बनचरी (चउथी कड़ी)

Banachari-cover-final

– डा॰ अशोक द्विवेदी

एगो विशाल बटवृक्ष का नीचे पत्थर शिला खण्ड का टुकड़न से सजाइ के एगो चबूतरा बनावल रहे. वृक्ष का एकोर ओइसने पत्थर के चापट टुकड़न के सरियाइ के गोलाकार ऊँच देवाल लेखा बनावल रहे जवना का ऊपर से वटवृक्ष क डाढ़ि अपना पतइयन से छाँह कइले रहे. ओही के बन क बँसकठ फारल टाटी से आड़ कइल रहे. अइसन बुझात रहे कि ई विशाल वट वृक्ष के अगिला भाग सभा आ बइठक करे का कामे आवत होई. भीम आ उनका परिवार के हिडिमा संकेत करत बटवृक्ष का पछिला भाग का ओर ले गइल, पछिला भाग में दूर तक फइलल ऊँच खाल पहाड़ लउकत रहे. ओही में एक तरफ पहाड़ के तूड़ि के बढ़िया ढंग से तीन चार गो घर आ दलान लेखा बनावल रहे. बुझला ई क्षेत्र ओह आदिवासी समाज के राजा आ अधिपति के रहे. मंत्राी चांडक, कुछ रच्छकन के हिदायत देत वापस लौटलन त हिडिमा के संबोधित कइलन, ‘बेटी तूँ हमनी का जाति कुल क गौरव आ अभिमान बढ़वलू. महाबली वृकोदर के कवनो कष्ट ना होखे. हमनीं का काल्हु आचार्य जी का आवते इनकर राजतिलक आ तहरा बियाह क जलसा आ उत्सव मनावे के. हम इहाँ के व्यवस्था तोहरे पर छोड़त बानी, अभी हमके बहुत तइयारी करे के बा.’

हिडिमा बे बतवले बहुत कुछ समझि गइल. आचार्य जी आवे वाला बाड़न. मंत्राी चांडक एही बेरा भाई हिडिम्ब के अंतक्रिया कइला धइला आ आचार्य जी से राय-मसवरा कइला का बादे खाली होइहें. आचार्य जी के अइला का आभास मात्रा से ऊ पुलकित हो गइल रहे. आजु ओकरा पास जतना समझ, संस्कार आ ज्ञान बा कूल्हि आचार्ये जी के कृपा का बदौलत बा. ऊ छोटे पर से ओके बाप लेखा संरक्षन आ सिच्छा देले रहलन. अभी ऊ सोचते रहे कि ओकर प्रिय सखी, निरिमा हँसत लउकल. ऊ दउरि के ओके अपना अँकवारि में भर लिहलस. ओकरा पाछा ओकर भाई निम्बा आ कुन्दकी काकी रहे लोग.

‘आखिर सखि तोहके आपन मनजोग प्रिय मिलिये गइलन.’ निरिमा धीरे से बुदबुदाइल त हिडिमा का चेहरा प एगो फीका लाज भरल मुस्कान उभरल, ‘सखी निरिमा, इहाँ एह लोगन खातिर तोहन लोग के तुरन्त सूते बइठे आ जलपान आदि के इन्तजाम करे के बा.’ ऊ सामान्य होत, अकुताइल कहलस.

निरिमा अपना छोट भाई निम्बा के जल्दी जल्दी कुछ समझवलस आ कुन्ती के निहुरि के प्रणाम करत बोलल, ‘माई हमनी का बनवासी अनार्य हईं जा, कवनो भूल चूक के माफी माँगत सेवा क आज्ञा चाहत बानी.’

कुन्ती जल आ शयन क व्यवस्था करे के कहली. फिर जेने हिडिमा गइल रहे, ओनिये चलि दिहली. कुटी का बहरा फेड़ का पीछे एगो शिला के टेक लेके हिडिमा अकास का ओरि तिकवत रहे. कुन्ती धीरे से ओकरा पाछा जाके खड़ा हो गइली. फिर ओके सुसुकत देखि के ओकरा कान्ह पर हाथ धरत कहली, ‘बेटी! जवन बीतल, ओकर सोक जिन करऽ! तोहार भाई क्रूर कर्म वाला निरदई राजा रहल हा… ऊ तोहरा कुल आ समाजो खातिर दुखदाई रहल. कुछऊ रहे, तोहार भाइये रहे, ओकरा मृत्यु पर तहरा दुख के हम समझत बानी.’
– ‘ए खातिर दुखी नइखीं माई… असल में बचपन से हमार महतारी-बाप ना रहल. काकी पालन-पोसन कइली. आचार्य जी बाप नियर राह देखवलन. महतारी का प्रेम के असली अनुभव आ परतीति त आप सबके कारन भइल हा… बाकि अभागी हिडिमा के ईहो सुख स्थाई नइखे.’ हिडिमा के आँखि फेरू छलछला उठल.

