Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

दूबि से निकहन चउँरल जगत वाला एगो इनार रहे छोटक राय का दुआर पर. ओकरा पुरुब, थोरिके दूर पर एगो घन बँसवारि रहे. तनिके दक्खिन एगो नीबि के छोट फेंड़ रहे. ओही जा ऊखि पेरे वाला कल रहे आ दू गो बड़-बड़ चूल्हि. दुनों पर करहा चढ़ल रहे. एगो में रस खउलत रहे, दुसरका में सिमसिमात रहे.

रस फफाइल देखि के चनरी पतई झोंकल कम क देले रहे. ओकर नौ बरिस के लरिका भिखरिया इनारा का जगत पर बइठि के लबाही चूसत रहे. चनरी के लइकी अपना बाप बटेसरा का पाछा पतई सरकावत रहे. चनरी अपना कराह में खउलत रस के तजबिजलस, फेर बोलल, “का हो बरधमहिया ना मराई?” बटेसरा टीन आ छनौटा ले के, करहा का किनारा खाड़ हो गइल. चार पाँच हाली छनौटा खउलत रस पर छलकवलस आ रस का किनारा फेंकत मइल महिया मारे लागल.

टीन पर छनौटा ओठँगाइ के ऊ ताबरतोर खइनी ठोंकलस आ ओठे दाबि के फेरु पतई झोंके लागल. ओकरा कराह के रस अब सोंसियात रहे. आजु फजिरही से ऊ मरद मेहरारू ऊखि काटे, छीले, ढोवे आ पेरे में लागल बाड़न स. दुपहर में त घुघूरी-रस पर काम चलि गउवे, बाकि गते-गते पेट कुल्हुरे लगुवे.

– “का रे, अभी महिया ना आइल?” छोटक राय के चिल्हिकल सुनते सबितरी धीरे से हुनकल, “ए बाबू हमहूँ महिया लेब!”
बटेसरा ओकरा के अनसुन क के चनरी का ओरि तकुवे.
– “जो रे भिखरिया! मलिकार के घर ले बल्टी माँग लियाउ.” चनरी टुभुकुवे.
बाँचल खुचल लबाही बीगि के भिखरिया ओसारा का ओरि दउर गउवे.
– “ए माई सुपेली लियाईं? हमहूँ महिया खाइब!” सबितरी माई का पाछा आ के हुनुकुवे.
– “चुप मटिलगवनी! पिटइबे? पहिले मालिक के घरे जाई. जो तवले बँसवारी में से सुपेली ओकाच लियाउ.” चनरी लइकी का चेहरा के उतार-चढ़ाव नापत बोलुवे. तबले भिखरिया बटेसरा का पाछा बल्टी ध के बहिन का पाछा सुपेली ओकाचे बँसवारि का ओर भगुवे.

“हरे रसारी तोरी… आके पतई झोंकु, पाग उतर जाई. ओनिया का अपना अठराजी किहाँ जात बाड़े?” कहि के बटेसरा बल्टी लेके चनरी का कराह में से महिया फरियावे लगुवे.

“तनी सबितरी के पतइया पर दे दिहऽ.” चनरी के गिड़गिड़ाइल बटेसरा जइसे सुनबे ना कइलस. मुड़ियो ले घुमा के ना तकलस.

“कइसन कठ करेज हउवऽ हो तू? लइकी दुपहरिये से संगे सती भइल बिया आ तोहरा इचिको मोह माया नइखे?” बटेसरा छनौटा टीन पर धइलस आ बल्टी ले के मलिकार के घरे चल दिहलस. चनरी खीसिन गुड़ेरत रहि गइल. भिखरिया चोर आँखी देखत आ सुनत रहे. ऊ चूल्हि झोंकल छोड़ि के उठल आ छनौटा से खउलत सीरा उठा के सबितरी का सुपेली में चुआ दिहलस.

