रचना त्रिपाठी
  • रचना त्रिपाठी

अपना भतीजी वृंदा के शादी में सितली फुआ अपना गवना के पैंतीस-चालीस बरीस बाद पहिला बेर नइहर आवत रही. एह बीचे ऊ बहू-बेटी, नाती-नतकुर वाली हो गइल रहुवी. नइहर से सैकड़न मील दूर उनुकर ससुरार रहुवे. ओह घरी आवे-जाए के साधनो कम रहल आ सामर्थो ना रहुवे. एह चलते तबसे अबतक ऊ नइहर ना आ सकल रहुवी. आ अइबो करती त कइसे भला? बाबा अपनही मे ताधड़ाम रहलन. जब ऊ एगो बेटी के बिआहत रहलें तवने घरी माई दोसरकी के जन्म देत रहल रहती. ई सिलसिला खतमे ने होत रहुवे.

अलबत्ता उनुका लगे जबे कबो थोड़ बहुत व्यवस्था हो जाव त बेटियन का घरे कहांर से भार भेजवा दीहल करसु. भार में राखल खाए के सामान जइसे कि दही, चिउड़ा, कटहल, केला, कसार अउऱ बहतर वगैरह के ओहिजा ले चहुँपहूं में कई दिन लाग जाव. सितली फुआ के नइहर-सासुर के आर्थिक स्थिति ‘जो गति तोरी सो गति मोरी’ जइसने रहल. दुनु एक दोसरा के मरम निकहा से जानत-बूझत रहलें. एही से ना त बाबा के कबहूं अपना बेटी के कबो ना बोला पवला के मलाल रहल आ ना ही सीतली फुआ के उनुका से एकर कवनो शिकायत रहल.

समय बीतत गइल आ अब उनुका बहू-बेटन के जमाना आ गइल रहुवे. अबकी नेवता आइल त ऊ लोग माई के नइहर भेजे में तनिको आना-कानी ना कइल. वइसहूं एह नेवता में ओह लोग के टेंट से कुछ लागे के ना रहल आ अब माई के कामे का रहुवे ओहिजा जे मनो करीत.

बड़ दिन बाद शीतला देवी नइहर चलल रही त उनुकरो शौक कुछ बेसिए चर्राइल रहल आ जोशो भरपूर रहुवे. आजु सितली फुआ पाई-पाई जोड़के बरीसन से बटोरल अपना चोरिका के पूरा गठरी खोल लिहली. अपना छोटकी भउजी के तेजी के बखान ऊ कई लोगन से सुन चुकल रहुवी. नेवता हकारी के लेन-देन में उनुका गणित का आगा आजु ले केहू टिकल ना रहुवे. भउजी शहर के पढ़ल-लिखल रहली. घर में सभे उनुकर लोहा माने. एह से सितलिओ फुआ अपना ओर से शादी के तइयारी में भरसक कवनो कसर ना छोड़ले रहुवी. ऊ जानत रहली कि भउजी के हिसाब बहुते पक्का होला. ऊ अपना आस-पड़ोस से लगवले नात-रिश्तेदार ले नेवता-हकारी में के, कब, केकरा के, का का लिहल-दिहल ओकरा बाकायदा एगो डायरी बना के रखले रही. उनुका बारे में सभे माने कि ऊ फटक के देली त लेबहूं मे फटक के ले लेली. एहू चलते सितली बुआ अपना औकात से अधिके के तइयारी कइले रही.

