– नीरज सिंह


पुरनका शिवाला के पुजारी पं. गोबिन मिसिर के पराती के राग पहिले उठे कि मियाँ टोली के मुरुगवन के बांग पहिले सुनाय- इ केहू ना कहि सकत रहे। ई दुनो बात होखे आ ओकरा संगे-संगे सउँसे जगदीशपुर में जगरम हो जाय। बाग-बगइचन में चिरई चहचहाय लागँ सन। कुइयाँ-इनार प पनिहारिन एकट्ठा होके रहि-रहि के खिलखिलाये लागँस, बड़का पोखरा प नहाये-धोआये खातिर मरद-मेहरारू पहुँचे लागस, मंदिरन के घंटी रहि-रहि के बाजे लागे आ चारो ओर रास्ता बहराये लागे। थोरही देर बाद आगे-आगे गरदन में बान्हल घंटिन के मूड़ी झांट-झांट के बजावत बैल आ ओकनी के पाछे कान्ही पर हर आ जुआठ लेले हरवाह लोग। कहे वाला कहत रहे कि एने पंडीजी आ मोलवी साहेब लोग के दुआरी प पढ़निहार जुटस आ ओने कई गो हरवाह लोग कट्ठा-दुकट्ठा जोत-दोखार देत रहे। कहे के माने ई कि सुरुज भगवान के मुसकइला के बाद जवन ललकी किरिनिया फूटँऽ सऽ आ छछाइल-धधाइल धरती माई के कोरा में समाये खातिर दउड़ँ सऽ, ओकनी के जमीन प उतरत-उतरत जगदीशपुर में जिनगी के कार-बार शुरू हो जात रहे।

ओहू दिन त ओइसहीं जागल रहे जगदीशपुर बाकिर देखते-देखते कोहराम मच गइल रहे। जेकरा के देखऽ, उहे गिरत भहरात बाबू के महलिया के ओरे दौड़ लगवले बा। अनजान आदमी केहू के रोक के पूछहूँ के कोसिस करे तऽ ऊ एको सबद बोले के तइयार ना। बतइबो करे त कइसे, अपने एह उड़त खबर के सच्चाई परख लेबे तब नूं केहू के कुछ बताओ। जेकरा के देखऽ ऊहे- ‘का भईल? ए भइयवा?… कुछ बताव ना इयार!’ कइले बा आ ओकर गोड़ अपने-आप बाबू के महल के ओरे घूम जात बा। देखते-देखते नगर के खास आ आम-सभ केहुए महल के भीरी एकट्ठा हो गइल। पहिले सउँसे दालान भरल, ओकरा बाद बरामदा, फेरु सामने के सहन आ ओकरा बाद गते-गते सउँसे मैदान। अइसन जुटान केहू के दरवाजा प कबहूँ-कबहूँ होखेला। जइसे छोटका बबुआ के तिलका के दिन भइल रहे भा बड़का मलिकार के इंतकाल के दिन भइल रहे, भा उनका सराध आ बबुआन के पगड़ी बन्हइला के दिन भइल रहे। ओह सभ मौकन प लोग चाहे त दुखी रहे भा सुखी रहे। अइसन बिचबिचवा हालत कबहीं ना रहे। जइसे-जइसे भीतर से छन-छन के खबर बहरियात रहे, लोगन के चेहरा प अचरज के रेघारी खिंचात जात रहे। सभ केहू के मन में एके सवाल- ई कइसे भइल भगवान? महीनवन से जेकर सांस टँगाइल रहे, कंठ रुन्हाइल रहे, बउसाव पटाइल रहे, अन्न छूट गइल रहे आ जेकरा जिनिगी के गाड़ी कसहूँ-कसहूँ दूध, फल के रस आ पानी के सहारे खिंचात रहे, ऊ सकलनाथो कुँवर रानी बोले लगली, लोग के बोला-बोला के हाल-चाल पूछे लगली- ‘इ कइसे भइल दइब?…. धन्न हवऽ तूं भगवान….’ ‘जेहि के किरपा पंगु गिरि लंघै, अंधन के पुनि देत दिखाई…. धन्न हवऽ…. धन्न हवऽ तूँ ए अन्तरजामी!’

