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– रामवृक्ष राय ‘विधुर’

जवार भर में केहू के मजाल ना रहे कि भोला पहलवान का सोझा खड़ा होखे. जब ऊ कवनो बाति पर खिसिया के सनकी हाथी नीयर खड़ा हो जासु त नीमन-नीमन नवहन के साँसि फूले लागे. मीठू ओस्ताद का अखाड़ा में बइठक करे लागसु त उनुका गोड़ का नीचे गड़हा हो जा, पसेना से जमीनि भींजि जा, बाकिर थाकसु ना. मीठू ओस्ताद भोला के होनहर देखि के, छाती फुला के कहसु- ”ईहे एगो पट्ठा बा जे हमार नाँव उजागर करी.“

सचहूँ के भोला पहलवान ओस्ताद के नाँव चमका दिहलन. जब दसहरा मेला में भूलू पहलवान जवार भर का पहलवानन के हाँकि दिहलन आ हाथ मिलावे खातिर केहू तइयार ना भइल त भोले पहलवान अखाड़ा में उतरलन. भूलू नवछेटिया पहलवान भोला के देखि के, हँसि के कहलन, ”सुनले रहलीं हँ जे एह जवार में नीमन-नीमन पहलवान बाड़न स. हमरा ई मालूम ना रहल ह कि हमार नाँवें सुनि के सब लँगोटा धइ देईं.“

भोला अखाड़ा के माटी हाथ में लेके ओस्ताद के नाँव लिहलन आ छरकि के अखाड़ा में आ गइलन – ”गुमान ना करे के चाहीं. गुमान दुनिया में केहू के नइखे रहल.“ भोला पैंतरा बदलि के कहलन. ”गुमान नइखीं करत, बाकिर बाघ-बकरी में लड़ाई कइसन.“

भूलू के बाति सुनि के भोला के आँखि ईंगुर अइसन लाल हो गइली स. गम्भीर होके कहलन, ”काहे, हाथी के मउवति चिउँटी का हाथ में होले, मैदान में आवऽ, तब पता चली. हम मीठू ओस्ताद के पट्ठा हवीं.“

भूलू आपनि देहि बटोरि के ताली ठोंकि के भोला से हाथ मिलवलन. हाथ मिलवते अँकवार में दबा लिहलन. बाकिर एहसे पहिले कि ऊ भोला के लेके नीचे गिरसु, लोग देखल कि ओह दइत जइसन पहलवान का नीचे भोला थोरे तिरिछा भइलन, आ उनुकर लँगोटा धइ के उठावे लगलन. भूलू के गोड़ उठि गइल. देंहि का भारी बोझ से भोला के मुँह लाल हो गइल. थोरही घरी में भूलू के अपना कान्हि पर उठा लिहलन आ ओइँजे से लंगी देके फेंकलन त भूलू चारू पाँवे चित्त हो गइलन. जवार में भोला के नाँव बाजि गइल. गाँव के मुखिया निहाल पचास रूपया इनाम दिहलन.

ठुमरी भोला के देखलसि, त देखते रहि गइलि. कसइली नीयर कसलि देंहि, कदली का खम्भा नीयर जाँघि, बीछी का आर नीयर अँइठलि-अँइठलि मोंछि, गर में गलबन्द नीयर लपिटाइल लँगोटा आ कउड़ी नीयर बड़ी-बड़ी आँखि जइसे ठुमरी का आँखि में गड़ि गइलि. ओकर मन लट्टू हो गइल.

मेला का दू-तीन दिन बाद निहाल का घर में डाका पड़ल. गाँव भर के आदमी बिटुराइल रहे. बाकिर केहू के फरह ना परे कि आगे बढ़ो. जइसे जना जे सभका थथमा लागि गइल बा. एही बीच में भोला के ललकार सुनाइल- ”खड़ा का बाड़ऽ जा. तमासा देखे के आइल बाड़ऽ जा?“

भोला डाकुअन का गोल में पइठि गइलन. निहाल के माई छाती पीटि-पीटि रोवति रहली. ठुमरी एगो घर में कोठिला का आड़ में लुकाइलि रहे. डर का मारे ओकर कुल्हि देंहि पीपर का पतई नीयर काँपति रहे. मन धुँआ हो गइल रहे. भोला के देखलसि त जीव में जीव परल.