रेलगाड़ी से छत्तीस घंटा के लमहर यात्रा में उनुकर हजार से अधिका रुपिया तो किराये-भाड़ा में खरच हो गइल. अपना भतीजी खातिर नेवता के साड़ी-साया-ब्लाउज के सेट अउर ओह पर चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आ एक जोड़ी बिछियो रख लिहले रही. अपना लमहर गैर-मौजूदगी का दौरान आईल नया-नवेली बाकिर अब बाल-बच्चेदार हो चुकल दुलहिननो ला मुंह-दिखाई देबे खातिर कुछ ना कुछ खरीद के रख लिहले रहुवी. अबले जतना चोरावल-लुकावल अपना लगे जुटवले रहुवी ऊ सभ कुछ एह नइहर के नेवता पर न्यौछावर कर दिहले रहुवी. बहुते मुश्किल से त एहिजा आवे के उनुकर संयोग बन पवले रहुवे. आखिर लमहर इंतजार खतम भइल आ ऊ रिक्शा से उतर के नइहर के दुआरे खाड़ रहली. दुआर पर नजर टिकल त उनुका अपना पुरनका नइहर जइसन कुछऊ नी लउकत रहे. पूरा नजारे बदल गइल रहे. ना त ऊ छान्ह वाला पुरानका घर रहल नी चचरा आ ना ही दुआर पर बान्हल गाय-गोरू. सब अलोप. उनुका लागल कि कहीं ऊ भटक के कवनो अउर गांव में आ गइल बाड़ी. लेकिन दुआर पर खड़ा बूढ़वा पीपल उनुका के भरोसा दिआवत रहे कि ई उनुका बबे का गाँव ह.

दरवाजा पर पहुँचते सामने बरामदा में चउकी पर बइठल बाबा का ठेहुना पकड़ि के चिघ्घाड़ मार के रोवे लगली. एह तरह से रोवला के आवाज चौखठ का भीतर गइल त सभका समुझते देर ना लागल कि सितली फुआ आ गइल बाड़ी. घर के लड़िका मरद बहरी आ गइलें आ मेहरारू सभ केवाड़ का पाछा दोगहा में जमा होके उनुकर करुण- क्रंदन देखे सुने लगली. जब ई विलाप लमहर खिंचाए लागल त वृंदा अपना महतारी से बुदबुदात बोललसि, “कहऽ ना फुआ के कि बहुत हो गइल. अब चुप हो जासु… ई सभ नाटक हमरा से ना होखी, माई.. बता देत बानी…!” दूर खड़ा शादी में आइल रिश्तेदारन के छोट-छोट बच्चा सोच में पड़ गइले सँ. लागत बा कि बूढ़ी फुआ जी के रास्ता में पुलिस मारले बिया एही से अतना पुकार फाड़ के रोवत बाड़ी. ओहनी के का मालूम कि ओह जमाना में लड़कियन के अपना ससुराल से मायके अइला-गइला बेरा घर के पुरुषन के गोड़ आ मेहरारुवन के अँकवार ध के रोवे कि रिवाज रहल. एहिसे सितला फुआ के एह रिवाज के निर्वाह करत देखि वृंदा के नाक-भौं चढ़ गइल रहे. ओहिजा से विदा होखे के अब त ओकरे बारी जे रहुवे.

एह एकतरफा विलाप में फुआ के आँखिन से जतना लोर बहल रहे ओतने ओहपर वृंदा के मन व्यथित भइल रहुवे. ओकरा त रोवे के कवनो अभ्यासे ना रहल आ ओहिजा शादी में आये रिश्तेदारन में काका, मामा आ भइया लोगन के तादादो बेसी रहुवे. आ एह चुनौती से निपटे के बारे में सोचते रहल कि बाबा के चउकी से चिपकल खाड़ नटखट निक्कू टुन्न से बोलल, “तुहूँ सीख ले, दीदीया… विदाई के वक्त कइसे रोवल जाला… सुनले बानी कि जवन लड़की अपना विदाई पर जतने जोर-जोर से चिल्लाके रोवेले ओकर नइहर प्रेम ओतने अधिका गहीर होला.” वृंदा परेशान हो गइल. लेकिन ओहिजा का कर सकत रहुवे बेचारी, अपना महतारी के घूरे आ झन्न-पट्ट कइला का अलावा.

