राष्ट्रपति चुनाव के तैयारी में रामचेला

by | Jul 15, 2012 | 0 comments

– जयंती पांडेय

कई दिन से बाबा लस्टमानंद अपना संघतिया राम चेला से हरकल रहत रहले. अनमुन्हसारे रामचेला चलि आवस आ बाबा के घरे अखबार आते सवाचस कि का हो बाबा राष्ट्रपति चुनाव में का हो ता? एक दिन बाबा औंजिया पूछले कि आखिर तूं ई बतिया रोज काहे पूछे ल? कव हाली त ऊनका मन में आइल कि अखबरवे बन करवा दिहल जाउ कि रोज रोज के पूछला के संतापे ओरा जाउ. लेकिन ओही अखबार से नतिया सिविल सर्विस के तैयारी करे ला एही से बन करववला से घर में हुरदुंग होखे के चांस बेसी हो जाई. इहे सोचि के ऊ बंद ना करवावे खातिर मजबूर बाड़े. एक दिन उनका से ना रहल गइल त पूछलें, रामचेला आखिर रोज इहे खबरिया तूं काहे पूछे ल?

रामचेला कहले, बाबा सोचऽ तानी कि राष्ट्रपति पद खातिर आपन उम्मीदवारी ठोकिये दीं. उनकर बात सुनि के बाबा लस्टमानंद खटिया पर से ढिमलाए ढिमलाए हो गइले. लेकिन अपना के सम्हार के बोलले, अरे भाई लेकिन राष्ट्रपति हो के करबऽ का? मौज करेब, फ्री में दुनिया घूमेब, पोता पोती के घूमाएब. बाबा कहले, रेल में आ बस में त कबहीं भाड़ा ना देलऽ आ हवाई जहाज में चढ़े के अरमान! बेसी बकबक ना करे के. बेसी बकबइला से ब्लड प्रेशर बढ़ जाला आ लोग मुंह फइल कहे लागेला. ई देश के लोग अपना तरीका से चली तहरा कहला से ना चली. तूं काहे आपन माथा खराब करऽ तार? रामचेला कहले, आछा ई कुल्ही छोड़ऽ, ई बतावऽ कि राष्ट्रपति होखे खातिर आदमी में का का चाहीं?

बाबा कहले, सुनले बानी कि आदमी तंदुरुस्त होखे के चाहीं, पागल उगल ना होखे चाहीं. जइसे बाबा कहले कि पागल उगल ना होखे के चाहीं, तइसे रामचेला पगलवन नाहिन हंसले आ कहले, हो बाबा तूं खाली सुनले बाड़ऽ कि सांच कह? खाली सुनले बाड़ऽ कि जानऽ तार? आउर हँ दिवालिया ना होखे के चाहीं ना पाकिट से ना दिमाग से. राम चेला फेर हंसले। तूं केतना आदमी के जानऽ तार जे दूनो से एकदम चकाचक होखे? हम त आछा आछा लोग के जानऽ तानी जे चौबीसो घंटा कटोरा उठवले रहेला. केहु पइसा मांगहे ला, केहु.. .आउर सुनऽ, आदमी के पढ़ल लिखल होखे चाहीं. रामचेला कहले, आजु काल्हु आतना पराइवेट शिक्षा संस्थान खुलि गइल बा कि गदहो पढ़ि लिहले बाड़े सन. हमार डिग्री देखबऽ? ऊ आदमी के चरित्र ठीक होखे के चाहीं. रामचेला कहले, अब त बजारि में चरित्र प्रमाण पत्र बिकाला, जेतना चाहीं ले ल. हँ, कंडिडेट के सरकार में पहुंच होखे के चाहीं. ई सुन के रामचेला के चहरा उतरि गइल. कहले, इहे त नइखे. तब त हम चुनाव ना लड़ेब. उनका ई बात से बाबा के मन हरिहर हो गइल, काहे कि एक त रोज रोज के उनका सवाल से जान बांचि गइल आ दोसरे कि एगो कंडीडेट कम हो गइल. ना त इहां प्रस्तावक घटत जात रहले.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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