‘रानी ठीक हो गइली, रानी बोले-बतियावे लगली’ – खबर जेने-जेने पहुँचल, खुशी के लहर दउड़ गइल। परजा-पवनी, नोकर-चाकर, गोतिया-देयाद, हितई-नतई गते-गते बाढ़ के पानी जइसन पसर गइल खबर। लोग-बाग दउड़ परल सुनतहीं। भीठहाँ से, दलीपपुर से, नोखा, ससराँव- सगरो से। अइसन अनरीछ पहिले केहू सुनलहीं ना रहे। सतखंडा महल के चउथका अँगनई में रहत रही रानी। पँचवा खंड में पतोह आ ओकरा पीछे वाला खंड में नतिन पतोह – गिद्धौर राज के बेटी, जवना के बियाहे खातिर गइल बरिआत के खिस्सा आजु ले सै-पचास कोस में सुनल-सुनावल जाला। पतोह-नतिन पतोह आ गोतिया-देआद के मेहरारून के झुंड घेरले रहे, रानी के आ ऊ आदमिन के मुँह चीन्ह-’चीन्ह के कमजोर आवाज में ओकरा से हाल-चाल पूछस- ‘ठीक से बाड़ू नूं हीरामन बो?… रउवाँ कहवाँ रहत बानी ए पड़िताइन जी? एने कवनो ओह-पता ना मिलल हा राउर!… आ ए चनरिकाबो बहिनी! मलिकार ठीक बाड़न नूं तोहार?’ जेकर नाँव पुकारस रानी, ऊ धन्न-धन्न हो जाव – ‘राज के बड़की मलिकाइन आ अइसन नेह-छोह हमरा से!’ ओकर आँख लोरा जाय आ ऊ मुँह फेर के लुगा के अंचरा से आपन आँख पोंछे लागे। एही बीच पाछे से कवनो बड़-बूढ़ चिहुँके – ‘तनी अगवा से हटऽ बहिनी लोग…. कोइर टोली के मेहरारू आइल बाड़ी स….’

कोइरटोली के बाद हज्जम टोली, अहीर टोली, दुसाध टोली, सोनर टोली, कमकर टोली, चमरटोली – चारो ओर के मेहरारू झुंड बान्हि के रानी के देख गइली स। रानी के देख के, उनका से असीस मांग के लउटत मेहरारून के मुँह से बस भगवान से एके पराथना- ‘हे दइब! जइसे हमरा रानी के बोली-बानी लवटवल, उनकर इयाद लवटवलऽ तसहीं कुछ बरिस खातिर उनुकर जिनिगियो लवटा दऽ। बड़ा हुलास रहल हा उनुकरा परनाती खेलावे के…. उहो पूरा हो जाइत त सुखी मन से तहरा लोके जइती हे प्रभु!…. अब जवन बा, सभ तहरे हाथ में बा…. दरबार से त उनका आस उम्मीद ना पहिले रहे, ना आगे रहे के उम्मीद बा….।’

मेहरारून के भीड़ छँटल त मरदन के ठेलमठेल शुरू भइल बुझात रहे। जइसे रानी के गोड़ जे छू लेलस, ओकर बैकुंठ में पक्का-पकी जगहा लिखा गइल – रेहन ना, बैनामा। आ ओतने ना, ओइजाँ से लवटला के बाद का मरद आ का मेहरारू- ‘सभ केहुए नहा-धोआ के हाथ में भर लोटा जल लेके दरबार माने बाबू माने कुँवरा दादा के बनवावल नयका शिव मंदिर में उमड़ गइल – जय हो भोलेनाथ!… जय हो भोले भंडारी… दरबार के सुख-चैन पहिलहीं अस आबाद कर दऽ प्रभु!… आ खाली ओहिजे ना, बलुक मइयाथान, ठाकुरबाड़ी जइसन सभ देवस्थानन में भगवान के गुन-गान होखे लागल – हरे राम, हरे राम, राम राम हरे-हरे….।’ दुघरी दिन चढ़त-चढ़त गढ़ प’ के हाल देखला प’ बुझात रहे कि जइसे थोरिका देर पहिले कवनो फउजी लश्कर रात्रि विसराम क के आपन रहता ध’ लेहले होखे भा गंगिया माई के बाढ़ उतरला का बाद जगह-जगह ओकरा चढ़ती के संगे पहुँचल चीज-बतुस रह गइल होखे।

