– राज गुप्त

RajGuptaसुन्दर सिंह सीतापुर के राजा रहले. सीतापुर राज के एगो रसम-रिवाज रहल कि हर दशहरा पर दुर्गा जी के बरात सजि-धजि के निकली. बरात राजदरबार से निकलि के दुर्गा मन्दिर तकले जाई. बरात में बैन्ड-बाजा, हाथी, घोड़ा, ऊँट के साथे-साथे तीर-तलवार, बर्छी-भाला लिहले राज के सैनिक चलिहें. हाथी पर चानी के हउदा में राज परिवार के सज्जी लोग राजसी पोशाक पहिर के निकली. ‘राजा-प्रजा दर्शन’ के नाव से आजु के दिन मशहूर रहे. ओही दिने कुछ घड़ी खातिर नौ लखा बजार लागे, जेमे राज-परिवार के लोग आपन आपन बेसाह करे. ओह समय पर प्रजा के नवलक्खा बजार में जाये के मनाही रहे. ओह दिन बनियन के मुँह मांगा दाम पर आपन सउदा बेंचे के छूट रहे. राजा के रावन-दहन कइला के बाद राज-जुलूस वापस राज-महल लवटि आवे.

पड़ोसिहा राज के राजकुमार ओह दिन आपन भेस बदलि के सीतापुर के मेला में आइल रहले. भेस बदलि के राजकुमार राजन के आवे के कारन रहे कि राजन अपना गुप्तचरन से पता लगवा लिहले रहले कि सीतापुर के राजकुमारी बहुत सुन्नर बाड़ी. ओह समय के राज्यन के राजा लोगन के इ चाल रहे कि ना त राजकुमारी के देखा-सुनी होखे, नाहीं स्वयंम्बर होखे. बहादुरी बड़ाई आ प्रसिद्धि पर राजा अपना राजकुमारी आ राजकुमार के बियहि दे. राजन सुघर-सुन्नर आ अजबे कद काठी के रहले. एह से बेमेल विआह आपन ना होखे देबे के चाहत रहले. एहसे कइगो राज्यन में आपन गुप्तचर भेंजि के पहिलहीं पता लगा लेले रहले कि कवना राज के राजकुमारी उनका जोड़-तोड़ के बिया. गुप्तचर सीतापुर के राजकुमारी ललिता के नाव पर बड़ी तजबीज के मोहर मरले रहले. राजन के भेस बदलि मेलहा बनि सीतापुर आवे के इहे असली कारन रहे. ‘राजा-प्रजा-दर्शन’ के जुलूस निकलल. हाथी पर चांनी के हउदा पर राजकुमारी ललिता बइठल रहली. राजन ललिता के देखि के मोहा गइले. गुप्तचर जवन बतवले रहले सोरहो आना सांच निकलल. ललिता अजबे सुघर-सुन्नर रहली. सुन्दराई में कवनो परीअनो के लजवावत रहली. भगवान सलहन्ते में ललिता के अंग अंग गढ़ले रहले. अजब-गजब के रचले रहले.

राजन अपना गुप्तचरन से राइ-बाति कइले. महल के कुछ दुरी पर बगइचा में वेश बदलि के डेरा डन्डा डालि लीहले. कुछ दिन बीतल, कवनो सचला-पताल ना मिलल. अंचकले में एक दिन एगो गुप्तचर राजन की लगे सनेसा ले के आइल कि राजकुमार ललिता के लउड़ी बजार जाये खातिर महल से निकलल बिया. राजन बाजार के राहि में एगो पीपर के फेड़ का तरे बइठि गइले. पीपर का फेड़ा तर जटा-जूट में त्रिदंडी साधु के देखि के लउडी बेलमि के त्रिदंडी देव के असिरबाद लेबे खातिर आपन मूड़ी राजन के गोड़ का लगे भूइयां पटकि दिहलसि. आपन आसिरबाद देत राजन कहले ‘सौभाग्यवती भवः’

