– जयंती पांडेय

अण्णा के अनशन देखि सुनि के बेचैन रामचेला बाबा लस्टमानंद से कहले, बाबा ई सब का हो ता ? बाबा कहले, ई गीता के नया ज्ञान के अवसर ह, भ्रष्टाचार मेटावे के महाभारत में दुनु इयोर से मोर्चा तइयार ब. दुनु इयोर के लोगन के देखि के बुझाता कि एक इयोर धधकत लुकारी बा त दोसरा इयोर टिमटिमात ढेबरी. आ युद्ध स्थल पर अर्जुन नाहिन किंकर्तव्यविमूढ़. जनता हरान. काहे किई पूरा युद्ध ओही के नांव ले के हो रहल बा. आरोप प्रत्यारोप के बवंडर बादर पर ले चहुँप गइल बा. दुनुं तरफ नर नाहर लोग बाँहि चढ़वले तइयार बा. जनता बेचारी का करे. अइसन हालत में बार बार आपन आँखि मलग आम जन न्यूज कवरेज करे आइल अपना कैमरादिक हथियारन से सज्जित अपना हाथ में माइक थमले रणभूमि में ठाड़ एगो मीडियाकर्मी से प्रश्न करऽता, हे फटाफट समाचार प्रदाता, हमार मन आजु बहुत व्यथित बा. आप ज्ञानीलोगन में श्रेष्ठ हईं. ताजा स्थिति से भलीभाँति अवगत रहीले. कृपा कऽ के हमरा बताईं कि सदाचारी लोगन के ई व्यूह आ भ्रष्टाचारिन के भारी भरकम फौज के परम पराक्रमी आ महारथी अउर अनेक तरह के हथियारन से सज्जित निर्लज्ज वाक् युद्ध में निपुण नर पुंगवन में आजु जवन संग्राम हो रहल बा ओहमें केकर जय होई ? के पराजित होई आ हमनी के का होई ?

तब आम जन के एह आर्त वचन के सुनके ऊ मीडियाकर्मी अइसन बचन कहलसि, हे जनता जनार्दन, ई सदाचारी आ भ्रष्टाचारी के कार्यकलाप देखि के कबहुओं विचलित मत होखीहऽ. दूनो के संबंध दूध आ पानी वाला होला. जे सदाचारी बा ऊ भ्रष्टाचारिओ बा, आ जे भ्रष्टाचारी बा ऊ सदाचारिओ होला. ई समुझे खातिर तोहरा ई समुझे के होखी कि आज जे बहू बा काल्हु सासु होई आ आजु से सास हऽ ऊ काल्हु बहू रहल. हे भाई, जइसे आत्मा आ परमात्मा अपना मूल स्वभाव में एके होला तबो फरका फरका लउकेला. इहे भ्रष्टाचार आ सदाचारो के समुझऽ. द्वैत आ अद्वैत के दर्शन के गुत्थी का समान इहो एक दोसरा से गुत्थमगुत्था बा. हे प्रिय भाई, ई मनुषय के जीवन भौग के निमित्त बनल बा. इहे ज्ञान से भ्रष्टाचारी लोगन के अंतःप्रेरणा आ अवसर प्राप्त होला. सदाचारी लोग अइसन अवसर पर पेंड़ा जोहेला. जब सदाचारी के ई दिव्य ज्ञान के प्राप्ति हो जाला त उहो भ्रष्टाचार में प्रवृतहो जाला. एही से तूं सब लोग हमार बाति के ध्यान से श्रवण करऽ. तत्पश्चात एह पर शांति से ममन करऽ. सब कुछ स्वतः स्पृ्ट हो जाई.

तब ओह मीडियाकर्मी के एह भाँति कहल वचन सुन के आम जन के लगभग बंद हो गइल आँखि आधा खुल गइल. ऊ थपरी पार के हँसे लागल आ बोललसि, अहा ! आजु हमार दिव्यचक्षु खुल गइल. हम जान गइनी कि सदाचार आ भ्रष्टाचार समय, स्वार्थ आ सुविधा के अनुसार स्वीकार्य आ त्याज्य होला. एहिसे सिद्धांत में सदाचारियन के संगे आ व्यवहार में भ्रष्टाचारियन का संगे रहले एह जीवन के सफलता खातिर श्रेयस्कर हऽ.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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