निसबद राति में, ओह बेरा कुन्ती का अलावा ओइजा अउर केहू रहे त सामने पहाड़ के ऊँच खाल दूर ले फइलल चट्टान आ ऊपर अकास में अनगिनत टिमटिमात जोन्ही. माई बाप बिहीन टूअर लइकी के बिकल आर्त भाव पर कुन्ती के मन भरि आइल. सोचे लगली कि आखिर ए बेचारी क कवन दोस बा? आजु ई अपने कुल-कबीला में अकेल बिया. एकर केहू आपन नइखे. ऊ धीरे धीरे ओकरा माथ पर हाथ फेरे लगली. थोड़ी देर ले रोवला का बाद ऊ चुपाइल… ”माई आप सब हइवें काहें नइखीं रहत? हम अपना जीवन के हर तरह से सुधार के रउवे अनुसार रहब. आप सब के कवनो दुख तकलीफ ना होखे देब. हम हमेशा रउरा कुल के अनुगामी रहब.“
कुन्ती का ओठ पर एगो फीका मुसकान उभरल, ”अरे पगली, ई कइसे संभव बा? एगो आर्य राजकुल क लोग, जवन खुदे बीपत क मारल बा, जे अभी खुदे जीवन-समर आ समय दूनों से लड़ रहल बा, जेकरा जीवन-यात्रा के अभी कवनो ठेकान नइखे, इहाँ कइसे रुकि सकेला?“ ऊ उदास होके कहली.
– ‘माई हम जब रउरा बेटा पर आपन मन हार गइलीं तबे अपना देह आत्मा कूल्हि के समर्पन क दिहलीं. हमार राज, हमार बल, सामरथ बुद्धि आ विवेक अब रउरे परिवार खातिर समर्पित बा. रउरा हुकुम कइ के देखीं, हम रउरा खातिर आपन प्रानो न्यौछावर क देबि!’ हिडिमा के निष्कपट सहज भाव खुलि के बाहर आ गइल.
अनुभवी कुन्ती ओकरा माथ पर ओइसहीं हाथ फेरत नेह प्रगट कइली बाकि उनका ओह बेरा ई ना बुझाव कि हिडिमा के का कहि के तोख देसु. मुँह से बस अतने निकलल, ‘ना बेटी ई संभव नइखे, ई ना हो सके. ना ना ई कइसे हो सकेला?’ बुझाइल, जइसे ऊ खुद अपने से सवाल करत होखसु. उनकर आँखि दूर कहीं शून्य में जम गइल रहे. आखिर ऊहो त एगो औरत, एगो महतारिये रहली. हिडिमा के हृदय के हाल-बेहाल आ पीर के ऊ समझत रहली, बाकिर धर्म संकट में उजबुजात रहली. आर्यकुल का राजपुत्रा क बियाह राक्षस कुल में? कुल का मरजादा के बनल-बनावल देवाल तूरि देबे के हिम्मत उनका ना रहे. बीच के राहो ना सूझत रहे. जेठ बेटा जुधिष्ठिर अबहीं कुँवारे रहलन. भीम के बियाह कइ के ऊ इहाँ उनके छोड़ियो ना सकत रहली आ हिडिमा के सँग-सँग लेके चलियो ना सकत रहली. ‘ना बेटी ना, भीम से तोहार बियाह ना हो सके. ऊ अपना भाइयन के संग साथ ना छोड़िहें, ऊ जवना राजवंश के हउवन, ऊ अंत ले एह बियाह के अनुमति आ मान्यता ना दी, उल्टे जगहँसाई कइके जात बिरादरी आ बिरासत कूल्हि से हमन के बहरिया दी. अइसँहूँ हमहन का नियति क मारल एह दुरावस्था में बानी जा.’ कुन्ती मन के आँकुस देत करेजा पोढ़ क लिहली. एकरा बादो उनका भीतर भयानक अर्न्तजुद्ध छिड़ल रहे.
– ‘त का हम मान लीं कि एह अभागिन बेटी के प्रति राउर न्याय धर्म इहे बा? हमरा प्रेम के अपराध क एतना कठोर दंड? हमरा सँग सँग हमरा कुल कबीला आ समाज के एतना निर्दय सजाय? ना माई तूँ धर्मी आ न्यायी होइके अइसन कइसे कर सकेलू? एह आदिवासी राज्य के स्वामी आ राजा हमन का परंपरानुसार अब राउर बेटा भीमे बन सकेलन. औरत इहाँ तक कि हमहूँ ना बन सकीला. फेर हमरा कबीला के राजाबिहीन छोड़ के रउरा हमनी का समाज के परम्परा के बिधंस कइसे कर सकीले?’ हिडिमा तर्क देत अपना अधिकार खातिर फरियाद कइलस…
– ‘बेटी… सुनऽ…’
– ‘ना ना हम ना सुनब. एकोर त रउवा बेटी कहि के हमरा के अपनावत बानी आ बेटी के मरम बेधत ओके बेअपराधे के सजाय सुनावत बानी.’ हिडिमा उनकर बात काटत फेरू भावावेश में आ गइल.
– ‘सुनऽ त सही हिडिमा, हम तहरा प्रेम के नइखीं नकारत. एकर अधिकार पृथ्वी का हर जीव-जन्तु के बा… तोहरो के बा; बाकि हमरा समझ से प्रेम समर्पन आ बलिदान माँगेला. तोहरो एकरा खातिर बलिदान देबे के पड़ी. हमार शर्त अतने बा कि…’
– ‘हँ हँ बोलीं, हिडिमा हर शर्त मानी.’ प्रेम में पागल हिडिमा के नया उमेद आ खुशी से आँख फेरू छलछला उठल.
– ‘हमनी का भीम से तोहरा बियाह के एह शर्त पर अनुमति दे सकीले कि तहरा पूत जनमला तक, भा एक बरिस तक ले भीम इहाँ रहिहें, तूँ कबो आगा चलि के राजकुल का बियहुती मेहरारू लेखा, राजरानी के अधिकार ना मँगबू. हालांकि हम व्यक्तिगत एके तहरा साथ अन्याये कहब आ एही मजबूरी का कारन हम तहरा बियाह के अबले नकारत रहलीं बाकिर इहे एगो राह बा… बोलऽ मनबू?’ कुन्ती अपना भाव आवेग के भितरे जाँतत कहली.
हिडिमा कुन्ती क दूनों गोड़ छान लिहलस. प्रेम का आगि में कूदल, अन्तर्ज्वाला में जरत हिडिमा के जइसे थेघ मिलल. ओके अपना प्रेम आ प्रेमी का अलावा कुछ दूसर ना लउकल, खुसी का लोर से बढ़ियाइल ओकर नजर उठल त ओकरा मुँह से अतने बोल फूटल
– ‘हमके राउर कूल्हि अच्छर-अच्छर मंजूर बा.’
कुन्तियो का आँखि से लोर झरे सुरू हो गइल रहे. ऊ निहुरि के हिडिमा के दूनो कान्ह धइली आ उठा के अपना छाती से लगा लिहली. हिडिमा अबोध लइकी लेखा उनके अपना अँकवारि में बान्ह के रोवे लागल.