अपना दलान के बरामदा के पुरबारी हिस्सा में भोरहीं से बइठल बाबू साहब अबहियों आवे-जाये वाला लोगन से पहिलही जइसन बात-बतकही करत रहस। लोग उनुकरा से तरह-तरह के बात कहस, परतुत देस आ जेकर जइसन हैसियत रहे, ओकरे हिसाब से आ अपना तरीका से बबुआन के परबोधे के कोसिस करस। उहाँ के जेकर बात नीमन लागे, मूंड़ी हिला के ओकरा से सहमति जताईं आ नीमन ना लागे त अनसइला अस दोसरा तरफ देखे लागीं। एही बीचे रह-रह के खवास-खवासिन आवँऽ सऽ आ बइठल लोगन से जल-जलखई खातिर पूछ जा सन। जेकरा जरूरत होखे, ऊ परात में धइल पानी के चुक्कड़ आ मिसिरी की ढेला उठा लेबे, खाये, पानी पीये आ बरामदा से उतर के एगो कोना में खाली चुक्कड़ फेंक देबे। ओहिजा बटोराइल चुक्कड़न के टाल के देख के पता चलत रहे कि आजु कइसन जमवड़ा जुटल रहल हा गढ़ पऽ।

जहवाँ बबुआन बइठल रहलन, ओहिजा से थोरिका दूर हट के पच्छिम ओरिया के देवाल से सटा के बिछावल दरी प’ बइठल पुरोहित जी, जोतसी जी आ भंडारी जी, बुढ़वा बैद जी से तरह-तरह के सवाल करत रहे आ उहाँ के बहुत गम्भीरता से ओह लोग के जबाब देत रहीं। ओइसे भीतर से खुस सभ केहुए रहे, बाकिर कुछ-कुछ ससंकितो रहे। दिक्कत इ रहे कि अन्दर घुमड़त असली सवाल के ओठ प’ ले आवे के कवनो रहता केहू के ना सूझत रहे। खाली एने-ओने के बतकही होत रहे। तबहिएँ पुरोहित जी के मन में कवनो बात आइल आ उनुकर आँख चमक उठल –
सुनीं सभे! हम एगो बात जानल चाहत बानीं। रउआ सभे गुनी आदमी बानी – एह से समझ-बूझ के बताईं जा – रानी अब ठीक हो जइहें नूं? राउर जोतिस का कहत बा जोतिसी जी? आ रउआ त भोरहीं रानी के नाड़ी जँचले रहनी हाँ बैद जी – का बुझाता?

पुरोहित जी के सवाल सुनके बैद जी के आँख पताल ढूँढे लागल आ जोतिसी जी आसमान निहारे लगलन। जब ओह लोग के जबाब देबे में देर भइल त उहे सवाल भंडारी जी माने मुंसी भभीखन लाल दोहरवले – का बुझाता बाबा? कुछ बताईं जा?

भंडारी जी के सवाल सुनि के दुनो आदमी धरती प’ लवट आइल लोग आ एक-दोसरा के देखे लागल। आखिर में जोतिसियो जी के जबान खुलल – हमार कवनो विद्या काम नइखे करत ए भाई लोग।… ओह कोठरिया में अकेले बइठके हम रानी के गरहे-नछत्तर बिचारत रहनी हाँ। रातिये के सोचले रही कि अब हिम्मत क के बबुआन से कहब।… कहब कि जे भइल, सेकरा के अब भुला दीहीं। काहे कि रानी के अरदोआय अब खतम बोलऽता।… कब साँस टूट जाई, कहल ना जा सके। एह से रउओ उनुकरा भीरी घरी-दु घरी बइठ के संतोष कऽ लीहीं… बाकिर भोरे-भोरे जवन सुनाइल हा आ ओकरा बाद अपना आँख से रानी के देखला के बाद से हमार अकिले काम नइखे करत….।

‘इहे हाल त हमरो बा ए महाराज।’ बैद जी कहलन- ‘हम तऽ आजुओ रानी के नाड़ी देखनी हाँ त पहिले से कुछ खास अन्तर ना लागल हा। हँ, नाड़ी तनिका शांत जरूर भइल बिया, जवना से रानी क हाँफ नइखे उठत आ बोले-बतिआवे में कष्ट नइखे होखत। बाकिर हतना दिन के कंठरुन्ही के बाद अइसे एक ब एक टनमना गइला के बाद त हमरो बुझात नइखे कुछ। …. का कहीं हम?’

