पत्थर के देश में पत्थर के लोग

by | Apr 20, 2010 | 0 comments

– जयन्ती पाण्डे

रउआ कहीं चल जाईं, भारत के कवनो कोना में. सब जगहा रउआ पत्थर दिल के लोग भेंटाई. आखिर काहें ना? जेकरा पर जिम्मेदारी बा कि ऊ सबके आदमी बनाई. ओकरो दिमाग में पत्थरे भर गइल बा. हँ, बात मास्टर लोग के कइल जाता. आज के मास्टर लोग गुरुजी ना हऽ, ऊ त माह-टर बन गइल बा लोग. हाली हाली माह टरे आ अउर आपन मेहनताना वसूल के उहो लोग घरे जाव. रहल सवाल लइकन के पढ़े लिखे के त ओकर परवाह केकरा बा? लइका के माई बाप ढेर सवाल जवाब करे वाला होखी त लइका के परीक्षा में नकल करा दिहल जाई. लइका पूरे नम्बर पा जाई त ओकर माइयो बाप के कवनो शिकायत ना रह जाई. लइको खुश.

सर्टिफिकेट ले के बौराइल फिरी. नौकरी एह घरी कवनो पढ़ला लिखला पर थोड़े मिलत बा. ए घरी नौकरी खातिर पढ़ाई कइला पर पाँच लाख से कम में कवनो पढ़ाई नइखे हो सकत. एमबीए के डिग्री नइखे त कवनो बढ़िया नौकरी में पुछल ना जाई. एमए, बीए त कवनो मतलब के पढ़ाईये नइखे रह गइल. एहिसे कवनो चपरासियो के वांट निकलऽता त एमए अउर बीए पास लोगन के भीड़ टूट पड़त बा. कई बेर रउरोलोग अखबार में पढ़ले होखब कि मलेटरी का बहाली में भगदड़ मच गइल अउर कइ गो लइका दबा के मर गइल. साँचे, ई दुनिया पत्थर के हो गइल बा!

लोग के मनमिजाज सब बदल गइल बा. आज लोग के एक दोसरा के परवाह नइखे. माह-टर लोग के पढ़ावल लइका जब स्कूल कालेज फांद के जीवन के तमाम क्षेत्र मे उतरऽता लोग त ओइसहीं धकियावऽता, एक दोसरा के नकल करऽता. गाँव जवार के लोग एक दोसरा के चिन्हल बन्द कर दिहल. नाता रिश्तेदारी अब ससुरारी आ सढ़ुआने तक रह गइल. गाँव से एक बेर जे शहर आ गइल ऊ फेर गाँव के मुँह दोबारा नइखे झाँकत. पेड़ खूँट, घर बधार सब अकेले मानो कवनो शाप ढोवत बा. केहू के केहू से मतलब नइखे. अउर कहीं स्वार्थ पूरा होखेवाला हो तब देखीं मतलब. बगल के पड़ोसिया भाई से मुकदमा लड़ल आज गाँववालन के धरम अउर फरज दूनो हो गइल बा. कबो कहल जात रहे कि गाँव के लोग बड़ा शुद्ध विचार के होला. नेत धरम पर चले वाला. बाकिर आज देशो में हवा खराब हो गइल बा. अइसन में इहे कहल जा सकऽता कि आज पत्थर के देश में सभे लोग पत्थर के हो गइल बा.

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