(कविता-अंक ”पाती“, सितम्बर-1993 से मार्च 2021 अंक में फेरु प्रकाशित)

  • डॉ अशोक द्विवेदी

आज के असहाय, उपास, बेचैन आ फिकिरमंद अदिमी के दिनो-दिन झुरात जीवन-रस आ सौंदर्य-चेतना के महसूस करे वाला रचनाकार का सोझा सबसे पहिले जेवन चुनौती बा- ऊ ‘जोगवला’ आ ‘जगवला’ के बा। आडियो-वीडियो का धुआँधार में लिखित-साहित्य के अस्तित्व पर अइसन संकट कबो ना घहराइल रहल हा।

आधुनिकता का पइसार का साथे कई गो विकृतियो समाज में आ गइली सन। ओम्में सबसे खतरनाक विकृति रहे सांस्कृतिक चेतना आ स्तरीय साहित्य से लोगन के विरक्ति। कुछ लोग एकरा खातिर आजु के व्यस्त आ कठिन जिन्दगी के आ कुछ खुद साहित्यकार के कारन मानेला। हमरा समझ से भारतीय जनमानस आ ओकरा सोच के भटकावे-, ओकरा के घटिया फिलिम आ बाजारू साहित्य का ओर झुकावे वाला ‘माध्यम’ आ ‘लोग’ ज्यादा जिमवार बा। मीडिया आ सरकार एह विकृतियन के रोक का बजाय चुपे-चुपे प्रोत्साहित कइलस। व्यवसायीकरण धीरे-धीरे सभके दबोचत चलि गइल।

आजु देश के बड़-बड़ अखबार आ पत्रिका बन्द होत जा रहल बाड़न स। त छोट-मोट पत्रिकन के का औकात? टेप, टी0वी0 आ वी0डी0ओ0 का एह घुमगज्जर में साहित्य के सरलीकृत मनोरंजन के चीझु बनावे के साजिश आ अभियान चल रहल बा। आ सरकार मने-मन खुस होतिया कि चलऽ हमनी का तरफ से जनता के ध्यान बँटल बा। देश के नामीगिरामी समाजिक आ साहित्यिक संस्था खाली नाँवें के नौबत बजावत बाड़ी सन। कबो साल-दू साल पर कवनो समारोह भा कवनो अधिवेशन आ ओमे अपना हया-लाज के केहूँ तरे तोपला-ढँकला का अलावे एह संस्थन में कवनो चेतना जगावे आ नया बदलाव खातिर संघर्ष करे के प्रवृत्ति मू गइल बा।

अइसना में हर साहित्यकार-पत्रकार के कर्त्तव्य बा कि ऊ अब्बो से आत्मनिरीक्षण करो। आत्मविस्मृति आ आत्ममुग्धता से उबरि के एकजुट होखो… मिलि जुलि के हर जगह अइसन-जागरूक मंच बनाओ जहाँ से एह विकृतियन के दूर करे के जुझारू अभियान चलावल जा सके। कवि सम्मेलन आयोजित करे वाला लोगन से निहोरा बा कि ऊ विदूषक आ भांड़ कवियन से परहेज राखो आ जनचेतना के जगावे आ ओकरा ‘सोच’ के बदले वाला स्तरवान कवियन के प्रोत्साहित करो। सघन विचार गोष्ठियन में, उत्कृष्ट प्रतिनिधि साहित्य पर चर्चा होखो; गम्भीर, सरस आ उद्देश्यपूर्ण कविता के पाठ होखो।

संवेदनशीलता कवि के पहचान हऽ। ऊ एही का जरिये समय-सत्य के साक्षात्कार करेला। अपना युगबोध के सहज संस्कृति-चेतना से सँवार के समाज के ‘सोच’ के बदले खातिर ऊ ना उकसाई, आ ना जगाई त आज का संदर्भ में ओकर कविताई बेमानी बा। अपना ‘अहं’ के विसर्जित क के जन-जागृति खातिर, उद्देश्यपूर्ण दिसा देबे के जिमवारी रचनाशील लोगन के लेबहीं के पड़ी।