‘जब रउआ सभे लेखा पचास कोस में मानिन्द गुनी लोग के इ हाल बा त अब अलगा से कहे के त कुछुओ रहिये नइखे जात बाकिर हमरा अब कुछ दोसरे बुझात बा’, पुरोहित जी कहलन- ‘आ हम हिम्मत क के कहतानी कि रानी अब जादे देर ले ना ठहरिहन। उनकर इ टनमनाइल, इ बोलल-बतिआवल – सभ चला-चली के बेरा के चीज ह। जइसे बुतइला के पहिले दियरी के लौ खूब तेज हो जाला, वइसहीं सरीर तेयागे के पहिले जीवो चरफराये लागेला। हमनी के भले इ बात ना बुझाये बाकिर अनपढ़-गँवार कहाये वाला लोग-बाग सभ चीज बूझेला।… अँसहीं का मेला बटोरा गइल हा? जे आइल हा, ऊ इहे सोच के आइल हा कि चलऽ, चलाचली के बेरा में रानी के असिरबाद ले लिआव!’

– ‘अइसन बात त बबुआन से रउए कहीं ना? बैद जी, जोतिसी जी आ भंडारी जी एके साथे बोल पड़लन – मिरित भुवन तेयागे वाला जीव से कइसन द्वेस आ कइसन दुसमनी? चल के एक बेर उनुकर हाल-चाल पूछ लेतन।’

– ‘कहनी हाँ ना, पुरोहित जी कहलन – कहनी हाँ कि जजमान, तनिका रानीके गोड़तारी जाके खड़ा हो जाईं। मन ना करी त बोलब-बतिआइब मत, खाली खाड़े रहब ऊहाँ के नजर के सनमुख। ऊहाँ के कुछ कहब चाहे ना, बाकिर आतमा जुड़ा जाई ऊहाँ के। चलीं, हमरा साथे चलीं बाकिर काहे के – एके बात – ना बाबा, ना…, ना…. हमरा के ऊ अपना सामने आवे से मना कइले बाड़ी… जाइब त उनका कष्ट होई। एह से ना… छोड़ दीहीं, अब अगिले जनम में…।’

– जान तानी सभे, कहे के त ना चाहत रहे बाकिर पता ना, कइसे त हमरा मुँह से अपने आप निकल गइल हा, पुरोहित जी कहलन- ‘मना त ऊहाँ के ना कइले रहीं जजमान… हँ, ई जरूर कहले रही कि आगे से जब आइब हमरा भीरी, त अकेलहीं आइब!… हम रउआ एह दुलरो के देखल नइखीं चाहत। इनका संगे आइब त हमार मुअल मुँह देखे के तइयारी क के आइब। एह से रउआ चलीं। अकेले आवे-जाये के ऊहाँ के तरफ से कवनो मनाही ना रहे सरकार।’ ‘कतनो समझवनी हाँ, बाकिर काहे के- बस, एके लकीर- जाये दीं महाराज जी! एह गिरत ई उमिर में अब राजपूत के बचन-भंग मत करवाईं। हमहूँ मेहर के हाथ धइले एके बात कह के उनुकरा सामने से हटि आइल रहीं कि आगे तहरा किहाँ हम कबहुओं आइब त अकेले ना आइब आ जबले हमरा के बोलइबू ना तबले तहरा किहाँ अइबो ना करब रानी सकलनाथो कुँवर।’ ‘रउआ त सभ देखलहीं रही महाराज जी, तब काहे के धरम-संकट में डालत बानीं हमरा के!… कहत-कहत बबुआन के आँख लोरा गइल हा। ओकरा बाद हमरो से कुछ कहाइल हा ना। रउआ सभे एही आस-उम्मीद में बइठल बानीं कि का जाने कब बबुआन के मन फिर जाव त उनुकरा संगे जाके कुछ संकलप-ओनकलप करवा देहब।’