”अब का डेराइलि बाड़ू“ भोला ठुमरी का निगिचा जाके कहलन.

ठुमरी आँगन में आ गइलि- ”बाप रे बाप! करिया-करिया भूत नीयर रहुवन स. देखि के रोवाँ ठाढ़ हो जात रहुवे.“ ठुमरी भोला का आँखि में आँखि डालि के कहलसि, ”तहरा के देखलीं हँ तब जीव में जीव परल ह.“

एह डकइती का बाद भोला के इज्जति अउरी बढ़ि गइलि. गाँव भर के नवहा उनुका के दिन भर घेरले रहें स. निहाल का दुआर पर साँझ-सबेरे दूनों बेरा बइठकी जमे लागलि. निहाल के कुल्हि लइका भोला से पतिया गइल रहलन स. ठुमरी एकदम मुँहलग्गू हो गइलि रहे. कहीं डहरी-डाँड़े भेंट होखे त ‘बम भोला’ कहि के रिगावे. बाकिर भोला कुछ बोलसु ना, मुसकिया के आगे बढ़ि जासु.

काँचे उमिर में भोला जवार का कुल्हि नवहन के पछारि के काफी नाँव कमा लिहलन. मीठू ओस्ताद के पगरी उनहीं का कपार पर बन्हाइलि. देहात का हर गाँव से नवहा उनुका अखाड़ा पर ‘जोर’ करे खातिर आवें स. भोला के लेके, खरहना गाँव के नाँव जिला में फइल गइल. दूसरा साल फेनु दसहरा के मेला लागल. धान के पौधा माथ पर मउर बान्हि के हँसे लगलन स. जइसे जना जे धरती सोना के चादरि ओढ़ि लेले बा. गाँवन में जवना साल खेती सुतरेले, तिहवारन में रंग आ जाला. जइसे जना जे मेला में मये देहात उमड़लि आवतिया. आदमिन का मारे मेला में सावाँसुधि ना रहे. देंहि से देंहि छिलात रहे. दुकानो हरसाल से अधिका आइलि रहली स. चारू ओर धूम-गज्जर मचल रहे. कहीं नाचि होति रहे, कहीं कुछ आदमी बिटुरा के बिरहा गावत रहलन. चारू ओर मस्ती झरति रहे. बंजर भुँइ सुहागिन बनि गइलि रहे.

ठुमरी मेला देखि के लवटति रहे. भोला के देखि के लवटि आइलि ‘एगो हमार काम करबऽ?’
”एगो ना सइ गो!“ भोला ठाड़ हो गइलन- ”कवन काम बा, कहऽ?“
”कुछऊ ना. अइसहीं टोकि दिहलीं हँ.“ ठुमरी हँसि के कहलसि, ”गाँव पर कब चलबऽ?“