“भाग मरकिलौना! तोर दुश्मन बाप आवते होई!” चनरी पाछा ताकत ओके धिरवलस. भिखरिया फेरू जा के चूल्हि झोंके लागल.

“हरे भिखरिया! सुन हेने!” छोटक राय के आवाज सुनते चनरी के छाती धड़के लागल, आ सुरसतिया के महिया लागल अँगुरी मुँह ले जा के रूकि गइल. भिखरिया रोआँ गिरवले उठल आ ओसारा का ओर चल देहलस.
“का रे स्सारे, चुल्हिया से काहे उठले हा रे?” बटेसरा बोलल.
“अरे बेहूदा, जो तें आपन काम करु, एके हम बोलवनी हँ.” ओ के डाँटत छोटक राय ओकरा लइका भिखरिया से बोललें, “घरे जा के चाह बनावे के कहि आउ. बबुआ आइल होइहें त उनहूँ के बोला लिहे. आ सुन, तेहूँ अपना के रोटी वोटी माँग लिहे. जो!”

भिखरिया जब मूड़ी हिला के घर का ओरी चलल त कनखी से ताकत चनरी के जीउ परल. ऊ सोचे लागल हाय रे अभाग, अब रात ले गूर बनी तबले सबितरी सूते लागी. कब घरे जाइब आ खायेक पकाइब? एकर बाप राती खा गोहूँ में पानी बरावे जाई आ हम अन्हारे बगइचा का मड़ई में. कई दिन से इहे होत आवत बा.

भिखरिया लवटि आइल. “आउ रे सबितरी, ले रोटी खो!” सबितरी सुपेली छोड़ के हहास बन्हले दवरल.

“जा हो हमार बाछी, तहरो करम जरल रहे जे मुसहर का घरे जनमलू.” चनरी बुदबुदाइल.
“का रे कुछ कहले हा?” बटेसरा पूछलस.
“कुछु ना! गुर बनवात ढेर रात हो जाई. कब घरे जाइब आ कब खयका पकाइब?”
“तोरी अठराजी मुआँ, हऊ देखत नइखी दूनो रोटी खा के पानी पियत बाड़न सऽ. हम एहरे खा-पी के टीबुल पर चल जाइब.”
“हँ हँ अउर केहू थोरे बा?” चनरी रोआइन मुँह क लिहलस.

दू घंटा रात बितला का बाद चनरी लरिकन के लिहले घरे चोंहपलि. मड़ई के चाँचर में लटकल ताला में, अँचरा के खूंटी गँठियावल चाभी घुसारत खा दिक बरत रहे. ताला खोलत भुसुराइल, “कूल्हि मर बिला गइल बाड़न स. देखऽ ना कइसन सुत्ता परि गइल? बाह रे देवरानी? एकर भतार मलिकार के दुलरुआ ह, कुछऊ बोलब त एही बेरा डाँक डाँक चिचियाए सुरु करी. ऊ अन्हारे टोइ के दिया बरलस आ फुफुती में खोंसल गूर के पीड़िया मेंटा में डलला का बाद बसहटा बहरा घींचि लियाइल. सुरसतिया निखहरे ढहि गइल त ऊ भीखरिया के धसोरलस, “हरे मलैछवा, तूँ लेउवो ना बिछा सकेले. हमार रोवाइन परान हो गइल बा तोहनी से.”

भिखरिया एगो फटही कथरी के बसखट का ओरचना डललस आ मुँहकुरिए ढहि गइल. थाकल माँदल चनरी के खायेक पकावे के बेलकुल मन ना करत रहे, बाकिर होत फजिरहीं लरिका खायेक माँगल सुरु करिहन स. ईहे सोचि के उठल आ थरिया में दू पँहत आटा निकार के, ताबरतोर सनलस. फेरू तावा सिऊँठा लेले बहरा निकरि आइल. फेंड़ का जरी चारि गो धुवाँइल ईंटा रहे. चनरी ओके सरिया के चूल्हि बनवलस आ ऊखि के खोइया जरा के तावा चढ़ा देहलस.