पुरोहित जी के बतकही सुनके बैद जी आ जोतिसी जी दुनो आदमी एकदम चुपा गइल लोग। बैद जी के मन त रोवे के करत रहे, बाकिर मरद रहन, अपना मन के काबू में कइलन आ कहलन- ‘एकरे के करम के फेरा कहल जाला। रउओ सभे त भीतर-बाहर अइबे-जइबे करीलें। बाकिर बर-बेमारी का चलते भा असहूँ अपना कर्तव्य के निबाहे के लेहाज से हमरा राजा-रानी दुनो आदमी से बोले-बतिआवे के मोका सुरूए से मिलत रहल बा। एक-दोसरा के इ दुनो आदमी कतना इज्जत करत रहे लोग, ई सऊँसे जगदीशपुर जानेला। बुझात रहे कि इ दूनो आदमी एक-दोसरे खातिर बनल होखस लोग। रानी के बेमारी के हालत जाने खातिर बबुआन के बेयगरियो हम रोजे देखत बानी महाराज जी! एको दिन अइसन ना भइल हा कि हम भीतर रानी के देखि के बाहर आइल होखी आ इहाँ के ऊहाँ के हाल-समाचार ना पुछले होखब। ओने रानियो के हम इहे हाल देखनी हाँ। … बोले-बतिआवे के शक्ति त भगवान उनुकर छीन लेले रहलन हा, बाकिर जब हम ऊहाँ के सामने जाइब त एक छन हमरा ओरे देखि के मूड़ी हिला के ‘ठीक बानीं’ कहे के कोसिस करब आ तुरंते हमरा पाछे के ओर देखे लागब। हमरा हमेसा इहे बुझाइल कि ऊहाँ के बबुआनो के आसरा देखत रहनी हाँ।… हम कई बेर बबुआन से ई बात कहबो कइनी आ कई तरह से कहनी, बाकिर ऊहाँ के एके रट – ‘इच्छा त हमरो करत बा बैद जी बाकिर हम जानत बानीं कि हमरा गइला से ऊहाँ के खुशी ना होई। काहे कि हम अकेले जाइब ना, आ ऊहाँ के दूनो आदमी के जवरे देखल चाहब ना…।’

केहू से कुछ कहल-सुनल बरते ना रहे। अब आगे बतिआवहूँ के का रहे! ना ओहिजा से हटहीं के सवाल रहे। बबुआन भीरी अबहियो भीड़ लागल रहे। लगले छोटका बबुआ अमर सिंह के ससुरार से दु बैलगाड़ी भरल मरद-मेहरारू पहुँचल रहे लोग। ओने जितौरा तक लेके गाँवन में बात पहुँच गइल रहे। एह से खास जगदीशपुर के लोगन के अपना घरे लवटि गइला के बादो भीड़ में कवनो कमी ना आइल रहे। जल-जलखई करावे के सिलसिला वोसहीं चलत रहे। भंडारी जी ई सभ देखतो रहन आ कुछ सोचतो रहन। अचनके उठि गइलन- ‘हतना दिन चढ़ गइल महाराज जी आ रउआ सभे बिना कुछ खइले-पियले बइठल बानीं। ठहरीं, हम कुछ फल-फरहरी के इंतजाम करत बानीं।’

भीतरा से छोटका बबुआ अमर सिंह जब आँख पोंछत-उदासल बहरा अइले त पहिले त लोग के बुझाइल कि ऊ मतारी दाखिल भउजाई के ढेर दिना के बाद देखला आ उनुकरा से कुछ बोलला-बतिअवला के चलते माया में पड़ि गइल बाड़न बाकिर जब ऊ झटके में एह कोना-बैद जी आ पुरोहित जी ओरे बढ़लन त सभ लोग कवनो अनिष्ट के आशंका से मने-मने काँपि गइल। सभ केहुए अपना जगहा पर उठि के खाड़ हो गइल। – ‘कुछ हो गइल का बबुआ जी?’

– ‘अबहीं तकले त भइल नइखे महाराज जी, बाकिर बुझाता कि अब होइबे करी। वोसहीं आँख पोछत अमर सिंह कहलन – ‘हमरा किहाँ के गोल जुटल हा आ मलिकाइन के बोलत-बतिआवल देखल हा त कुछ जादहीं खुश हो गइल हा। नवरंगी के रस पियावे लागल हा लोग त मलिकाइनो ओह लोग के मन राखे खातिर पी लिहली हा आ बुला रोज से अधिका पी लिहली हा।… पी त लिहली हा महाराज जी, बाकिर आन दिना लेखा पचल हा ना…. तुरतले ओका दिहली हा। आ ओकरा बादे उनुकर आँख तरेराये लागल हा, देह अइठाये लागल हा। हाथ-गोड़ दबावल हा लोग त अब कुछ राहता प’ आइल बा तबीयत…।’

– ‘आहि दादा, बैद जी हड़बड़ा गइलन – अतना सब कुछ हो गइल छोटका बबुआ जी आ हमरा के कवनो खबर ना? एही नीमन-बाउर खातिर नूं हम भोरहीं से अगोर के बइठल बानीं इहवाँ…’ कहत-कहत ऊ आपन झोरा उठवलन आ सीधे अन्दर दरबार में।

