बतकुच्चन – ३८


पिछला दिने एगो सम्मानित पाठक के टिप्पणी आइल रहे कि भोजपुरी में श के इस्तेमाल ना होला. उहाँ के भोजपुरी के बढ़िया जानकार हईं आ भोजपुरी पर लगातार शोध करे में लागल बानी. अब एह बात से त हमरो विरोध नइखे कि भोजपुरी में श भा ष के इस्तेमाल ना होखत रहे. भोजपुरी में संयुक्ताक्षरो के परंपरा नइखे रहल. इहाँ ले कि चिल्होर वाला ल्ह, अन्हार वाला न्ह जइसन संयुक्ताक्षर लउके वाला के भोजपुरी में स्वतंत्र वर्ण मान लिहल गइल बा. बाकिर अब ले अगर कुछ नइखे भइल त आगहु ना होखे के चाहीं, एहसे हम सहमत नइखीं. सोच लीं कि अगर भगवान शंकर के संकर बना दिहल जाव त कतना बेजाँय लागी ! अंगरेजी में तवर्ग के ध्वनि ना मिल पावे ओही तरह हर भाषा में कुछ ध्वनि के अभाव देखल जा सकेला. मराठी के ळ के उच्चारण दोसरा भाषा वाला खातिर कतना मुश्किल होला. भोजपुरी में कबो श भा ष के जरुरत ना पड़त रहे त ओकरा खातिर वर्ण ना बनल. बाकिर तब कैथी लिपि में लिखात रहुवे भोजपुरी आजु देवनागरी लिपि में लिखल जाले. एहसे श के इस्तेमाल मना कइल कवनो तरह से उचित ना रही. हम भोजपुरी के ना त विद्वान हईं ना व्याकरणाचार्य. जवन जायज लागेला, सही बुझाला तवना के इस्तेमाल कइल करेनी. आखिर सभे तरह तरह के विराम चिह्न के प्रयोग करते बा नू, जबकि संस्कृत आ ओहसे उपजल बाकी भाषा में इस्तेमाल होखत पूर्ण विराम का अलावा सगरी विराम चिह्न अंगरेजिए से आइल बा. भोजपुरी में देस लिखे वाला के गलत ना माने के चाहीं बाकिर अगर केहु देश लिखत बा त ओकरो के सही माने के चाहीं. अगर श के इस्तेमाल से बहुते विरोध होखे त वइसनका शब्द इस्तेमाल कइल जा सकेला जवना में श ना होखे. ना त साम आ शाम के फरक मेटा जाई. जरुरत बा कि एह बारे में लमहर बहस चलावल जाव जवना में भोजपुरी के बड़का विद्वान आ व्याकरणाचार्यो लोग शामिल होखे आ कवनो राय पर सहमत होखल जा सके. हमनी के हिन्दी आ भोजपुरी दुनु में काम करे के पड़ेला त अइसन कुछ ना कर सकीं कि हिन्दीओ गलत लिखाये लाग जाव. एहसे हमनी के नवहियनो पर गलत प्रभाव पड़ सकेला. ओह लोग के भाषा में विकृति आ सकेला. एहसे हमरा विचार से भोजपुरी के बहुते जटिल भा छँटुआ बनवला के जरुरत नइखे. आगे रउरा सभ के मरजी. रउरा आपन विचार एहिजा लिख सकीलें.

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3 Comments

  1. बतकुच्चन पर दो मान्यवर लोग के टिप्पणी भी मजेदार बा। आशा करतानी कि ई चर्चा आउर आगे जाई आउर हमनीं के जानकारी उपलब्ध कराई।
    -मणि

  2. ए बतकूच्चन पर हमार बतकूच्चन जल्दिए आई..कई बेर मन बनवनी हँ…ओरि त मिलल बा…पर सुरुवात कहां से करीं…इ हे नइखे बुझात…ए पर थोड़ा-बहुत लिखले से काम ना चली…एकरा खातिर हम लाइन बाँधि रहल बानी…अउर बहुत जल्दिए…देरो हो सकेला…बेरा-कुबेरा बात पर बात ले के आइबि..हमार कोसिस रही की हमरो बतकूच्चन तर्क पर आधारित होखो न कि खाली लउर लबेदई क के ओपीजी के डेरवावल….हा हा हा हा..वइसे अगर केहू हमरी दिल से पूछे त बतकूच्चन के मजे कुछ अउर बा…एकर इहो एगो कारन हो सकेला कि हमरा सब्दन से बहुत परेम ह.अउर शब्दन के त ब्रह्म के दरजा देहल गइल बा…..अउर बतकुच्चन पढ़ि के हमार जीउआ हरिहरा जाला….हम केतनो काम में रहेनी पर बतकूच्चन जरूर पढ़ेनी….कबो-कबो तो लागेला की हमहुँ ए बतकूच्चन में कूदि पड़ी पर ओकरा खातिर जरूरी बा की ओपी जी की तरे अनुभव अउर पठन।

    खैर आज की जबाना में त केहू बतकुच्चन क सकेला पर ओ बतकुच्चन में उ बाति ना रहेला अउर ओपर इ कहाउतियो लागू ना होला …..छमा करबि सबे इ कहाउट के साकारात्मक पछ देखीं नाकारात्मक नाहीं……लाठी के मारल भुला जाला पर बाती के ना….त इहाँ आइल बतकूच्चन एइसने बा की जे भी पढ़ि उ कबो भुलाई ना….धनवाद…पर एकर मतलब इ ना की हम अउर ना लिखबि…ए बतकूच्चन पर हमार बतकूच्चन जरूर आई।

  3. आदरनीय ओम जी, रउरा त हमरा के एकदम बड़के आदमी बना देम। हम भोजपुरी के एगो सामान्य प्रेमी हईं जेकरा घरे के भासा ईहे ह। भोजपुरी के जानकार होखे के त सवाले नइखे। ई त राउर बरप्पन बा कि हमरा के अइसन समझनी।

    मानकीकरन के समस्या भोजपुरी में त बड़ले बा, लगभग सब भासा में कम चाहे बेसी बड़ले बा। हम त ना पूर्न बिराम के जगे बिन्दु के पक्ष में बानी में ना कवनो जिद्द के पक्ष में कि हइहे सही बा। राउर ई बात एकदम सोचे-बिचारे लाएक बा कि ए सब मामला पर एगो लमहर बहस चला के एगो निस्कर्स तक पहुँचहीं के चाहीं। बिस्तार से जल्दिए ए मुद्दा पर आपन बात हम रखेम। हँ, अंग्रेजी के चिन्ह के बारे में जहाँ तक बात बा। कुछ अइसन जगहा बा जहाँ पाई के चिन्ह जरूरी बा। गजल, दोहा, चौपाई, सोरठा, छंद जिसन बहुत उदाहरब बा। आजो अवधी में संकर-शंकर चल रहल बा। पर्यायवाची के परम्परा छेत्रीय भासा में हिन्दी लेखा ना चलल। अंग्रेजी के बिराम चिन्ह के अंग्रेजिए के मानल एकदम सही नाहिओ हो सकेला काहेकि विराम चिन्ह अंग्रेजी में कहीं से आइलो हो सकेला। हँ, ई त बड़ले बा कि हमनी किहाँ अंग्रेजिए से आइल बा। अबहीं एतने।

    पिछिला बेरी के राउर बात पर्हनी ह। कुछ बात हम समझ सकताऽनी। तबहूँ काम चलत रहो। मेहनत आ काम त अपना हाथ में बा, बाकि के सोच के अबहीं कुछ करे के कौनो बिकल्प नइखे लौकत।

    सादर,
    चंदन

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