चक्कर बनाम चस्का

(ललित-व्यंग)

– डा0 अशोक द्विवेदी

ashokdvivedi
आदमी आखिर आदमी हs — अपना मूल सोभाव आ प्रवृत्तियन से जुड़ल-बन्हाइल। मोह-ममता के लस्का आ कुछ कुछ आदत से लचार। ओकर परम ललसा ई हवे कि ऊ तरक्की करो आ सुख से रहो ! ई सुखवो गजब क चीझु ह s। एकरा खातिर लोग कुल्हि करम- कुकरम करे खातिर तइयार रहेला। इचिकी बार सुख खातिर खँचियन झमेला ढोवे के परेला। इचिकी जोगाड़ बइठावे खातिर लेझड़ियाइल रहेला।

आज काल ई सुख ‘पद’ पर निर्भर बा। एही से एघरी आदमी कवनो न कवनो पद पावे खातिर एँड़ी से चोटी ले जोर लगा देला। एगो अलम भेंटल ना कि दुसरका खातिर जोगाड़ बइठावे में भिड़ जाई। पदे में एगो परम पद बा। इतिहास गवाह बा कि ‘परम पद’ पावे खातिर एक से एक महापुरुष खखुवाइल रहलन आ ओके पावे में देंह के कूल्हि सजाय क घललन। जेकरा जइसे रस्ता मिलल, अपना जोर-जाँगर, औकात भर पहुँचे के कोसिस कइल। परम पद अइसन पद रहे कि मुवलो कबूल रहे आदमी के।

एघरी त ई परम पद ‘कुरुसी’ में आँटि गइल बा। कुरुसी बा, त चक्कर बा। चक्कर ओकरा खातिर, जेके ‘ जनसेवा’ के मोका नइखे मिलल आ ऊ लाइन में लागल बा। जेकरा मोका मिलल बा आएक बेर ऊ ओकर सवाद लेले बा ओकरा खातिर चस्का बा अपना पद भा कुरुसी के कायम राखे खातिर ऊ कूल्हि चक्कर चला रहल बा। दरसल चस्का एगो मनोविकारे हs, जवन सुख के अनुभूति, पावर के ललसा आ लोभ का वेग से उपजेला। एही से चस्काबाज ढेर चक्कर में परेलन स s। कुरुसी पवला ले ढेर चक्कर, कुरुसी हड़पला में बा। फेर हड़पल चीझु जोगावे खाति चक्कर चलावहीं के परी। गोया कि एह ससुरा चक्कर से, केहू तरे छुटकारा नइखे। सभे कुछ न कुछ चक्कर में बा। ऊपर, नीचे, चारू ओरि एगो विचित्र चक्कर बा। हमनी का त साधारन आदमी हईं जा, छोटो मोट चक्कर रही त अझुराइ के गिर सकेनी जा; बाकि कतने महारथी अइसन बाड़न, जिनका अगल-बगल, ऊपर-नीचे चक्करे चक्कर बा। तब्बो ऊ साँड़ लेखा हँकड़त हूँफत बाड़न।

केहू के गमे गम बा, केहू केहू के कवनो गमे नइखे। ज्यादातर लोग गमे वाला बा। रोजी-रोजगार में त, केहू के तरक्की के गम बा, केहू के तनज्जुली के आ केहू सोचत बा कि कइसहूँ ई ठग हटें सन, त रस्ता मिलो। माने ई गमवो एक लेखा चक्करे हवे।केहू चक्कर चलावsता, केहू चक्कर खियावsता आ केहू चक्कर खाता। कहीं रुपिया-पइसा के चक्कर, कहीं जमीन जायदाद के। केहू खातिर बिरादरी के चक्कर बा, केहू खातिर मजहब के। कहीं भाषा के चक्कर बा, त कहीं सूबा के आ कहीं चक्कर के चक्कर बा। चक्कर क कवनो अन्त, कवनो ओर छोर नइखे ! एह निखिल ब्रह्मान्ड में चक्कर पूरि रहल बा, कूल्हि जीधधारी एही में घुमरियाइ के, विलीन हो रहल बाड़न।