– आ एगो बात अउरू महाराज जी, अमर सिंह पुरोहित जी से कहलन – हमरा ठीक से बुझात नइखे, का कइल जाव!… मलिकाइन के हालत-देखके लोग-बाग फेरू एगो बाछी छुआवे के सलाह देबे लागल हा त ऊहाँ के हाथ के इसारा से मना कर दिहनी हाँ आ कुछ देर ले आसमान ताकत रह गइनी हाँ। एही बीच में ऊहाँ के आँख से लोर ढरक गइल हा। हमरा घरे के अपना अंचरा से मलिकाइन के आँख पोंछे लगली हा त ऊ उनुकर हाथ ध’ लेहली हा आ कहली हा – ‘अब इ कुल्हि छोड़ द दुलहिन… बहुत दिन कइलू लोग, अब हमरा के जाये दऽ! जिनिगी के दाँव हम हार गइनी… अब आना-आनी के कुछ नइखे।… उनका के बोलवा द तनिका….’

– कहनी हाँ – ई बात रानी अपना मुंह से कहनी हाँ छोटका बबुआ? पुरोहित जी आ जोतिसी जी – दुनो आदमी चिहा गइल लोग – त अब देर कवना बात के जजमान! बबुआन के जल्दी ले चलल जाव मलिकाइन के सोझा…
– ‘इहे त हमरा बुझात नइखे महाराज।… ऊ जइहन?’
– ‘जइबे करिहन। काहे नाऽ जइहन?’
– ‘अकेले जइहन?’
– अब अकेले-दुकेले के बात कहाँ रह गइल छोटका बबुआ? बोलवला के मतलबे इहे बा कि राजा आवस – अकेले आवस चाहे जइसे आवस।…. रउआ ढेर सोचीं मत, पुरोहित जी कहलन- हम कहत बानी
नूं बबुआन से…

बबुआन से कहाइल त उहो अचकचा गइलन – ‘हमरा लागता कि तहरा लोग के ऊहाँ के बात सुने-समझे में कवनो गलतफहमी भइल बा… हमरा विसवास नइखे होत कि ऊहाँ के अइसन बात कहले होखब…’
– कवनो गलती नइखे भइल भइया, अमर सिंह कहलन – ऊहाँ के अपना मुंह से कहनी हाँ आ हम अपना कान से सुननी हाँ, तबहिए हम रउरा भीरी आवे के हिम्मत कइनी हाँ। … ऊहो होत ना रहे एह से महाराज जी लोगन से सलाह कइला के बादे रउरा से निहोरा करत बानीं।… चलीं, हमार बात मानी भइया…. जल्दी से चलीं।
– छोटका बबुआ के बात प’ भरोसा करीं बबुआन, पुरोहित जी कहलन – देर कइला से कवनो फायदा नइखे।
– त ठीक बा अमर, बबुआन कहलन- ”तू जल्दी से फिटिन भेज के नयका बंगला प’ से मेहरून्निया के बोलवा लऽ ऊहो बेचैने बाड़ी। सबेरे से कई बेर खबर भेजवा चुकली आवे खातिर। हमहीं मना कर देनी हाँ। जा, जल्दी करऽ!“
‘अमर सिंह छन भर बबुआन के चेहरा निहरलन, फेरू उनुकर नजर महाराज जी लोग ओरे गइल। आँखिन-आँखिन में तनिका संवाद भइल आ ऊ बरामदा से उतर के सहन प’ खाड़ हो गइलन…. ”भरत सिंह, जरूरी से फिटिन लेके नयका बंगला प’ चल जा आ…“

दिन तीन पहर से अधिका बीत चुकल रहे। सुरुज के ताप में धीरे-धीरे कमी आवे लागल रहे आ ऊ अब रात्रि विसराम के तइयारी में पच्छिम दिशा में तेजी से सरके लागल रहन। जगदीशपुर गढ़ के सामने के मैदान में लोगन के भीड़ त अबहियो रहे बाकिर पहिले जतना ना। दूर-दराज से आइल लोग अपना-अपना घरे लवटे लागल रहन बाकिर खास जगदीशपुर आ आस-पास के लोगन के आवा-जाही अबहियों लागल रहे। जब नयका बंगला से लवटि के फिटिन आइल त मैदान में तनिका हलचल अस भइल बाकिर राज के सिपाही आ महल के पहरुआ सभ; केहू के भीरी ना ठेके देलन स। घर-परिवार के रहनगर मेहरारुन लेखा सुन्दर, गुलाबी रंग के हल्का जरीदार साड़ी पेन्हले, लिलार प’ लाल बिन्दी लगवले आ चांद जइसन दपदपात गोर मुखड़ा प’ तनिका घूंघट गिरवले लाम-लहकार,पातर छड़ी जइसन खाड़ मेहरुन्निसा के देख के केहू सपनो में ना सोच सकत रहे कि ऊ कुछ बरीस पहिले ले नाचत-गावत रही। कवनो साज-सिंगार ना कइला के बादो उनकर रूप अपरूप लागत रहे।

