे के कोशिश में बा पर काहे के ऊ सुधरो. सब लोग व्यापारिक संबंध त ठीक राखे के चाहेला पर समान कीने खातिर पइसा ना रहो एतना हरान करेला. रिश्ता सुधारे के फिराक में कई हाली खून बहल बा कई हाली जान गइल बा. पर रिश्ता ना सुधरल. रेल चलावल गइल, रोड बनल पर अब का कहल जाउ जेकरा कवनो लूर नइखे उहो लागऽता ज्ञानी बने. अब का कइल जाउ मजबूरी में हाथ चलावहीं के परेला.
अब ऊ त कहेला कि तूं पड़ोसी बाड़ऽ त हाथ गोड़ चलाव , काटऽ आ डांटऽ लेकिन हमार देश बा त कहऽता ना भाई ना, शांति से रहऽ. इहे हाल अपना गांवों के बा. तू मूड़ि पटक के फोर लेब तबो मनरखन आ खदेरन के झगरा बनऽ ना होई, एकरा से नीमन बा कि आपन फिकिर करऽ आ चुपचाप कान में तेल डाल के सुत जा.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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