Ram Raksha Mishra Vimal

आजु विजयादशमी ह आ हमार प्रिय मित्र डॉ. विजय प्रकाश एह घरी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहल बाड़े. मन भरल रहल हा. बाकिर एगो पुरान डायरी पलटत खा उनकर कुछ एसएमएस मिलल बा. मन फेरु चुलबुल हो उटल. फेरु ऊहे मिजाज,ऊहे अंदाज. 02.10.2006 के ऊ लिखलन-
विजय सत्य की हो असत्य पर
संबंधों का रंग हो गहरा
प्रेम पुलक से भरा समुज्ज्वल
मंगलमय हो विमल दशहरा.

हम अपना आदतबश भोजपुरी में लिखलीं-
दारिद दशानन पर विजय दशहरा ह
गमगम उमंग भरल जीवन दशहरा ह
रच जाए बस जाए मन में दशहरा
सजके सँवर जाए तन में दशहरा.

पन्ना पीछे पलटलीं त 23.9.2006 के कुछ अउर एसएमएस मिलल.मन फेरु चुलबुल हो उटल.फेरु ऊहे मिजाज,ऊहे अंदाज.

विजय-    तीन दिनों से बारिश बारिश
मन अब ऊब चला है
चलो चलें मन मित्रों के घर
दस्तक देकर देखें.

विमल-    मन एतना उबियाइल बा
अपना दुखबारी से
कवनो सुख के बात लगेला
मीत उधारी से.
बारिस आई बारिस आई
मन के काई कइसे जाई
पाती तहरो पवलीं त
लागल पहिला दिन फिर आई.

साँचो दुर्गापूजा में हइसे बरखा होला ? चारू ओरि पानी-पानी आ काँच-कीच. तूफान के नाँव से सभकर साँस टङाइल बा, से अलग. मन लवटल. आजु विजयादशमी ह. बिल्कुल पोजीटिव थिंकिंग, हार के कवनो चर्चे ना. जइसे फगुआ में बैर आ नफरत भुलाके सभ राग रंग में डूबि जाला, ओसहीं आजु ‘हार’ शब्द के त मन में आवही ना देबे के चाहीं.

आजु खाली जीत आ विजयी रहे के बात होखे
हार भय संशय कहीं से आ न पावे पास मन के.

आरे भाई, ई त कविता हो गइल. माने के परी अपना पूर्वज लो के. अतना सोचि समझिके काम करत रहे लोग. आजु-काल्हु पच्छिम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृ दिवस,पितृ दिवस,महिला दिवस आदि आदि मनावे के काम जोर-जोर से चल रहल बा बाकिर हमनी किहाँ त हजारन बरिस पहिले से तीज,जिउतिया के बरत धूमधाम आ सावधानी से मनावल जाला आ छठ के परब त अब डिठारे हो गइल बा. हमरा संस्कृति में हर काम खातिर बैनर के जरूरत नइखे बूझल गइल.

कुछ दिन पहिले कोलकाता के एगो प्रसिद्ध अखबार के विशेषांक के मुखपृष्ठ पर बड़‍बड़ टह-टह लाल अक्षरन में विजयदशमी पढलीं. मन अचकचाइल. बहुत दिन बाद कवनो बुद्धिजीवी कड़ा इस्टेप उठवले बा अपना पूर्वजन पर. आखिर गलत चीज के कब तक झेलत रही आदमी आ ऊहो मीडिया से जुड़ल आदमी. ताकत आ प्रभुत्व के खुशबू से गमगमात मन शांत कइसे बइठी ? एक मन कहलसि कि प्रूफ के गलती होई. दोसरका मन कहलसि कि देखत रहिह, एक दिन ‘एकादश’ का जगहा ‘एकदश’ लिखल पढेके मिली. त हम का करीं मए गिनती आ पहाड़ा ठीक करे के हमरा के प्रभारी बनावल गइल बा ? अबकी पहिलका मन समुझवलसि- भाई परेशान भइला के जरूरत नइखे. हमनी किहाँ पाणिनी आ पतंजली गली-गली में भेंटा जइहें. ‘विश्वामित्र’ का जगहा ‘विश्वमित्र’ पढेके कबो नइखे मिलल का ?

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