मेहरुन्निसा जब सहन में पहुँचली त अमर सिंह उनुकर अगवानी कइलन आ बरामदा के सीढ़ी चढ़त खानी अपने से बबुआन। ओकरा बाद तनिको देर ना भइल। आगे-आगे पुरोहित जी, जोतिसी जी, भंडारी जी आ छोटका बबुआ बाबू अमर सिंह आ ओह लोग के आगे-पीछे बबुआन आ मेहरुन्निसा। रानी के अंगनई में पहुँचला के बादो मेहरुन्निसा के गोड़ तनिका थथमल, बाकिर, उनुकरा कोठरिया में ढुके के त उनका हिम्मते ना पड़ल। उ दुअरिये प’ खाढ़ हो गइली। इ देख के रानी के पलंग भीरी पहुँचे-पहुँचे भइल बबुआनो थथम गइलन आ पाछे मुड़ि के आँख के इसारा से उनुकरा के भीतर आवे के कहलन। पता ना कइसे, रानी के बबुआन के धरमसंकट के पता चल गइल। ऊ कहली – ‘आवल जाव… हम दुनो आदमी के बोलवनी हाँ…।’

बबुआन मलिकाइन के पलंग भीरी आके खाढ़ भइलन आ ठीक उनुकरा पीछे मेहरुन्निसा के इसारा से अपना भीरी बोलवली – ‘दोषी त तूं बाड़ू हमार… हमार सवांग हमरा जीयते अधिया लेलू, एकरा से बढ़ के दुसमनी आ घात हमरा संगे दोसर का होई?… बाकिर जा, हम तहरा के माफ करत बानी।… एह से माफ करत बानी कि लोग-बाग हमरा से आजु ले तहार बड़ाइये कइले बा।… केहू तहरा सील-सुभाव के खिलाफ कबहियों कुछ नइखे कहले। खाँटी गिरहतिन बन के रहत बाड़ू।… तूँ हमरा के हरा देलू बबी।… तहरा के छोड़ के एको छन खातिर हमार मलिकार हमरा घरे झांकियो पारे ना अइलन हाँ…।’
– अइसन मत कहल जाव मलिकाइन, जेकरा दहाड़ से छछात बाघ के करेजा काँपे लागत रहे, ऊ बबुआन बाबू कुँवर सिंह एकदम लइका लेखा फफकि पड़लन – ‘अपनहीं के हमरा के मना कर देहले रहीं। हम छत्री एक बेर एह मेंहरारू के हाथ थाम्हि लेला के बाद छोड़ कइसे सकत रहीं? ई हमरा धरम के, जात के आन के आ पुरुख के सुभाव के उल्टा बात होइत कि ना? रउवें बताईं मलिकाइन, खाली एगो एह बात के, हम रउआ से कबहीं-कवनो गलती कइले बानीं? गीत-गवनई आ नाच के महफिल में त हम लइकइये से आवत-जात रहीं, बाकिर एने-ओने के कवनो बात रउआ इनका से पहिले सुनले रहीं, कबहीं?… हम जान-बूझ के कबहीं कवनो गलती नइखीं कइले मलिकाइन, जवन भइल तवन परिस्थितिवश भइल।… तबहुओं हम रउआ आगे हाथ जोड़त बानीं – अब हमरा के…. इनका के….’