ई चक्कर बिधाता के अद्भुत सिरिष्टी ह s! अदमियन खातिर जीवन चक्र। माने जनम से लगाइत मृत्यु तक चक्करे चक्कर। हमनी किहाँ गाँव देहात में कहाला कि “जमाना चल चलाव के बा”। शास्तर,बेद कहेला कि “चरैवेति चरैवेति” माने चलत रहs ! ई चल-चलाव आखिर एगो बड़हन चक्करे हs। समाज में, सिस्टम में जहाँ देखीं, चलचलावे बा। उहाँ सब आपन आपन उल्लू सीधा करे का चक्कर में लगल बा। गाँव पचाइत होखे भा ब्लाक,जिला जवार होखे भा प्रदेश, सभे आपन गोटी सेट करे का चक्कर में अझुराइल। अब बेसी का कहल जाव इन्वर्सिटी होखे भा संसद, हर जगह सड़क अन्डरस्टुड बा, याने कई ममिला में एकरूपता। संसद में आमतौर प समर्थन-बिरोध, नाराबाजी, जूता फेंकउवल, कुर्सी चलउवल आ उठापटक बा, त इनवरसिटियो में कमबेसी ईहे बा। एक ओरि राजनीतिक तृष्ना, चौधराई आ मन्त्री पद के चक्कर, हिरिस आ जोगाड़ त दुसरा ओरी रीडर, प्रोफेसरशिप से लेले डीन,डाइरेक्टर आ वाइसचांसलरशिप क चक्कर। अवरू ना त एकरा अलावे छात्र गुटबाजी के डीलिंग वाला चक्कर। किताबी ज्ञान, समाजिक ज्ञान आ ब्यौहारिक ज्ञान आखिरस राजनीतिये के चक्कर में चकराता। का गँवार -अनपढ़ आ का पढ़ल लिखल साक्षर ? गँवरवा त तनीमनी ठीको बाड़न सs बाकि बाप रे बाप, ई साक्षर …., तनिको गड़बड़ाइल त कबाहट के घर हो जाई ..”साक्षरा विपरीताश्चेत् राक्षसा एव केवलम्” आने राछस बना देई। पद आ पावर के लोभ अदिमी के जवन ना बना देव !

बात चक्कर के होता त एही से सउनाइल एगो नया करतब क बात हो जाव। घपला ! ई घपलो एगो गजब के गिहिथान हवे, पढ़े जा भा मत जा, डिगरी मिल जाई। नोकरी, पद, पइसा, पावर के जोगाड़ो बइठ जाई। ई घपला, बुझला चक्करे क चक्कर हs ! चपरासी मनेजर हो जाता आ मनेजर, डाइरेक्टर ! कुली हाजी मस्तान आ लड़िकाई वाला लइका, बाल जोगी जोगेश्वर ! कहे क मतलब ई कि एक घपलारूपी चक्कर से राई, परबत बन जातिया, काल्हु क घुमन्तू लखैरा कहाये वाला नेता आ मन्त्री बन जात बाड़न। केहू बड़ हाथ मारत बा, केहू छोट बाकि मारत सभे बा। औकातो के त महता होला। जेकर जइसन औकात।

हमहन अस छोट मनई त एह कथ में विश्वास करेला कि ‘तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर ‘, माने गोड़ ओतने पसारल जाव, जेतहत चादर होखे ! इहवाँ त अइसन अइसन घाघ बाड़न कि उनका औकात से धरती काँपतिया, अकास थरथराता ..चोरबजारी, घूसखोरी, बेइमानी, तस्करी कुल्हि का बादो का मजाल कि केहू कुछ बोल देव ! हजारों मन गल्ला, सीमेन्ट, कोइला, बालू, पाथर, बन, जंगल, रूपिया पइसा, कूल्हि पचि जाता। एकरा बादो एतना बादो लूटे खाये खातिर हहुआइल रहsता। हमरा बुझाता कि जमाखोरन के पेट रसातल ले गहिर होला आ उनहन क हिम्मत, नीचता, धीरज आ लालच अनन्त होले !

कबो अबो लागेला कि हमनी का गूँग बहिर दर्शक हईं जा, एकदम गान्धी बाबा के बानर। अइसन असहाय, जइसे हिलहूँ डोले क बल बेंवत छिना गइल होखे। ऊपर से हमन के आपन आपन चक्कर। मोह, ममता आ सवारथ। अइसन नइखे कि हमनी में राई से परबत करे क क्षमता भा बुद्धि नइखे, बाकि तनिके में सबुरो करे आ कम खाये आ गम खाये के जवन सोभाव बन गइल बा, ओही से लचार बानी जा।

एघरी त अदिमी ले ढेर कुरुसी के प्रभुता बा। ऊँच कुर्सी प बइठे वाला के एगो दोसरे ‘पावर’ आ प्रताप होला। बड़का पोस्ट वाला जदि खउराहो होई, तबो लोग गरज बस ओके सलाम करी। एही से कुरुसी से चक्कर आ चस्का दूनों जुड़ल बा। पहिले माखन मलाई खाये के कामे ढेर आवे ; एघरी लगावे के काम में बेसी इस्तेमाल कइल जाता। जइसे यन्त्र आ मशीन के नीक से चलावे बदे ग्रीस के इस्तेमाल होला ओइसहीं नया जुग में आगा बढ़े आ काम निकलवावे खाति नवनीत (माखन) कामे आवेला। नवनीत लेपन एगो कला हs। जेके एकरा मे महारत हासिल बा ऊ बड़ से बड़ काम करा घाली। कुछ लोग एके चमचागिरी कहेला, बाकि साँच मानीं, ई दादागिरियो के नतमस्तक करे वाला विकट अस्त्र हs। लोकशाही का नौकरशाही में चमचन के महता केहू से छिपल नइखे। एही से हर अफसर, हर नेता, मठाधीश, बड़का साहित्कार, पत्रकार इहाँ तक कि शिक्षा प्रतिष्ठानन के गुरुअन का आगा पाछा हरमेसा दू चार गो चमचा लागल रहेलन स। चमचा “पावर हाउस” के लाइट हवन स s !