मलय-पवन अस शीतल मधु असबोली सुनि लउड़ि चकरिया गइल. तनेन होके हाथ जोड़ि राजन के आंखि में आंखि डालि दिहलसि. पुरनमासी के चान अस चमकत लिलार सेव आस लाल लाल गाल, गोरहन-चिट्टा लमहर जवान, पानीदार चमकत आंखि देखि बेचारी लउडी मोहा गइल जइसे केहू मंतर मारि अपना वस में क लेउ. लउडी के दोबिधा में देखि राजन सवचले ‘काहा जा ताड़ू लउडी ?’
‘बजारे’
‘का बाति ह ?’
‘राजकुमारी के बेसाह कीने.’
‘कवन बेसाह बा हमहू देखी.’
लउड़ी राजन पर मोहाइल रहबे कइल. बे ना नुकुर के चट् से राजन की ओरि पुरजा बढ़ा दिहलसि. पुरजा में लिखल रहे –
‘बाहर के माजा, भीतर के माजा
मजा के माजा
चारू चीजु के एकही माजा.’

लाल बुझक्कड़ राजन के राजकुमारी ललिता के बेसाह बुझत देरी ना लागल. लउड़ी से कहले. बजारि में बनिया तोहके इ समान ना दे पइहें.

राजन के बाति सुनि लउड़ी गिड़गिड़ाये लागलि, ‘फेरू त राजकुमारी हमरा के नोकरी से निकालि दीहें. हमरा गरीब के रोजी-रोटी मरा जाई.’

लउड़ि के बाति सुनि राजन कहले, ’घबड़ाये के बाति नइखे तूं निश्चिन्त रह. हम इ बेसाह तोहके देइब. तूं राजकुमारी के ले जा के दे दीह. तोहार बहुते बड़ाई होखी.’ राजन एतना बाति कहला के बाद अपना झोरी में से छोहाड़ा, बादाम, गड़ी निकलले आ अपना पनबट्टा में से पान निकालि के ओह पर खैर, कसइली, चूना राखि के लउड़ी के नीक से पुड़िया बना के दे दिहले. राजकुमार के बेसाह देत लउड़ी के समझावत कहले. राजकुमार के जबाब एइजे ले के अइह. एतना कहि के अपना गर के मोती के माला निकालि के लउड़ी के देत’ कहले, ‘ल हमार चिन्हा राखि ल.’

मोती के माला पाके लउड़ी खुश भइल. मने-मन हजारों बाति सोचत लउड़ि रनिवास में चोहँपल. अपना अजगुत बेसाह के देखि ललिता चिहा गइली. उनका एतना विसवास ना भइल कि लउड़ी एतना जल्दी बेसाह लिया दी. उ त अपना लउड़ी के रनिवास से निकाले के सोचले रहली, एह से बउराह बेसाह कीने खातिर बजारी पठवले रहली कि ना कवनो बनिया एकर भरम बुझिहे ना बेसाह कीना पाई. सउदा ना मिलला पर लउड़ि के डाटि-डपटि के रनिवास से हटा देइब. बाकिर पासा उल्टा पड़ल देखि ललिता चकरिया गइली. बड़ी फेरा में पड़ली कि कवना नासमझ के समझ आइल ह. एकर पता लगावे के पड़ी. एतना बाति बुझि के ललिता लउड़ी के दोसर पुरूजा दे के समझा-बुझा के कहली. जे तो के इ बेसाह दिहल ह ओके हमार पुरूजा के जबाब मांगि के ले के अइहे.

लउड़ी राजकुमार के फरमान राजन के देखवलसि. लिखल रहे-
‘आइल होखे त मति अइह
ना आइल होखी त अहइ’

ललिता के पुरूजा पढ़ि के राजन चिहां गइले. बूझि गइले कि सचहूं के राजकुमारी कवनो राजमहल लायक बाड़ी. हमनी के जोड़ी बड़ी जोरदार बइठी. राजकुमार के पुरूजा दोहरा के पढ़ले.
‘आइल होखे त मति अइह
ना आइल होखी त अहइ’

माने दाढ़ी मोछ आइल होखी त जनि अइह. पाग्घी निकलत होई त अइह. जवन गबरू जवान के चिन्हा ह.
राजन अपना झोरी में से कलम कागज निकलले. कवनो शक सुबहा कही ना रहि जाऊ एहसे कलम के सेयाही कागज पर घसले –
‘खड़ी होखबू त आइब
पड़ी होखबू त ना आइब.’