एकरा आगे बबुआन के कुछुओ ना बोले दिहली रानी- ‘अब अइसन मत करीं… हमार ऊहो लोक मत नासीं मलिकार!…’ बाकिर एक बात कहब रउआ से – ‘जइसे आज ले आपन बचन निभवनी हाँ, तसहीं आगहूँ निबाहब! इनका के कवनो हालत में कबहीं छोड़ब मत… इनकर इज्जत-हाल के ओसहीं खेयाल राखब – आ हरमेसा राखब, जइसे आज ले रखनी हाँ।… अपना घर-परिवार के आदमी बुझब इनका के, जइसे थोड़-बहुत कमी-बेसी के साथ हमरा के बुझत रहनी हाँ।… अउरू एगो बात इ कि बाबू उदवन्त सिंह के खानदान के एक रखे के कोसिस करब आ सभ केहू के मान राखब।… आ बबी! तूं तनिका हमरा भीरी आव, बबुआन के पीछे खाढ़ मेहरुन्निसा के रानी अपना भीरी बोलवली। ऊ जइसहीं आगे डेग बढ़वली, उनुकरा दुनो आँख से गंगा-जमुना बहे लगली।
– रोवऽ मत बबी, अब रोवला में कुछ बा ना, रानियो के आँख लोरा गइल रहे आ बोलिओ भहराये लागल रहे – ‘तू त रहलू हा हमरा बेटी-टाटी के उमिर के, बाकिर हमार करम-किस्मत तहरा के हमार बहिन के दरजा दिला दिहलस।… अब जवन भइल तवन त होइये गइल, आगे खातिर हम तहरो से इहे बात कहब कि निबहिहऽ तुहूँ।… तहरा लोग के धरम में तलाक के रेवाज बा, हमनी के धरम में नइखे। एहिजा मेहरारू के परीछ के घर में भितरि ले आवल जाला आ अन्तिम बेरा ओसहीं साज-सिंगार क के बहरिआवलो जाला हरमेसा-हरमेसा खातिर। … एही से कहत बानी कि हमरा बबुआन के हाथ धइले बाड़ू त कबहूँ-कवनो हाल में छोड़िहऽ मत …. दुनिया चित्त से पट हो जाय तबहुओं ना…।’

– ना छोड़ब मलिकाइन, मेहरुन्निसा कलपे लगली-छोड़हीं के रहित त धरिती काहें खातिर? हम त बीच बाजार में बइठे वाली रहनी हाँ, एगो घर के खूंटा से काहे बन्हइतीं मलिकाइन! छोड़े के होई त राउर बबुआने छोड़िहन – हम मरते दम ले ना छोड़ब।’

रानी टुकुर-टुकुर देखत रहली- रोवत-कलपत मेहरुन्निसा के। फेरू उनुकरा मन में ना जाने का आइल – ऊ छोटका बबुआ के मेहरारु – आपन छोटकी गोतनी के भीरी बोलवली आ कहली – ‘छोटका बबुआ बो! आपन हाथ द हमरा के… ना छोड़ऽ… तनिका हमार मांग के सेनुरवा अपना अंगुरी से बोर के इनका अँचरा से ठेका द… ठेका दऽ हम कहत बानी नूं…।’

मेहरुन्निसा अपना साड़ी के अंचरा के फाँड़ बना लेली आ छोटका बबुआ बो रानी के माँग के सेनुर में बोरल आपन अंगुरी ओकरा में ठेका देहली। रानी इ देखि के जोर-जोर से सांस लेहली आ आँखिन से ढर-ढर लोर ढरकावत मेहरुन्निसा के ओर देखत कहली – ‘ई खाली सेनूर ना छुआवल गइल हा बहिनी, हम आपन थाती तहरा के सऊँपनी हाँ – हम बबुआन के जिनिगी में तहरा के आपन जगह दिहनी हाँ।… इहे तहार एहवात ह, तहार सत आ पत हऽ!… हम इनकर करम के संगी रहनी हाँ, तू धरम के बनिहऽ।… आ सुनऽ छोटका बबुआ बो! तुहूँ लोग इनकर मान रखिहऽ लोग… सभ केहू इनकरा के धरमन कहिहऽ लोग…धरमन बाई ना धरमन बीबी। सुनऽतारू नूंऽऽ…हम…।’

लोग त सुनते रहे आगहूँ सुनल चाहत रहे बाकिर कहे वाला के बोलतवे उड़ि गइल रहे। एकाएक जोर से हिचकी आइल – उहो बस एक बेर आ खेला खतम। रोवन-पीटन लाग गइल, बाकिर ओह में अब का रहे। रानी गइली, संगे-संगे मेहरुन्निसो गइली। रह गइलन बबुआन आ रह गइली धरमन।


संपर्क –
वीर कुँवर सिंह नगर, कतिरा, आरा, बिहार

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