8वीं अनुसूची आ आठ गो बाधा

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(दुनू फोटो अभिषेक भोजपुरिया के फेसबुक वाल से शशिरंजन मिश्रा के भेजल. बाँए मंच पर नेता लोग आ दाहिने करीब ओतने जनता.)


आजु दिल्ली में कुछ भोजपुरी प्रेमी लोग भोजपुरी के संविधान के 8वीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर धरना प्रदर्शन करे वाला बाड़ें. सोचनी कि काहे ना आजु एही पर सोचल जाव कि भोजपुरी के एह मान्यता मिले का राह में कवन कवन बाधा बा आ ओकरा से कइसे पार पावल जाव. हम अइसन आठ गो बाधा देखत बानी जवना से पार पवला बिना भोजपुरी के निस्तार नइखे होखे वाला.

1. हिन्दी वालन के साजिश

सबसे पहिला बाधा बा कि हिन्दी पैरवीकार ना कबो चहलें ना अबहियों चाहत बाड़ें कि हिन्दी के उपनिवेश बना के राखल भाषा आजाद होखऽ सँ. एगो सोचल समुझल रणनीति का तहत भोजपुरी आ अउरिओ अनेके भाषा के हिन्दी के उपभाषा का रूप में वर्गीकृत क दीहल गइल. जनगणना से भोजपुरी भाषियन के सही संख्या सामने ना आवे एह चलते एकरा के भाषा के मान्यते ना दीहल गइल आ बोली कह के पेंच फँसा दीहल गइल. अबहियों हिन्दी के पैरवीकार एकरा राह में पच्चर फँसावत बाड़े आ फँसावत रहीहें.

2. भाषा ना मानल जाव

दुसरका बाधा हमरा समुझ से ई बा कि भोजपुरी के सरकार भासे ना माने आ एकरा के बोली भा हिन्दी के उपभाषा मान लिहले बिया. एहसे सबले पहिला डेग त ई होखे के चाहीं कि एकरा के गैर अनुसूचित भाषा मानल जाव आ ओह सूची में शामिल कइल जाव.

3. स्कूलन में पढ़ावल ना जाव

भोजपुरी कवनो इलाका के कवनो स्कूल में पढ़ावे के माध्यम नइखे. एकरा पीछे कई गो कारण बा. कवनो राज्य सरकार ना चहली सँ कि अपना राज्य में भोजपुरी के एह जोग बने दीहल जाव कि आगे चल के भोजपुरी राज्य के आन्दोलन तेज हो जाव. जबले भोजपुरी भाषा का आधार पर एगो राज्य ना बन जाई तब ले भोजपुरी के सरकारी काम काज के भाषा ना बनावल जा सकी. आ सरकारी काम काज के भाषा ना बनी त रोजी रोजगार के भाषा ना बन पाई.

4. मानक भोजपुरी पर कवनो एकराय नइखे

चलीं थोड़ देर ला मान लीहल जाव कि भोजपुरी के 8वीं अनुसूची में शामिल कर लीहल गइल बा. अब एकरा के इम्तिहानो देबे के मौका मिल गइल. त कवना भोजपुरी के सही मानल जाई? भईल लिखाई कि भइल? भी के इस्तेमाल करत संज्ञा रूप बदले से बचल जाई कि ना? के तय करी आ कइसे तय होखी? परीक्षार्थी के लिखल सही मानल जाई कि जाँचे वाला के जिद्द?

5. भोजपुरी लिखे बोले वाला जतना होखसु पढ़निहारन के कमी बा

अब जब स्कूलन में भोजपुरी पढ़ावले ना जाय आ सभे हिन्दी के माध्यम से पढ़ेला त ओकर आदत बन जाला हिन्दी उचारे के. भोजपुरी के खासियत ओकरा समुझे ना आवे. ऊ त ह्रस्व आ दीर्घ भर जनले बा लघु ह्रस्व आ दीर्घ दीर्घ से भेंटे ना भइल कबो. बोले आ लिखे के त लोग बोल आ लिख लेला बाकिर पढ़े में तरहा चटके लागेला! आ भोजपुरी पढ़निहारन के कमी का तरफ कवनो धियाने नइखे दीहल गइल.