एतना बाति लिखि के लउड़ी के हाथ में राखत पुरजा राजन कहले. हई कागज के जबाब लेके अइह. आ हमार निशानी अंगुठी राजकुमारी जी के दे दीह. चानी के मोहर लउड़ी के हाथ पर धरत राजन कहले – ‘तोहरा खातिर खुशीनामा हवे.’ खुशीनामा पाके लउड़ी खुश होके चहकत रनिवास लवटलि.

राजकुमारी के राजन के लिखल पुरजा थम्हावत कहलसि बड़ गम्हीराहे मुस्की काटि-काटि रउरी सवाल के जबाब लिखले ह. राजकुमारी पुरजा पढ़ि के बेचैन हो गइली. हँसि हँसि कई हाली राजन के पुरजा पढ़ली मान रहे, ‘सोरह साल के जवान होखबू त आइब. बुढ़ा गइल होखबू त आके का करब ?’

बेचैन राजकुमारी के सलहंत होत लउड़ी राजन के निशानी अगुठी देत आपन सज्जी राम कहानी कहि दिहलसि. मिलल माला-मोहर राजकुमारी के देखा दिहलसि. राजकुमारी अंगुठी पाई अगरा गइली. काहे से कि अंगुठी पर पहाड़पुर राज के राज-चिन्ह रहे. राजकुमारी अपनी पसन्द पर बड़ी उतिरइली. हवा में छोड़ल तीर सही निशाना पर लागल. अपनी घर के देवतन के गोहरवली. हे ईसर आगा जवने करिह नीक-नीक करिह.

राजकुमारी फेरू एगो पुरजा लिखली. खड़ी बानी माने जवान बानी. एक लाइन के पुरजा लिखि लउड़ी के थम्हावत कहली कि हमार चिट्ठी पढ़ि जो उनकर चेहरा खिल जाऊ, गाल पर ललाई दउड़ि जाऊ त बुझिहे उ हमरा से मिले खातिर बेयाकुल बाड़े. जवने भेस में होइहे उनका के साथे लेके हमरी फूलवारी में पिछुवारी से आ जइहे. आवे के पहले बिलाई के बोली बोलिहे. हम सचेत होखे पहरा पर के सैनिक के कवनो बहाना बना के कतो भेजि देइब.

लउड़ी राजन की लगे चोहँपलि. राजकुमारी के सनेसा दिहलसि. सनेसा पढ़ते राजन के गाल सचहू के लाल गुलाब हो गइल. राजन खिलखिलाये लगले. अधीर होत कहले हम रनिवास में चले के तेयार बानी, तू आगा राहि देखाव, हम तोहरी पाछा चलब. लउड़ी चोर दरवाजा से राजन के लिया के आइल आ उनका के तिलस्मघर में ले जा के बइठा लिहलसि. बाकिर चमाइन से कहीं ढ़ीह छिपेला. राजन के गुप्तचर बजारी में घूमत धरा गइले स. बड़ी मार पिटइले. कोड़ा के मारि से देहि घवाही हो गइल. कहरत-कहरत सज्जी बाति उगिल दिहले. राजन के तिलस्म घर से गिरफ्तार क के सैनिक राजदरबार में पेश कइले. सिक्कड़ में बन्हाइल अपनी राजकुमार के देखि के गुप्तचरन के आंखि में आंसू आ गइल. ओन्हनी के मन में बिद्रोह जागि गइल. जे से कमर में खोसल लुकवावल हथियार पर हाथ चलि गइल. बाकिर राजन कुछउ करे खातिर अपना गुप्तचरन के मना क दिहले.