आटा के बड़-बड़ लोइया काटत आ तरहत्थी पर पीटत खा ऊ भुसुरात रहे, “ई हरजाई सिलिया चाहित त हमरा लरिकन के दू गो रोटी ना पकाइत. हम जिनिगी भर एकरा मरद के गूह कछनी, पोसनी-पलनी आ अब ई भतार वाली भइल बिया. ऊहो मरकिलौना एक्को बेरि जो भउजी भा भइया के पूछित. कब दो आई आ आड़हीं लीलि-ठेंसि के पसरि जाई.”

….. चार पाँच बरिस पहिले जब ऊ खेदन राय का बगइचा से खेदात रहलन स त महँगुआ सँगही रहे. राय साहब आ उनकर लइका जब लाठी गोजी ले के ओकर छान्ह उजारे लागल त
भिखरिया का बाप का संगे इहो रम्मा ले के खड़ा हो गइल. ओह घरी बटेसर छोटक राय किहाँ नोकरी ना करत रहे. भइँस आ पाड़ी रखाव आ सूखल लकड़ि के तूरि के दूनों भाई कस्बा में बेचे. कबो-कबो चइली फारल आ छोट मोट मजूरी क के जब दू-चार रुपिया घर में आवे त बुझाव कि नियामत आ गइल बा. बाकि हाय रे करम! ए हरजाई का आवते महँगुआ के का जाने का हो गइल….?”

चनरी मोट-मोट हथरोटिया सेंकि के परई में धइलस आ चूल्हि बुता के सिउँठा से तावा उठवले मड़ई में चलि आइल. खायक खाँचि से तोपत खा ओकरा मन परल कि लरिका बहरे बाड़न स. ऊ हड़बड़ाइल बहरा निकसल. उन्हनी के देंहि सीति से सिमसिमा गइल रहे. दूनों के जगा के बाँहि धइले भितरी लियाइल आ पुअरा का चटाई पर ओठँगा दिहलस. भिखरिया के मुँह देखि माया जागल त जोर से झकझोरि के जगवलस, “ए बबुआ, हरे हई देख तोरा के का बनवले बानी? हई देखु जाउर आ सोहारी रे.”

भीखरिया निनियाइल आँखि उघरलस, चारु ओरि तकलस आ परई पर हथरोटिया गूर देखि के आँखि मून लेलस. चनरी भेली फोरि के रोटी पर फइलवलस आ चउँवा बना के ओकरा मुँह मे डाल देहलस, “ले रे बबुआ, लेड़ुंवा! काटु जोर से काटु!”

दू चार काटा बरियाई कटवला के बाद भिखरिया फेरू सूति गइल. बाँचल रोटी के चेउँवा काटत खा, चनरी के बटेसरा के खियाल आइल…. सभ सूतल होई आ ऊ बिहिटी लपेटले गोंहूँ मे पानी बरावत होई. का जाने कहिआ ले छोटक राय क करजा उतरी? भइंस बियाइल त उनहीं का दुआरे चलि गइल. जवन पइसा मिलल ओसे पाड़ी किना गइल. सौ पचास बंचबो कइल त दवा-वीरो में.. केहू तरे गूजर नइखे. राम जाने कइसे निस्तार होई?

आजु काहें दो चनरी के नीन नइखे आवत. भितरे-भितर मन दोचित बा. आपन गरीबी आ दलिदरपन पर ओकरा भित्तर सवाल पर सवाल उठि रहल बा! ईमानदारी के जिनिगी जीये का चलते लुटहाई आ लात-जूता, ओहु से आगाँ बढ़ल त जेहल. कूल्हि मुसहरने खातिर बा.