समकालीन भोजपुरी कविता

भोजपुरी कविता अपना लमहर विकास-यात्रा में अब अइसन मोकाम पर पहुँच रहल बिया कि ओकरा के दोसरा भाषा के साहित्य का आगा सम्मान से राखल जा सकेला। लोक-संपृक्ति आ सांस्कृतिक चेतना से जुड़ल लोकगीतन के थाती त ओकरा लगे पहिलहीं से रहे, अब ऊ अपना तेवर, लहजा, मिठास आ जिनिगी के भीतर समाइल शब्द संदर्भन का जरिये नया काव्य-प्रतिमान गढ़े जा रहल बिया। पारंपरिक छंद आ लय-विधान में एक से बढ़ के एक गीत आइल; सानेट, फ्री-वर्स आ नव-शिल्प-संरचना में भोजपुरी कविता धिरही-धीरे आपन पहिचान कायम कइलस। सुघ्घर चित्रमय-प्रतीकात्मक संकेत-सूतन से बिनाइल भोजपुरी कविता एह दशक में परंपरा से हटि के कबो सपाट बेयान, कबो अथ-गर्भ वक्र-कथन. कबो संवाद का मुद्रा में लउकति बा।

कुछ लोगन के कहनाम बा कि एकरा पर बाहरी प्रभाव पड़ रहल बा; बाकि गौरतलब बात ई बा कि संरचनात्मक परिवर्तन का बावजूद सशक्त कवितन में भोजपुरिया तेवर आ अनुभुति आन्हरों के लउकि जाई। आधुनिक जीवन-शैली आ समांतर भाषा-साहित्य का प्रभाव से कविता का लहजा, तेवर आ कथन में विविधता, तिक्खरपन आ गहराई आइल बा। एही से ऊ कहीं वक्तव्य, कहीं मुनादी, कहीं एकालाप आ कहीं बातचीत का लय में लउकति बा। भावो बा आ अनुभूति के गहिराइयो बा।

आजु के विसंगति भरल, जटिल मानव जीवन के अभिव्यक्त करत खा, ईमानदार कवि कल्पना के हवाई उड़ान नइखे भर सकत, सिरजन करत खा ओके कहीं संकेत, कहीं प्रतीक, कहीं व्यंग, कहीं चित्रविधान के सहारा लेबे के परत बा। असलियत के चित्रण खातिर वाजिब शब्दन के कलापूर्ण संयोजन आ भाषा के अर्थ-गर्भ इस्तेमाल से भोजपुरी कविता अउरी समृद्ध भइल बिया।

एह अंक के कई गो अइसन सशक्त कविता बाड़ी सन जवन आगे चल के भोजपुरी कविता के प्रतिमान बनावे में मदद करिहन स। नइकी पीढ़ी के कुछ कवि अइसन बाड़न जिनका लेखनी से नया संभावना उभर रहल बा। अइसन कवियन में प्रकाश उदय, दीप्ति, अनीश आ विजय प्रताप ‘आँसू’ के कविता अपना कथ आ भाषिक रचाव में एगो पहिचान बनावत लउकत बाड़ी सन।

हम कविता के नाम, विशेषण आ वाद से ना जोड़ि के, खाली ‘कविता’ का रूप में परोसे के कोशिश कइले बानी। ‘कविता आ कविकर्म’ पर खुद कवि के कहनाम महत्वपूर्ण होला। हर कवि के आपन अलग रचना-संसार बा। अभिव्यक्ति, टेकनिक, भाषा के बिनावट, कविता का संरचना में समाइल संदर्भ, अर्थ, लय, गति, आ काव्यानुभूति का लिहाज से इ ‘फरक’ लउकी। एह ‘फरक’ के कारन होला कवि के आपन मौलिक दृष्टि, अनुभूति आ सृजनात्मकता। कवनो अनुभूति केहू के कम, केहू के बेसी, केहू के सतही, केहू के गहिर हो सकेले…. कारन ओकर अलग-अलग संदर्भ आ भावभूमि के स्तर (स्टेज) होला। एह अंक के कविता रउवा से ‘सहृदयता’ का साथे ‘समझदारी’ के मांग करत, अपना में डूबे, आ अपना के समझे के न्यौता देत बाड़ी सन।

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के मार्च 2021 अंक पूरा पढ़े ला क्लिक करीं. )

By Editor