बाबा के याददाश्त आ नजर दुनु कमजोर हो गइल रहल. उनुकर हाथो-गोड़ बेदम झूलत रहल. उनुका बूढ़ टांगव पर फुआ के मोट, थुल-थुल काया के भार बरदाश्त का बाहर होखत रहुवे. जब ऊ मन भर रो लिहली त बाबा बोलले– “कउन ह रे?”

फुआ के आंखिम पर एगो मोटा चश्मा चढ़ चुकल रहुवे, लेकिन अकिल पर अबहीं ना. ऊ तुरते भाँप लिहली कि बाबा अब सठिया गइल बाड़न. सट्ट से चुप हो गइली. बोलली, ” हम, बाबा… सीतली… चीन्हत ना हउव?”

सुनले रहीं कि अपना विदाई का बेरा फुआ जब डोली में चढ़त रहली तबहिंय एही तरह ख़ूब टेहक्का कढ़ा-कढ़ा के रोवले रहली. पक्का ओह जमाना के दोसरा ब्याहता लड़कियन का मुकाबले सितली फुआ के नइहर-प्रेम के आंकड़ा सबले अव्वल रहल होखी.

रोवल-धोवल पूरा भइल त फुआ आपन पेटी खोलली आ सभका के उपहार बांट दिहली. ऊ जवन साड़ी वृंदा खातिर ले आइल रही ऊ छोटकी भउजी के फूटलो आँखे ना सुहाइल. ओकरा के देखा-देखा के ऊ घर में आइल सगरी मेहमानन का सोझा आँख मटका-मटका के इशारा से ई बतवले जात रही कि सितली फुआ वृंदा ला इहे तीन सौ रुपिया के साड़ी ले आइल बाड़ी. जवना ‘साध’ से सितली फुआ ई नेग-नेवचार कइले रहुवी ओकर उसकी धज्जी उड़त रहल. भउजी फेरु वृंदा का लगे जा के ओकरा के साड़ी देखावत बोलली– “जिज्जी के अतने ला ओहिजा से एहिजा ले आवे के अतना कष्ट उठवला के का जरूरत रहल…? नाउने के पहिरे लायक त ई साड़ी नइखे… एहसे त नीक रहीत कि ओहिजा से नेवता क एगो लिफफे भेज देती… हमरा कवनो कामे त आइत… “जेतना के कनिया ना ओतना कहांरी”.

संझा-पराती के बेरा हो गइल रहुवे. गीत गावत मेहरारुवन का समूह में चकरा के बइठल सितली फुआ के कानो ले ई बात पहुँचिए गइल. ई सुनि के ऊ सन्न रह गइली. उनुकु कलेजा मुंहे आवे लागल. कतना अरमान पोसले रहुवी एह दिन ला ! एहिजा एक-एक पल बितावल अब उनुका ला पहाड़ हो गइल रहुवे. पूरी शादी भर छुपा-छुपा के रोवत रह गइल रही.

शादी का अगिला दिने जब वृंदा के विदाई होत रहुवे त भउजी ओकरा सहेलियन के समुझावत रहली कि – “देखीहऽ सँ. केहू एकरा से लिपट-चिपट के ना रोवे. ना त एकर सगरी मेकअप खराब हो जाई.” ओने सितली फुआ के आँखे बढ़ियाईल जात रहुवे. लोर थथमे के नामे ना लेत रहुवे. चश्मा उठा-उठाके ओकरा के अपना हथेलियन से बेर-बेर कछले जात रहुवी. ओने वृंदा के सपनन के डोली उठल आ एने सितली फुआ के बरिसन के सजोवल अरमानन के जनाजा. अपनी हिया के पीर ऊ कहबो केकरा से करती?

( सरोकारनामा पर प्रकाशित कहानी संग्रह से. सगरी अधिकार लेखिका आ प्रकाशक का लगे. अनुवाद अनुमति ले के प्रकाशित.)

By Editor

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