जेहल के मन परते, ओके आपन देवर महँगुआ फेरु याद परल. दू हाली ओकरा के पुलिस वाला घिसिरा के ले गइलन स. एक बेर त ऊ दस दिन जेहले में रहे. ओघरी ई हरजाई सिलिया रात होते छोटक राय का टिबुल पर निकल जाव आ भोर भइला पर आवे. राय साहब दू दिन पर साँझि खा पूछे आवसु, “कवनो बात नइखे नू रे? जवन घटी-बढ़ी आके घरे से ले जइहे. घबड़इला के जरूरत नइखे. हजार दू हजार जवन लागी हम बानी नू! महँगुवा के दू तीन दिन मे छोड़ा लियाइब.”

महँगुआ के काल्ह फेर पुलुस वाला पुछत रहुवन स. बहेंगवा दू दिन से नइखे लउकत. ओ बेरी पइसा का जोर पर छूटि गइल बाकि एबेरी धराई त ना छूटी. छोटक राय आ उनुका ओकील लइका के कवन ठेकान? बनला के सब संघतिया होला. उप्पर से पॉलिस वाला बात आ भितर से करिया बीखि. गरीबन के ढेर ददखाह बा लोग त चोरी चमारी काहें करावेला? दोसरा के खेत कटवाई, बैल खोलवाई त का होई? जेहल मुसहरे नू जाई. ऊपर से ई हरजाई ओही जा छिनरझप खेले खाई. भक्खर परऽसन, ओकरा से का मतलब?

…..बटेसरा का छाती पर ओह घरी जो ऊ सवार ना रहीत त उहो दोगलऊ जेहल जइतन आ पुलुस के लात जूता खइतन. देबी पांडे के बैल खोलला में इहो रहलन. बेटा के किरिया ना धरइतीं, जहर माहुर खाए के धमकी ना दीतीं त का जाने का होइत? दोसरका हाली कहीं जाए के नउबते ना आइल. छोटक राय डेरवावते रहि गइलन. हम साफ-साफ कहि दिहलीं मलिकार रउवा सरन देहलीं ठीक बा, रोआँ-रोँआ तूरि के राउर खेती बारी कटिया-बिनिया, गोबर-गोसार कूल्हि करब जा, बाकि ई काम ना होई हमनी से…”

एही बोलला पर राय साहब खिझिया के चल गइलन आ बटेसरा ओकर झोंटा घिसिरा के लाते-मूके खूब कचरलस, बाकि उहो अड़ि गइल रहे….., “चाहे भुजुड़ी-भुजुड़ी काटि द, बाकि हम तहरा के चोरी चकारी ना करे देब.” मन परते चनरी मुस्कियाए लागल, जइसे ओह दिन का बिदरोह पर ओकरा आजुओ गरब होखे. आ एगो देवरान सिलिया बिया. ओठलाली, साड़ी बेलाउज आ साबुन सोटा खातिर मरद के भक्सी झोंकवावेले. मरद ना रहेला त वकील बाबू से मुस्किया-मुस्किया अईंठेले.

बहरा कवनो मरद के खँखरला के आवाज सुनाइल. चनरी सजग होके उठल. दुआरि पर आवते बोली सुनाइल “ले धरु, एकदम ताजा ताड़ी हऽ. का बनवले बाड़े ए बेरा?”

– “मछरी आ रोटी!” ई आवाज ओकरा देवरान सिलिया के रहे.

… त ई हरजाई जगले रहलि हा. चनरी धप्प से बइठि गइल… आ ई डोमवा एह बेरा कहाँ से लबनी लेले आवऽता? काम-धाम कवनो हइये नइखे. छोटक राय के पोसुआ कुक्कुर भइल बा. भोगी मुँहझउसा!

थोरिके देर में देवरान के खिलखिलाइल आ नासा में दूनो के धसोरा-धसोरी सुरू हो गइल. चनरी कुड़बुड़ात उठल आ लड़िकन का लग्गे आ के ओठगि गइल.

