– चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह “आरोही”

गाँव का दक्खिन पश्चिम का कोना पर एगो विशाल कोठीनुमा मकान बा. ओह पर लिखल त बा श्रीराम भवन बाकिर दसई भवन का नाम से विख्यात बा. मकान मालिक का पुरखन में केहू दसई भइल होई.

प्रखण्ड के जीप दसई भवन के सामने लागल. भरभरा के लोग उतरल. बिडिओ का साथ पाँच पुलिस, एक हवलदार, जनसेवक, सुपरवाइजर, कर्मचारी अउर ना जाने कवन कवन दो लोग. कुर्सी चउकी बेंच पर लोग पसर गइल. नास्ता चाय चलल. गाँव घर के लइका सयान ललचाइल देखत रहलन. चौकीदारो आ गइल रहे. लइकन के चाय पर के मांछी अस भगावे बाकिर फिर फिर के सब छोंप ल स.

“चौकीदार! गोड़इत के ले लिहऽ. सब लोनी लोग के बोला ले आव.” बिडिओ का इशारा पर सुपरवाइजर कहले.

“ढेर लोग थोड़े थोड़े कर के दे रहल बा. दू चार आदमी बा जे रास्ता पर नइखे आवत. सुपरवाइजर साहब , जानत बानी.” सहकारिता पर्यवेक्षक तरफ देखत मन्त्री कहलन.

बिडिओ सहकारिता पर्यवेक्षक का तरफ देखे लगलन तब ऊ बोलले, “जी, हमहू चल जात बानी.”

“ठीक बा. जाईं, अच्छा रही.” बोल के बिडिओ मन्त्री के बढ़ावल तश्तरी में से उठा के पान खाये लगले.

गोड़इत के साथे आवत आदमी के धक्का दे दिआइत त गिर के मर जाइत. ओकरा कपड़ा के छू दिआइत तब ऊ फाट जाइत. बुझात रहे कि जनमे से जूत्ता ना पहिरले रहे. गोड़ के पाँचो अँगुरी पाँच दिशा में ताकत रही स. गोड़ के बेवाय चलत में काँट अइसन गड़त रहीस. माथ के बार जटाजूट भइल रहे. ठोकचा बइठल, झुरियन से भरल चेहरा. बराबर पाकुर पुकुर करत रहे. बिहटी पहिरले रहे आ कान्ह पर एगो फाटल पुरान धोती के टुकड़ा धइले रहे. भीतर बाहर लपलपात जीभ से भींजल ओठ के ओही टुकड़ा से पोंछ देत रहे. हाथ के लाठी अलगे धर के, दाहा अस दोल्हत, बिडिओ के प्रनाम करे चलल तब बिडिओ से इशारा पा के गोड़इत अलगे रोक दिहलस.

” का बात ह जी?” बिडीओ के बगल में बइठल सुपरवाइजर पूछले.

“सरकार ई समिति के पाँच सौ कर्जा लेले बाड़न. मंगला पर कहत बाड़न कि ना देब.” मन्त्री बतवले.

“सरकार! हम झूठ ना नू कहब. हम गरीब जरुर हईं बाकिर बेइमान ना हईं. हम झूठ कहीं तब हमार देह काम लायक मत रह जाय. हमार दसो नोह गल जाय.” गिड़गिड़ा के ऊ आदमी कहे लागल त बिडिओ डाँट दिहले.

“नाटक मत कर. हम तोहार डायलाग सुने नइखीं आइल. रुपया द ना त होने बइठ, जेल जाये पड़ी.” हवलदार के देखत, “बइठावऽ जी.”

“जी अच्छा.” हवलदार ओकरा तरफ बढ़त कहले.

“जेल कवना बात के?” हम कवनो चोरी कइले बानी कि जेल जाइब. जे लेले होखे ओकरा से माँगी. हम लेलहीं नइखीं त देब कहाँ से?”

“नइखऽ ले ले?”

“ना सरकार, रउवा माई बाप हईं. न्याय करीं. गऊ ना हते के.”

“ढेर फटर फटर मत कर. जे पूछात बा से कह.”

“पूछीं.”

“तू रुपिया ना ले ले रह?”

” ना सरकार. कबो ना.”

“सबूत?”

“हम कबो मेमरो नइखीं बनल. करजा मेमरे के दिआला कि दोसरो के?” सब लइका हँस देत बाड़न स. मेहरारु मुँह पर लुगा धर लेत बाड़ी स. सयान लोग हँस के लजा जात बा.

“जा, कोआपरेटिव सुपरवाइजर के बोला लाव त.”

ऊ लाठी उठा के, ले के, चल जात बा. फेर लवटि आवत वा, ओकरा साथे जवन सुपरवाइजर गोड़इत का साथे गइल रहन तवन आवत बाड़न.

“ई मेमर बाड़न कि ना?”

“बाड़न.”

“तू बनवले रहऽ?”

