पिछला दिने एगो सम्मानित पाठक के टिप्पणी आइल रहे कि भोजपुरी में श के इस्तेमाल ना होला. उहाँ के भोजपुरी के बढ़िया जानकार हईं आ भोजपुरी पर लगातार शोध करे में लागल बानी. अब एह बात से त हमरो विरोध नइखे कि भोजपुरी में श भा ष के इस्तेमाल ना होखत रहे. भोजपुरी में संयुक्ताक्षरो के परंपरा नइखे रहल. इहाँ ले कि चिल्होर वाला ल्ह, अन्हार वाला न्ह जइसन संयुक्ताक्षर लउके वाला के भोजपुरी में स्वतंत्र वर्ण मान लिहल गइल बा. बाकिर अब ले अगर कुछ नइखे भइल त आगहु ना होखे के चाहीं, एहसे हम सहमत नइखीं. सोच लीं कि अगर भगवान शंकर के संकर बना दिहल जाव त कतना बेजाँय लागी ! अंगरेजी में तवर्ग के ध्वनि ना मिल पावे ओही तरह हर भाषा में कुछ ध्वनि के अभाव देखल जा सकेला. मराठी के ळ के उच्चारण दोसरा भाषा वाला खातिर कतना मुश्किल होला. भोजपुरी में कबो श भा ष के जरुरत ना पड़त रहे त ओकरा खातिर वर्ण ना बनल. बाकिर तब कैथी लिपि में लिखात रहुवे भोजपुरी आजु देवनागरी लिपि में लिखल जाले. एहसे श के इस्तेमाल मना कइल कवनो तरह से उचित ना रही. हम भोजपुरी के ना त विद्वान हईं ना व्याकरणाचार्य. जवन जायज लागेला, सही बुझाला तवना के इस्तेमाल कइल करेनी. आखिर सभे तरह तरह के विराम चिह्न के प्रयोग करते बा नू, जबकि संस्कृत आ ओहसे उपजल बाकी भाषा में इस्तेमाल होखत पूर्ण विराम का अलावा सगरी विराम चिह्न अंगरेजिए से आइल बा. भोजपुरी में देस लिखे वाला के गलत ना माने के चाहीं बाकिर अगर केहु देश लिखत बा त ओकरो के सही माने के चाहीं. अगर श के इस्तेमाल से बहुते विरोध होखे त वइसनका शब्द इस्तेमाल कइल जा सकेला जवना में श ना होखे. ना त साम आ शाम के फरक मेटा जाई. जरुरत बा कि एह बारे में लमहर बहस चलावल जाव जवना में भोजपुरी के बड़का विद्वान आ व्याकरणाचार्यो लोग शामिल होखे आ कवनो राय पर सहमत होखल जा सके. हमनी के हिन्दी आ भोजपुरी दुनु में काम करे के पड़ेला त अइसन कुछ ना कर सकीं कि हिन्दीओ गलत लिखाये लाग जाव. एहसे हमनी के नवहियनो पर गलत प्रभाव पड़ सकेला. ओह लोग के भाषा में विकृति आ सकेला. एहसे हमरा विचार से भोजपुरी के बहुते जटिल भा छँटुआ बनवला के जरुरत नइखे. आगे रउरा सभ के मरजी. रउरा आपन विचार एहिजा लिख सकीलें.

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