अभी अन्हुन्हार रहे. हउँजार आ हाला सुनि के चनरी उठल. बहरा निकल के देखलस कि छोटक राय के खिलाफ पाटी वाला लोग महँगुआ के गारी-फजिहत करऽता. दूगो पुलिस वाला कान्हि पर बनूखि लेले ठाढ़ बाड़न स. महँगुआ भुइँयाँ ढहल बा, आ ओकरा मुह से खून चूवऽता.

खेदन राय, अवध चौधरी, रामसरन पाँड़े आ खेद‍न राय के दूनो लरिका लउर लेले खाड़ा रहलन स. खेदन राय लाते ठोकरियाई के महँगुआ से कहत रहलन, “का रे स्सारे? तोर अवकात अतना बढ़ गइल कि गाँव का बड़कनों के नइखे छोड़त? अब तोर गाँव छूटि जाई!”

अतने में सिलिया छोटक राय के लड़िका ओकील साहेब के लेले पहुँचि गइल! पाछा-पाछा बटेसरा आ छोटक राय के पाटी के चार पाँच अदिमी लउर लेले धावल पहुँचुवन स.

“का भइल बा? काहे मारत बाड़ऽजा? ढेर अन्हेरगर्दी जिन मचावऽ जा!” सुदर्शन बाबू सिलिकन के कुरुता क बाँहि चढ़ावत बोलुवन.

“ए वकील, ई तहरे पलिवार के देन ह कि हर महीना गाँव में कुछ न कुछ खुराफात होता.” खेदन राय के ना रहाइल.

-“एह चोर स्सारे के हमनी का अब एइजा ना रहे देब जा.” अवध चौधुरी लउर पटकलन.

-“ढेर जोर मत फाटो ए चउधरी! तहन लोग का छानह तर नइखे बसल. खेदन राय त पाँच बरिस पहिलहीं इन्हनी के उजार देहलन. उ त भला होखे बाबू के कि एह मुसहरन के निम्मन जिनिगी जिए के रस्ता देखवलन. हमनी का बारी में बाड़न स, हमार काम-धाम करत बाड़न स, त तोहन लोग के करेजा फाटऽता. ए सिपाही जी, रउवा दुअरा चलीं. बाबूजी का सोझा फैसला होई. तेँ का ढहल बाड़े रे महँगुआ? उठ तोर बेटी मुआं केहू का सेन्ह पर धराइल बाड़े? कि तोरा मड़ई में केहू के धनसुकिया चोरावल बा?” सुदर्शन बाबू एक सुरुकिए बहुत कुछ बोलि गउवन.

महँगुआ खून पोंछत उठ गउवे. ओकरा अगल-बगल सुदर्शन बाबू के अदिमी केदार चउधरी आ बलेसर चउधरी खाड़ हो गउवे लोग.

-“चलीं सभे, चलीं राय साहेब का दुआरे चलीं सभे. रउआ सभ रपोट कइए देले बानी. महँगुआ पर केस चलबे करी. ओइसे आपुसे में समुख बूझि के एही जा निपटारा हो जाव त कवन नोकसान बा?” एगो सिपाही बोलत आपन साइकिल घुम लेहलस. दुसरहो ओकरा पाछा चल देहलस.

-“आरे ओइजा का फैसला होई? उहे तकुल्हि करावत बाड़न.” खेदन राय के लइका गाभी बोलल.

-“अछरंग जिन लगावऽ. ढेर जरतपन ठीक ना ह ए बाबू!” ओकील सुदर्शन बाबु बोललें.

-“ठीक त ईहो नाहऽ जेवन तोहन लोग करत बाड़ऽ जा.”

-“होस में रहऽ!”

-‍”नाहीं त का क लेबऽ? ऊ दिन गइल जब तोहन लोग सभके डोलावऽ लोग.”

-“मना करऽ खेदन काका इनके नाहीं त…”

-“नाहीं त का लीलि घलब?”

