Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

छोट रहनी तS कई बेर केहू-केहू कहि देत रहल कि ए बाबू अवतारी हउअS का? एकदिन रहाइल ना अउरी हम पूरा गाँव-गिराँव, हित-नात सबके बोलवनि अउरी कहनी की रउआँ सभे जानल चाहत बानी न की हम अवतारी हईं की का हईं. तS रउआँ सभे धेयान लगा के सुनि ली सभें की हम अवतारिए हईं. अउरी हम अपनी अवतार लेहले के कथा सुना दे तानी. रउओं सब सुनीं-

ई बाति तब के हS जब हम इंदरलोक में चापलूसी अउरी नेतागिरी विभाग के हेड रहनी. ओ समय केहू के चापलूसी चाहें नेतागिरी सीखे के होखे तS ऊ हमरे से संपर्क करे. अब तS रउआँ सब के बुझाइए गइल होई की नेतागिरी अउरी चमचागीरी की बल पर हम इन्नर भगवान क केतना करीब होखत होखबि.

एकबेर के बाति हS की हम इंदरासन में इन्नर भगवान क संघे बइठि के सुरा अउरी अधनंगी सुंदरियन क नाच अउरी गीति के आनंद लेत रहनी. रउआँ सब इहाँ सुरा के अरथ देसी ठर्रा न समझि के सोमरस अउरी सुंदरियन के मतलब अप्सरा समझीं. हम सुरा-सुंदरियन में एतना लीन रहनी की भगवान के उहवाँ आइल हमरा पते ना चलल. भगवान क आवते नाच-गाना बंद हो गइल अउरी साथे-साथे रसपानो के मजा किरकिरा हो गइल. इ सब देखि के हम चिहा गइनीं की अरे, इ का हो गइल? रंग में भंग?

तवले कहीं का देखतानि की हमरी समनहीं भगवान गुस्सा में खड़ा बाने अउरी उनकरी पीछे इन्नर भगवान खड़ा हो के बेना डोलावताने अउरी हमके देखि के धीरे-धीरे मुस्किआताने. हम सब समझि गइनी अउरी इहो की अब हमार खैर नइखे. एकाएक भगवान हमरी पर घोंघिअइने,”अरे तें तS आदमी की जात के देवता बाड़े, तोर इहवाँ कवन काम? तें तS हर परकार की बुराई में नंबर वन बाड़े. तोके अब्बे एही बेरा धरती पर जाए के परी, इहे हमार आज्ञा बा.” भगवान के इ बाति सुनि के हम बहुत रोवनी-गिड़गिड़इनी पर भगवान हमार एक न सुनने. तबे हमार एगो साथी हमरी काने में बुदबुदाइल, “काँहे बेवकूफी करSतारे भाई. आँखि बंद कS के धरती पर अवतार ले ले. अरे तोरा बुझाता की धरती पर तें अपनी मन के मालिक रहबे, अउरी जेतना रंगरेली मनावल चहबे, गलत काम कइल चहबे, एगो नेता बनते चाहें सीधा भासा में कहीं तS एगो मनई बनते आसानी से संभव हो जाई.”

हाँ तS संघतिया लोग (अरे भाई अब तS हमहुँ मनई तू हूँ मनई, तS भइनीजान न संघतिया)! भगवान की आज्ञा से हम 1 जनवरी 1976 के उत्तर-प्रदेश क देवरिया जिला (जवन बिहार की सीमा से लागल बा) का गोपलापुर (गोपालपुर) गाँव में एगो मध्यमवर्गीय बाभन परिवार में अवतरित भइनीं. इहवाँ आप सब के कौतुहल होत होई की हम उत्तर प्रदेश की वही जिला के काहें चुननि जवन बिहार की सीमा पर बा? एकर कारन इ बा की जब हम इंदरासन से धरती के निहरनीं (अवलोकन कइनीं) तS इहे अस्थान हम के एइसन लउकल जहवाँ घर-घर में नेतागिरी के सबसे अधिक खेती होला. ए इलाका के लोग के लागेला की नेतागिरी तS बाप के बपौती हS. अउर अब तS रउआँ सभें समझिए गइल होखबि सभें की ए जमाना में नेतागिरी के संगी-संघतिया के बा? अरे काकाजी! झूठ, गलगोदई, लउरलबेदई, हमके मिलो घीव भले देस अउरी समाज जाव तेल लेबे, इहे कुल न?

हाँ तS अब आगे के दास्तान एतने बा की हमहुँ जइसे-जइसे बड़हन होत जा तानी, लीला करत जा तानी. फरक एतने बा की ए लीला में प्रेम नाहीं वासना बा, दूसरे के भलाई की जगह पर आपन भलाई बा, देश के भाड़ में झोंकि के आपन कमाई बा, दूसरे की दूख में घड़ियाली रोवाई बा, लोग के बेवकूफ बना के खूब हँसाई बा, केहू के दुख दे के ओकरी अँसुओ के पोछाईं बा, भगवानो की नाव पर खूब लुटहाई बा, मंतरी-संतरी बनि के राजा-महराजा लोगन की तरे जिआई बा. अब एतना मजा तS हमके कबो इंदरासनों में ना मिलल होई. हँसी मत, हम ना नेता हईं ना अधिकारी अउरी हाँ धरमगुरु अउरी समाजसेवको ना हईं?

अब हम इहवें रहबि आराम से. पर का हम आराम से रहि पाईबि? ठीक बा अगर हम सुख-चैन से रहिओ गइनी तS हमरि लोग-लइकन के का होई? सोंचतानि इ लीला कS के कहीं हम अपनी पैर में कुलहाड़ी तS नइखीं मारत? कहीं हमरी ए लीला के खमियाजा हमरी लोग-लइकन के त ना भुगते के परी? हमहू सोंचतानी, रउओ सोंचीं….


प्रभाकर गोपलापुरिया के पहिले प्रकाशित रचना


प्रभाकर पाण्डेय
हिंदी अधिकारी, सी-डैक पुणे
पुणे विश्वविद्यालय परिसर, गणेशखिंड,
पुणे- 411007, भारत

Advertisements