– ओ.पी. अमृतांशु

मोर भईया बसेलें महंगा मनेर,
ले ले अइह हो भईया कुलिया-चुकियावा !
हमरा हीं देशे बहिनी कुलिया महंग भइले,
छोड़ देहूं ए बहिनी कुलिया-चुकियावा !
नाहिं छोडबो हो भईया कुलिया-चुकियावा ,
भरत बानी हो भईया तोहरो बधईया !

जगमग-जगमग रोशनी में लोक-गीत से घर-आँगन गूंज रहल बा. आँगन के एगो कोना में छोटी-मुकी घरौंदा बनल बा. घरौंदा के घेर के बईठल लइकी लोग कुलिया-चुकिया भरत बाड़ी.

ऊ लोग एकरा माध्यम से ईश्वर से अपना भाई के मंगल कामना करत बाड़ी. आखिर घरौंदा का चीज ह, आ जनमानस में एकर काहे एतना महत्ता बा ? घरौंदा यानि कि छोटी-छोटी लईकीन के बनावल छोटी-चुकी घर. खेल-खेल में बनावल ई घरौंदा खाली तेवहार के प्रतीक मात्र न ह. ई त हमार लोक -संस्कृति के यादो ताजा करेला. बदलत माहौल में आज घरौंदा अलग-अलग वेष में बाजार में आ गइल बा. बाकिर ई घरौंदा बाजार के अनुरूप व्यवसायिक लोगन के हाथे बनल बा, जेकरा में लोक -संवेदना के झलक कम बा.

दीपावली के कई दिन पहिलही से घरौंदा बनावे के शुरुआत हो जाला. छोटी-छोटी लईकीन लोग अपना-अपना कल्पना के मूर्तरूप देवे लागेली जा. घरौंदा के स्वरुप कइसन आ केतना सुन्दर बा ई एह बात पे निर्भर करता कि केकर कल्पनाशीलता कइसन बा. घरौंदा बनवला के बाद अलग-अलग रंग से रंगल जाला आ ओह पर तरह- तरह के चित्र उकेरल जाला. हाथी, घोडा, चिरई. त कहीं फूल-पत्ती से घरौंदा सजावल जाला. रंग में मुख्य रूप से गेरू, नील, चूना आ सेम के पतई से बनावल गइल रंग होखेला. दीपावली के रात में घरौंदा के अन्दर आ बाहर रंग-बिरंग के मोमबती आ दीया जरावल जाला. बहिन लोग धान के लावा आ घोड़वा मिठाई से भरल चुक्का आपन भाई के परसादी के रूप में देवेली जा, जेकरा के भाई लोग बड़ा प्यार से स्वीकार करेला.

घरौंदा बनावे आ कुलिया-चुकिया भरे के परंपरा सदियन से पीढ़ी दर पीढ़ी चलल आवऽता. बरिसन से एह परंपरा के निर्वाह कइल जाता. .यदि कलात्मक नजर से देखल जाव त ई सउँसे कला के एगो समहर रूप बा. स्थापत्य- कला, भिति-चित्र, साज-सज्जा वगैरह घरौंदा में भरपूर समाईल बा. घरौंदा आदिम संस्कृति के एगो अइसन उपहार बा जवन आजुओ भारतीय संस्कृति के हिस्सा बनल बा .

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