-“हरे स्साला बटेसरा तोर बहिन मुओ, का ताकत बाड़े रे? मारऽ स स्सारन केलरक के.”

सुनते बटेसरा ठेंगा चला देलस. खेदन राय के लइका डगरा गइल. खेदन राय पाछा घुमसु तले एक लउर उनहूँ का पँखुरा पर गिरल. सिपाही कुछ समुझन स एकरा पहिलहीं रामसरन पाँड़े आ खेदन राय का छोटका लइका क लाठी सँगही बटेसरा पर गिरल आ उ फिरिंगी लेखा नाचि के दरहीं उलटि गइल. चनरी रोवत चिचियात धवरल तले दोसरहा लाठी महँगुआ के कान्हि पर परल.

“खबरदार! केहू हिलल त गोली मार देब जा!” सिपाहियन के बनूकि हाथ में आ गइल.

सबे थथमि गइल. घाही लोगन के गमछी बान्हि के उठावे लागल लो. दूनो पाटी के लोग तरनाइल रहे. देवी पांड़े डाँक-डाँक क के रेकसा बोलवले आ अपना पाटी का लोग के रेकसा पर चढ़ा के चल दिहल लोग. बटेसरा का मुड़तारी चनरी आ ओकर लड़िका फेंकरत रहुवन स.

“ए चउधरी, देखऽ हो मुवल कि जियल? हम जा तानी बाबूजी के खबर करे. अब त इन्हनी के बाई हेठ करहीं के परी.” आ सुदर्शन बाबू फलगरे आगा बढ़ि गइलन.

साड़ी फारि के बटेसरा का कपारे बान्हत चनरी चिचियात रहे, “अरे हमार रमऊ हो रमऊ! एही से कहत रहनी कि बड़कवन का बीचे जिन परऽ. महँगुआ तोहोर के ले बितल ए हमार रमऊए!” चउधरी ताबर तोर कई अँजुरी पानी बटेसरा का मुँहे छिरिकुवन त बटेसरा कहँरत आँखि खोलुवे, “मलिकार अइलन कि ना?ॐ आ फेर ओकर आँख बन हो गउवे. महँगुओ एकोर डगराइल रहुवे बाकि ऊ बेहोस ना रहुवे. सिलिया ओकरा चानी पर तेल चाँपत, सुसुकत रहुवे.

मोटरसाइकिल के आवाज सुनि के महँगुआ सिलिया से पुछुवे, “मलिकार हउवें का रे”?

“ए चउधरी, इन्हनी के लाद-पात के अस्पताले लियावऽ. हमनी का तबले थाना में जात बानी जा.” ई छोटक राय के दबंग आवाज के कमाल रहुवे कि दुनो सिपाही लोग चट्ट से सलाम करुवे.

“रउवाँ सभ के बहुत किरिपा बा हमनी पर. हम एके इयाद राखब.” सिपाहियन का ओरी ताकि के छोटक राय अतने बोलुवन आ मोटरसाइकिल चल देहुवे. पाछा से दूनो सिपहियो साइकिल बढ़ावत हुरपेटुवन स. “अरे ससुरा जल्दी चलऽ स!”

दूनो चउधरी लोग बटेसरा के टाँगि के रेकसा पर बइठउवे लोग. दोसरका ओरि से सिलिया का कान्ही हाथ धइले महँगुओ आके पवदान पर बइठि गउवे. चउधरी चनरी के हुरपेटुवन, “चलऽ स, जल्दी अस्पताल. एकर घाव बहुते गहिर बा, खून रुकते नइखे. राम जाने का होई?” आ चनरी पगलाइल रेकसा का पाछा धउरे लगुवे. ओकर दूनोलइको ओकरे सँगे फेंकरत धवरत रहुवन सऽ.


टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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2 Comments

  1. dr. saheb rahur kahani badi nik baa.
    hamra bad nik laagal.

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