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भरपेट भोजन

November 22, 2014 Editor 0

– विनोद द्विवेदी सड़क का किनारे बान्हल बकरन के झुण्ड में कुछ बकरा बीमार आ उदास लागत रहलन स. एगो बकरा दूइए दिन पहिले खरीद […]

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वीर विशाल

November 20, 2014 Editor 0

– डॉ॰ उमेशजी ओझा एगो छोटहन गांव में दीपक अपना धर्मपत्नी सुरभी आ एगो 14 बरीस के बेटा विशाल के साथे रहत रहले. दीपक के […]

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कुलछनी

October 26, 2014 Editor 2

– डॉ॰ उमेशजी ओझा नीलम के गोड़ धरती प ना पड़त रहे. खुशी के मारे एने से ओने उछलत कुदत चलत रही. एह घरी के […]

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लालच के मकड़जाल

September 20, 2014 Editor 0

– डॉ॰ उमेशजी ओझा सरोज एगो कम्पनी मे काम करत रहले. अपना पत्नी आ दूगो बेटा, सबीर आ शेखर, का साथे आपन चारिगो आदमी के […]

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बदला के आगि

August 14, 2014 Editor 1

– डॉ॰ उमेशजी ओझा प्रशांत एगो ट्रेवल्स एजेन्सी के मालिक रहले. शहर में आवे वाला यात्रियन के शहर के देखे वाला जगहन प घुमावे खातिर […]

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कांच कोइन

July 8, 2014 Editor 1

– संतोष कुमार ‘इहाँ हमरा से बड़का हीरो कवनो बा का ? हम अभिए चाहीं त निमन निमन जाने के ठीक कर दीं’ – किसुन […]

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सखी

July 3, 2014 Editor 1

– डा॰ गोरख प्रसाद मस्ताना लोर से भरल आँख अउरी मुँह पर पसरल उदासी साफ साफ झलका देला कि कवनो परानी दुख में केतना गोताइल […]

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बरम बाबा (संस्मरण)

– केशव मोहन पाण्डेय हमरा गाँव के बरम बाबा खाली पीपर के पेड़े ना रहले, आस्था के ठाँव रहले, श्रद्धा के भाव रहले. सामाजिक, पारिवारिक […]

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भूत होला का ?

April 5, 2014 Editor 2

– ‍नीमन सिंह बात १९८० के बरसात के समय के ह. हमरा खेत में धान रोपे खातिर बेड़ार में बिया उखाड़े लागल मजदूर बिया उखाड़त […]

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माई के सवाल

February 2, 2014 Editor 0

– संतोष कुमार माई रे, इ नान्ह जात का होला? सुरुज आपना माई से पुछलें. जाड़ा के रात खानी खाना खाये के बेरा सूरज चूल्हे […]

भाव के खरिहान में ‘कठकरेज’

September 2, 2013 Editor 6

– ओमप्रकाश अमृतांशु कला-साहित्य कवनो भाषा में होखे ओकर महत्व सबसे उपर होखेला. साहित्य समाज के रास्ता देखावेला, अपना साथे लेके चलेला आ अपना संस्कृति […]

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प्रेम के लहर

May 27, 2013 Editor 2

– केशव मोहन पाण्डेय जमाना बदलऽता, एकर लछन शहर से दूर गाँवो-देहात में लउकऽता. अब ठेंपों छाप लोग के बात-व्यवहार में जमाना के नवका रूप […]

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महतारी

April 17, 2013 Editor 1

– केशव मोहन पाण्डेय जोन्हिया काकी पता ना केतना दिन के भइली कि टोला भर के सभे काकीए कहेला. ऊ अपना टूटही पलानी में अकेले […]

उ बोलवले रहली

March 31, 2013 Editor 1

– राज गुप्त सुन्दर सिंह सीतापुर के राजा रहले. सीतापुर राज के एगो रसम-रिवाज रहल कि हर दशहरा पर दुर्गा जी के बरात सजि-धजि के […]

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भोजपुरी भाषा साहित्य के एगो नया पहिचान दिहलसि "पाती"

March 18, 2013 Editor 2

“भोजपुरी दिशाबोध के वैचारिक साहित्यिक पत्रिका “पाती” एगो अइसन रचनात्मक मंच ह जवन भोजपुरी भाषा साहित्य के एगो नया पहिचान दिहलसि. एकरा रचनात्मक आंदोलन से […]

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पोसुआ

February 27, 2013 Editor 2

– डा॰अशोक द्विवेदी दूबि से निकहन चउँरल जगत वाला एगो इनार रहे छोटक राय का दुआर पर. ओकरा पुरुब, थोरिके दूर पर एगो घन बँसवारि […]

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लिट्टी

January 5, 2013 Editor 1

– केशव मोहन पाण्डेय चार-पाँच दिन से रोज गदबेरे कुक्कुर रोअत रहलें स. बुझात रहल कि ए गाँव में जरूर कुछ बाउर होई. सावन के […]

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आगी

October 22, 2012 OmPrakash Singh 0

– डा॰अशोक द्विवेदी जाड़े ठिठुरत, गांव के लोग, सांझि होते आड़-अलोत दुआर-मड़ई भा कउड़-बोरसी धऽ लेला. जे जहां बा, आ जइसे, सांझि के देंहि चीरत-सितलहरी […]