6. कवनो बड़ प्रकाशन नइखे

चूंकि भोजपुरी पढ़ेवालन के कमी बा त भोजपुरी के पत्र पत्रिका कबो सार्वदेशिक ना हो पइली सँ. हर पत्रिका एगो खास गोल में समेटा के रह जाले. छापे वाला अपना पाकिट से निकाल के दू चार सौ कापी छपवा लेला आ अपना लोगन में बँटवा देला. हो गइल पत्रिका के प्रकाशन. ना त गाहक बनेलें ना लोग ओकरा के पढ़बे करेलें. किताब पत्रिका सादर भेंट में मिलल आ सादर ताखा पर धरा गइल. पढ़े के सउर होखो तब न केहु पढ़ो! आ जब पढ़ी ना त खरीदी काहें? खरीदी ना त कवनो बड़का प्रकाशन बनी कइसे? आ कवनो बड़का प्रकाशन होखी ना त भोजपुरी वालन के समस्या, ओकर आन्दोलन, ओकर सरोकार सामने आई कइसे? अबहीं त हाल ई बा कि भोजपुरी के सगरी संस्था आपन विज्ञप्तिओ भोजपुरी में ना जारी करस.

7. जन आन्दोलन के कमी

भोजपुरी के सरोकार ले के आम जनता के जागरूक करे के कवनो कोशिश ना होखे. कुछ लोग मिल बइठ के तय कर लेला. अपना अपना चिन्हार लोग के फोन फान क के बोला लेला. हो गइल बइठक, धरना आ प्रदर्शन. अखबार में छप गइल, फोटू खींचा गइल. कुछ नेतवन से जान पहचान होखो त ओहनी का साथे फोटू खींचा लीहल गइल आ कबो अकादमी फकादमी बने त ओहमें घुसे पइठे के जोगाड़ बनावे लागल जाला. बाकिर कबो एह खातिर जमीनी स्तर पर कवनो काम ना होखे. पटना लखनऊ में, आरा बलिया छपरा में आन्दोलन ना चलावल जाव सीधे दिल्ली में क लीहल जाला.

8. भोजपुरी संगठन में एकाधिकारवाद

जन आन्दोलन ना चलावे का पीछे सबले बड़का डर होला कि कुछ दोसर लोग सामने मत आ जाव आ आपन पकड़ छूट जाव संगठन पर से. हर संगठन कुछ लोग के थाती आ पुश्तैनी जायदाद बन के रह गइल बा. एक आदमी अपना मनमर्जी से संगठन चलावत बा. दोसरा के आगे नइखे आवे देत. अपना चाटुकारन के अलग अलग इलाका के मनसबदारी दे के अपना के सुल्तान मान लेत बा. जबले एह तरह के घटिया सोच वाला लोग भोजपुरी के संस्था संगठन पर हावी रहीहें तबले भोजपुरी के मान्यता मिले के उमेद नाहिए कइल बेहतर रही.

आशा करत बानी कि भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट बनावे आ बारह बरीस से भोजपुरी के हजारन पेज प्रकाशित करे वाला एह वेबसाइट के उठावल मुद्दा पर चरचा होखी, गरिया धमका के आपन बात उपर करे के कोशिश ना होखी. हम नइखीं मानत कि हमहीं सही बानी त रउरो मत मानीं कि रउरे सही बानी. आपन आपन बात कहल जाव. चरचा बढ़ावल जाव. जेहसे आगे चल के एगो एका पर चहुँपे के राय बन सको.

– ओम प्रकाश सिंह
प्रकाशक, अँजोरिया समूह

Comments 1

  • राउर लेख बहुत हड़ाह बा । भोजपुरी के दुर्दशा बा की जे भी अगुआ बने के कोशिश करत बा उ आपन स्वार्थ के आगे राख़ के अगुआई कर रहल बा । जन आंदोलन के भी इहे हाल बा, आंदोलन के नेता लोग जन जागरण कम , आपन नाम अधिका चमकावत बा । बिना कवनों तैयारी के चार लोग के भीड़ जुटाके खाली धरना प्रदर्शन कईला से भोजपुरी के आवाज कईसे गूंजी ? भोजपुरी के मान्यता खाति जवन तकनीकी दिक्कत बा ओहमें बे सिर पैर के आंदोलन आ धरना भोजपुरी के राह दूभर कर रहल बा ।

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