एही बीच लउड़ी लउकल. जवन देवालि के आड़ में से लाल रूमाल कई तोर फहरवलसि. राजन लाल कपड़ा के मरम बूझि गइले. गरदन कटि जाऊ, खून निकलि जाऊ भा चाहे जान चलि जाऊ, भेद नइखे खोले के. राज के राज रखे के बा. प्रेम में पागल राजन राजकुमारी के मरम बूझि के सज्जी पचा गइले. अपनी सफाई में राजदरबार में कुछ ना कहले. राम-रहिम कुछ ना जनवले. जेकरा से एतना परेम करत रहले ओकर भरल सभा में बेइज्जती कइसे करते. राजकुमारी पर कवनो अक्षरंग ना लगावल चाहत रहले.

राजन के मुँह ना खोलला के कारन चोरी के जुर्म में आ दोसर राजकुमारी के आन-बान-शान में अनभल विचार रखला खातिर फांसी के सजा सुना दिहल गइल. अपने जान पर खेलि के राजन हमरी इज्जत पर आंच ना आवे देले ह. सचहू के राजन हमसे परेम करताडे़. एतना सोचि के राजकुमारी ललिता के दिन के चैन राति के नीनि हराम हो गइल. भूखि पियास हवा में उड़ि गइल. इहे हालि जेल के कोठरी में बन्द राजन के रहे. उहो ओही तरे तड़पत कलपत रहले. आगि दूनू ओरि बराबर लागल रहे बाकिर कवनो ऊपाई ना सूझत रहे. दूनू जाना बिना पानी के मछरी लेखा छटपटात रहले. सांच परेम में ईसर बसेले. मुँह चिरले बाड़े त खाना दिहे. भगवान पर भरोसा क के दूनू जाना चुपाइल रहे लोग कि समय बलवान होला. जवन होई नीक होई.

गुप्तचरन के पता चलल कि उनकर राजकुमार राजन के सीतापुर के सैनिक गिरफ्तार क के जेल में डाल देले बाड़े त उ पहाड़पुर के राजा शेर सिंह के पास खबर पहुँचवले स. शेर सिंह एतना खबर पाके विचलित ना भइले तुरते अपना लाव लश्कर के साथे सीतापुर खातिर कूच क दिहले. ओने शेर सिंह अपना लाव लश्कर के साथे कूच कइले. ऐने राजन के फाँसी पर चढ़ावे खातिर सीतापुर के सैनिक काल-कोठरी में से निकालि के फांसी घर में ले के चलले स. राजन के कटले खून ना. उनका तीनों त्रिलोक लउके लागल. इ का हो गइल. मउअति के सदेहे देखि के राजन इचिको विचलित ना भइले. पेयार में परान तेयागे के हुलास में सज्जी दुख भुला गइले. उनका मन में कवनो मलाल ना रहे. आगा बढ़ते राजन के लउड़ी लउकल. जवन पतुकी लिहले ठाड रहे. आंखि से आंखि मिलते लउड़ी पतुकी पटकि के फोड़ि दिहलसि. पतुकी में किसिम किसिम के चीजु रहे जवन जमीन पर जहे-तहे छितरा गइल. राजन पतुकी के तमाशा देखि हैरान हो गइले. जवन राजकुमारी कुछ दिन पहिले कहाव भेजववले रहली कि गरदन कटि जाई राज जनि खोलिह, उहे राजकुमारी आजु कहतारी कि भंडा फोड़ि द. पतुकी जबरी फोड़ला के इहे मतलब होला. एकर मतलब इज्जत मरजाद सज्जी तेयागि के राजकुमारी के आपन लाज शरम से हटि के हमरा से पेयार करऽताड़ी ना त हमरी जान के चिन्ता काहे करीती. सच्चा पेयार में आग-पाछ कुछ ना लउकेला.

एतना राजन सोचते रहले कि सैनिक फांसी के तख्ता पर चढ़ा दिहले. आंखि पर करिया कपड़ा बन्हला के बाद केहू बहुत मोलायमें से पूछल. मरे के पहिले आपन आखिरी इच्छा बता द. राजन एही मोका के ताक में रहले. बे आग-पाछ सोचले सटाक से कहले. ”हमार इच्छा हर हाल में पूरा करे के पड़ी. राजकुमारी ललिता से हमार विआह करा द जा.“