“हमरा पहिले से बाड़न.”

“कब के कर्जा ह?”

“तीन साल पहिले के.”

“तोहरे देहल ह नू?”

“जी.”

“कर्जा त पहचान बनवा के देहल जाला?”

“जी.”

“कागज ले आवऽ त. देखीं.”

सुपरवाइजर के बगल से आ के मंत्री बही देखावत बाड़न. बिडिओ उलट पुलट के देखत बाड़न. बूढ़वा झूठ नइखे कहत, उनकरो भीतर से आवाज आवत बा बाकिर भितरे भीतर अइंठ के रह जात बाड़न. कुछ कह नइखन पावत.

“इनकर हई पहचान के बनवले बा?”

बेंच पर बइठल एगो आदमी का तरफ इशारा करत सुपरवाइजर कहले, “मास्टर साहब. मास्टर साहब एही दुआर पर रहेलन. घर भर के लइकन के पढ़ावेलन आ बदला में चाय नास्ता आ खाना पर हाथ फेरेलन.”

“के, मास्टर साहब?”

“जी.”

“हँ जी?”

“जी.”

“तब काहे कहत बाड़न कि नइखीं लेले?”

“सरकार कहात बा कि जमाना बदल गइल. जमाना ना बदलल, आदमी बदल गइल बा. आदमी खरहो के बात खातिर झूठ बोले खातिर तइयार हो जात बा. साफ उलट जात बा. एही से देखलीं, आदमी के हाईनोटो पर रुपया नइखे मिलत. बिना बय के दसो पाँच नइखे मिलत. एही से बूझीं कि राउर रुपया मिले में ई हाल हो रहल बा, तब हमा सुमां के कइसे मिली?”

“मास्टर साहब, साँच कहत बानी कि हम रुपया ले ले रहीं?”

“हमरा तीन बरस पहिले के बात इयाद नइखे, बाकिर तूं ना लेले रहित त तोहार नाँव काहे रहित?” मास्टर साहब जानत रहलन कि ऊ पहचान नइखन बनवले. तीन बरस पहिले के बात ह. एक दिन मंत्री कहत रहन, “तोहरे से पहचानन करा देले बानी. बिना पहचान के ना देबे के रहे, केकरा के खोजे जइतीं?”

“जाँच होई तब?”

“के करी? का जानत बानीं कि हमही एगो बानी. सगरो इहे हाल बा. सरकार कतना जज बहाल करी? बिडिओ सुपरवाइजर के त देखले बानी, हमरा से बाहर जइहें?”

मंत्री ठठा के राक्षसी हँसी हँसल रहन आ मास्टर चुप हो गइल रहन. बाद में कई बार एह पर सोचले रहन आ तय कइले रहन कि चुपे रहला में इज्जत बा.

“देखीं मास्टर साहब! भगवानो से डरे के चाहीं. रामजी रउओ के बंश दिहले बाड़न. गरीब के हाय…”

मास्टर के पैर के नीचे से निर्णय के जमीन घसकत बुझाइल. उनकरा अन्दर के आदमी उनकरा के आदमी के बगल में खाड़ा होखे खातिर पंखुरिआवे लागल. ऊ कुछ बोले बोले कइले तबले बिडिओ गरजले,”हवलदार, इनकरा के गाड़ी में बइठावल जाय. ढेर नाटक भइल. लाल घर के मच्छर काटी तब सब याद पड़े लागी. लात के देबता बात से ना बुझस”

मास्टर कांपे लगलन बाकिर हवलदार के बुढ़वा का तरफ बढ़त देखलन त जान में जान आइल.

“जरा से हमरा के पूछ लेवे दीं.” कहत मंत्री बुढ़वा के तरफ बढ़ले. ओकरा के कुछ दूर ले जा के कहले, “अपना लइका के काल्ह से स्कूल छोड़वा के हमरा घरे भेज दीहऽ. बिडिओ के एगो नौकर चाहीं. ओकरे के रखवा देब. ठीक से रही त बाद में सरकारी नौकरो हो जाई. पढ़ लिख के जज ना होई. जा ढेर भइल.”

“बाकिर….”

“अब आकिर बाकिर छोड़ऽ.मंत्री भइया ठीक कहत बाड़न. खाली अपने जिद्द ना करे के.” एक दू आदमी जुट आइल आ बुढ़वा के बोलहू ना देहल. ओकरा के हटा के ले गइल.

“चलीं. कहत बाड़े, अब दे देब. कहत नू रहीं कि रउवा एक दिन खातिर चलीं. बाकी हम ठीक कर लेब.”

लोग जीप में बइठल. जइसे धूर उड़ावत जीप आइल रहे, चल गइल. बगल में जात बुढ़वा धूर से तोपा गइल. आँख, नाक, मुँह सब धूर से सना गइल……


ई कहानी साल १९८० के लिखल हऽ.


चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह “आरोही”
नोनार, पीरो, भोजपुर – 802 207

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