भोला बिना कुछ जबाब दिहले आगे बढ़ि गइलन. सूरज डूबि गइल रहे. मेलहरू मेला देखि के लवटत रहलन स.
”आ दुर करु! चलत-चलत पाँव पिरा गइल. अबहीं केतना दूर गाँव बा“ जोखनी बायाँ हाथ के कहँतरी दहिना हाथ में लेके कहलसि. ”चलि आईं! अब निगिचा लेले बानीं जा कउवा खोंच के बगइचा लउकत बाटे.“
”के ह, ठुमरी?“
”हूँ.“
”तू निहाल के लइकी हविसि नू बचिया?“
“तोरे नू पर साल अतरवना बिआह भइल?“
ठुमरी हँ-नाहीं कुछ ना बोललि. कमला, जवन ओह गाँव का लइकिन वाला मदरसा में, मास्टरनी रहली- कहली, ”हँ, इनहीं के बिआह पर साल अतरवना भइल रहे.“
बाची का करम में आगि लागि गइलि. कहाँ सोरह बरिस के कँवल का फूल नीयर सुघर-सुभेख लइकी आ पैंतालीस बरिस के बूढ़ झरनाठ बर! जोखनी के आँखि सलोर हो गइलि रहली स. लोर आँचर का खूँट से पोंछि के कहलसि, ”जइसे जनाला जे निहाल का आँखि में काचा बइठि गइल रहे- रुपया ना रहे त केहू गरीबे आदमी कीहें जोड़-जुगुत के सुघर-सुभेख लइका देखि के बिआह कइ देले रहितन.“
”बेटी आदमी का कपार के बोझ हो गइल बाड़ी स. उन्हनी का जिनिगी का बारे में केहू नइखे सोचत.“ सुघरी माथ पर लूगा ठीक कइके कहलसि ”अपना कपार के बोझ हलुक होखे के चाहीं. लइकी खाला परो भा ऊँचा. एकर केकरा फिकिर बा.“
”हम त कहि देतीं जे बिआह ना करबि. जगरनियाँ बीचे में बाति लोकि के कहलसि. करिया-भूचेंग, जइसे जना जे भरि देहीं कोइला पोतल होखे! राम! राम! छी…..“
”एही के जरूरति बा. समाज हमनी का कमजोरी के नजायज फायदा उठावत बा. जेही कमजोर होला, दब्बू होला, ऊहे दबावल जाला, समाज का चक्की में पीसल जाला. समाज के देवालि पुरान हो गइलि बा अब ओमें पेवन लगवला के जरूरति नइखे. जोर से धक्का दिहला के काम बा जे ढहि जाउ.“ कमला बोलति चलि जाति रहली, ”जे अपना सुख-स्वारथ खातिर दुसरा का जिनिगी से खेलवाड़ करेला, ऊ हीत ना, दुसमन ह. पक्का दुसमन. निहाल जोन्हा के काहें खेदि दिहलन? एही से नूँ कि ऊ करिया रहे – कुरूप रहे. ओह घरी समाज कहाँ रहे- गाँव-गिराँव कहाँ रहे. का जोन्हिया निहाल के इज्जति ना रहे- पगरी ना रहे?“ कमला के बाति खतम भइलि त बरहना गाँव के दिया लउकत रहे.

ठुमरी घरे पहुँचलि त दिया-लेसान के बेरा हो गइल रहे. दुआर पर आदमिन के जमवड़ा लागल रहे- ”भाई, गजब हियाव के आदमी रहलन ह. मेला में जेतना आदमी रहलन ह, सभ उनुकर मुअल सुनि के रो दिहल ह. एक-दू आदमी के कहाँ हिम्मति रहलि ह जे उनुका पर हाथ उठाओ. सत्तरह गो गँड़ास लागल बानऽ स.“ भोला के मुअल सुनि के ठुमरी के कुल्हि देंहि सुन्न हो गइलि. ओकरा लेखे दुनिया में अन्हार हो गइल. देंहि पर के गहना जइसे जना जे ओकरा खातिर बोझ हो गइल बा. हाथ के चूरी फोरि दिहलसि. दूसरे दिने सबेरे ओकर माई चूरी के खाली हाथ देखि के पुछलसि, ”चूरी का हो गइलि? एहवाती मेहरारू के चूरी सुहाग ह. जाके पहिरि ले.“
ठुमरी के आँखि सलोर हो गइली स. दुसरी ओर मुँह फेरि के कहलसि, ”का होई चूरी पहिरि के, अब एह दुनिया में हमार के बा जे देखी?“
जिरिया ठुमरी का ओर घूमि के देखलसि त ओकरा आँखि से सावन-भादो का बदरी नीयर पानी बरिसत रहे.


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)

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