राजन के बाति सुनि जल्लाद गरजि के बोलल. ‘हरे चोर, तोर एतना मजाल ? रूक-रूक तोर राजकुमारी से बिआह करावऽतानी.’ एतना गाभी मरला के बाद जल्लाद सेनापति के बोलावे के सनेसा सैनिक से भेजवा दिहलसि. सेनापति फांसी घर में अइले. राजन से सवचले. का बाति ह. राजन सेनापति से उहे बाति दोहरवले कि ‘राजकुमारी ललिता से हमार बिआह करा द. मरे के पहिले हमार इहे एगो इच्छा बा.’ राजन के बाति सुनि सेनापति तड़कि के बोलले. एतना शब्द निकाले के पहिले तोहार जीभि काटि लिहल जाई. आपन औकात देखु.

सेनापति के बाति सुनि राजन विहस के हँसले. कहले जीभि काटे के सजाई देबे के अधिकार राजा के होला अउर केहू के ना. ”हम सीतापुर राज के सेनापति बोलतानी. सेनापति के बाति सुनि राजन बोलले.“ काहे अनर्थ करे पर लागल बानी. बनलो काम काहे बिगाड़तानी. आप राजा साहब के बोलवाई. नेयाय के देवता के सोझा हम आपन दुख सुनावल चाहतानी. हारि पाछि सेनापति राजा के लगे दूत भेजले कि फरियादी फांसी से पहिले कवनो बाति बतावल चाहता. रउरा आई आ फरियादी के फरियाद सुनी.

राजन फांसी के तख्ता पर चढ़ल रहले. उनकर मुँह करिया कपड़ा से बान्हल रहे. राजा के आवते जल्लाद बतवलसि कि राजा साहेब आ गइल बाड़े. कैदी आपन फरियाद करो. जल्लाद के कहला के मोताबिक राजन सबसे पहिले राजा के प्रणाम कइले. कहले हम रनिवास में अपना मन से ना आइल रहली. लउड़ी के बोला के पूछी हम राजकुमारी के बोलवला पर अइली. सांच पूछी त राजकुमारी हमरा से आ हम राजकुमारी से प्रेम करीला. राजमहल में हमके बड़ी पेयार से रखले रहली ह. अइसना में नेयाय इ कहाई कि राजकुमारी ललिता के हमरा से बिअहि दी. काहे से कि हमहू पहाड़पुर के राजा शेर सिंह के बड़ लड़िका राजकुमार राजन हईं.

सीतापुर के राजा सुन्दर सिंह शेर सिंह के नाव सुनि के पेड़ का पतई अस कांपे लगले. जइसे उनकर सिंहासन डोले लागल. अस्थिर होत मने मने विचरले. बात सही बा. एगो राजकुमार चोरी के नीयत से राजमहल में ना आई जरूर कुछ दाल में काला बा. तब्बे राजन एतना दिन रनिवास में टिकल रहले ह ना त सांझ विहान में चोर-चोर हल्ला हो गइल रहित. दोसर बाति इ बा कि शेर सिंह हमरी हर दुख में कामे आइल बाड़े. कई हाली दुश्मन के हमला पर धन-बल से हमार मदद कइले बाड़े. जब राज में अकाल पड़ल रहे त शेर सिंह अनाज पानी-लवना-लकड़ी से हमरी प्रजा के मदद कइले रहले. नेकी कइसे भुला जाईं. एतना बाति सुन्दर सिंह सोचि के रनिवास की ओरि जाये लगले कि सांच बाति के राजकुमारी से पुरवासा करवा ली. तबले दूत आके सनेसा दिहलसि कि पहाड़पुर के राजा शेर सिंह मिले आ रहल बाड़े. फेरू का राजकुमार राजन के सम्मान के साथ राजदरबार में लिआवल गइल आ शेर सिंह के अगुवानी खातिर मारे जे ढ़ोल-तासा दुदुंभी बाजे लगल. नगाड़ा के शोर से राजमहल अबंज हो गइल. मारे से फूल इत्र के बरसात होखे लागल. बिआह अस तेयारी से राजमहल चहल पहल के खिलखिला गइल.


राज साड़ी घर, चौक कटरा, बलिया-277001, फोन 05498-220655

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