इतिहास गवाह बा। चमचन के ऐतिहासिक उछाल का पाछा एही चक्कर क हाथ बा। चक्कर ब दीरघ आ गहिर होला त ओकर परिणाम घटित भइला पर पता चलेला कि का से का हो गइल ? अइसना चक्कर के प्रयोग कुटिल आ भविष्यदर्शी राजनीतिज्ञ करेलन स s। राजनीतिक महारथियन के जइसन इतिहास बा, वइसन भूगोल नइखे। भारी तोन आ थुलथुल रान वाला आ दस अदिमी के लासि अकेल ढोवे वाला ..घोड़ा हाथी ले लजा जाँय। वइसे जमाना बदलल बा, एघरी सुन्दर, सुकुआरो लउके वाला राजनेता, एही चक्कर का बूता बड़ बड़ राजनेतन के पाछा ढकेल देत बाड़न स। आज काल मोट से मोट रकम हजम करे वाला परम वैष्णव लेखा सलतंत से लउक सकेला, जल्दी थाहे ना लागे दी कि ऊ केतना फुट जमीन का नीचे ले आपन गोड़ जमवले बा ! नेतन क इतिहास चक्कर से प्रगति कइ के जतने वजनी होत जाला ओतने उनहन के इतिहास आ भूगोलो में बदलाव आवत जाला। जमाना जिम आ डाइटिंग क त बटले बा जोगो टोक क टोटका चल निकलल बा।

“करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान”! कोसिस आ रियाज से का ना होला ? बहुत कम्मे अइसन भगिगर मिलिहें, जे चानी के चम्मच लेले पैदा भइल होइहें, भा कम्मे नेता होइहें, जिनके कुरुसी खानदानी बिरासत में मिलल होई। बकिया कूल्हि त चक्कर के कमाल आ चमचागिरी के उछाल ह s! चक्करबाजन के चक्कर त घनचक्कर से लेले, उटचक्कर तक लगावेलन स। साँच कहीं त एह परिक्रमा के कवनो अन्त नइखे। चान पृथवी के, पृथिवी सूरुज के परिक्रमा कर रहल बा एह सकल चराचर में केहू चक्कर से बाँचल नइखे। राजनीति के चक्कर त दलदली हवे, जे एक बेरि गिरल, से फेरु उठल ना !तेहू में कहाउति ह कि राजनीति के ऊँट कब कवन करवट बदली, खुद उँटवो के नइखे पता। हँ, कुछ अइसन तिकड़मी बाड़न कि ऊँट राम के नकेलवे धइ लेले बाड़न। अइसनकन के त पद के “सनीचर” उतरलो पर महातम बनल रहेला। कबो कहीं मन्त्री, कबो सलाहकार। कबो कहीं अध्यक्ष त कबो डाइरेक्टर ! पद से उतरलो पर, पद क बोखार ना उतरे, टम्परेचर कम बेसी भलहीं हो जाव।

पैतराबाजी से चक्कर में सान चढ़ावल जाला। दाँव नया नया, मोका मुताबिक ढंगो नया। पब्लिक बेचारी जाई त कहाँ। एगो कहनी सुनले रहलीं, जवना में कवनो कानी मेहरारू, अतने में मगन रहे कि ओकर मरद बजार से एगो दिठार आँखि लियावे के कहि के चल गइल रहे ओकर आस, विश्वास पक्का रहे कि मरदा जहिया ले लवटी, अँखिया लेइये के लवटी …हमनियो के हौसला ओकरे नियर बुलन्द बा ! लोकतंत्र के गाड़ी, जनता का एही होसला आ भरोस पर डगरल आइल। हमनियो के दिन कहियो फिरबे करी।

पद आ कुऱुसी के लोभ में जवन तिरखा होले, ओके ऊहे बूझी जेकरा एकर सवाद भेंटाइल होई। कुरुसी के ईहे सवाद चस्का में बदल जाले। कतने महापुरुष अइसन मिलिहें, जिनकर राजगद्दी भइल आ तखत ताज छिनाइल, बाकिर ऊ हार ना मनले। कबो हिरिस बेचैन कइलस कबो चस्का उदबेगलस आ ऊ चक्कर चलावत रहि गइले। ओ लोगन के इहे लागत रहि गइल कि उनकर चलावल चक्कर कहियो त काम करी, काहे कि ओ लोगन के अपना तिकड़मी चाल आ चक्कर प भरोसा अडिग रहे। ओइसे कुरुसी से उतरल आदमी के (जेकरा ओकर पावर आ प्रभाव के रुतबा आ गुमान रहे) कुरसिया क इयाद चएन से जियहीं ना देले, ओकर चस्का उनका भीतर घोर-माठा करत रही। ऊ ओकरे खेयाल में जोड़त घटावत घोरियावत रहिहें। ईहे त चक्कर के महिमा हवे। इतिहास उलटि जाव, भूगोल बदल जाव ; बाकि कुरुसी आ पद रही, त चक्कर आ चस्को रही !


सम्पादक,”पाती”;टैगोर नगर, सिविल लाइन्स,
बलिया – 277001 (उ0प्र0)
8004375093, 9919426249

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