दोसरा दिने कबीला के सभा लागल. वृकोदर नाव से महाबली भीम आपन परिचय जब कबीला का मंत्राी आ पुरोहित के दिहलन त कुछ छिन खातिर हिडिमा फेरु अचंभित भइल. ऊँच शिला पर भीम ओही ढंग से बिराजमान भइलन, जइसे पहिले सरदार हिडिम बिराजमान होखे. फरक अतने रहे कि एह सभा में एगो नया रौनक आ उछाह रहे. राज के मंत्राी आ एगो बूढ़ आदिवासी पुरोहित भीम का शरीर पर जल छिरिक के सफेद कुन्द फूलन क माला पहिरवलस फेरू हिडिमा के माथ पर जल फूल छिरिक के माला पहिरावल गइल. अधिपति भीम गर्जना करत घोषना कइलन, ”राजपुरोहित, आ मंत्राी का सलाह से लिहल गइल निर्णय का अनुसार आज से सब लोग नहाइ-धोइ के साफ सुथरा रही. राजा आ जंगल के रहवइया खातिर जंगल के फल-फूल आ जीव जन्तु काफी बा. जंगली शिकार का अलावे केहू नरमांस ना खाई, जे अइसन करी ओके मृत्युदंड दियाई.“ चारू ओर से हाथ ऊपर उठाइ के जयघोष करत लोग आपन माथ नीचे नवावल.

एही बीच हिडिमा अपना दूगो साँवर सखियन संग बीच में आइ के खड़ा भइल. स्नान से दमकत नव परिधान में ओकर रूपवान चेहरा पर एगो नये गुलाबी आभा फइलल रहे. सुगंधित जंगली फूलन से गूँथल केश बेनी ओकरा सुघराई के दिव्यता प्रदान करते रहे, ”महाबली बृकोदर के जय! इहाँ बइठल माता कुन्ती के सादर परनाम, उचित-अनुचित के बिचार कइ के हमरा के न्याय मिले महराज !!“
– ‘बोलऽ बेटी हिडिमा, तोहार कवन फरियाद बा? इहाँ धर्म के रखवार हमार जेठ बेटा बाड़न, तहरा कुल के पुरोहित आ मंत्राी के बनावल तोहार अधिपति बाड़न, का तोहरा अबो न्याय पर विश्वास नइखे?’ माता कुन्ती बिच्चे में बोल परली.
– ‘बिश्वासे ना भरोसो बा कि इहाँ एगो नारी के आत्मसम्मान के रच्छा जरूर होई. हम महाबली से प्रेम कइले बानी आ हमार अनुराग इनका पर प्रबल बा. प्रेम पाप ना हऽ! ई जात पाँत कुल आ ऊँच नीच ना देखे. हम महाबली के आपन पति मान चुकल बानी, आजु अगर इहाँ, महाबली से हमार बियाह सकारल नइखे जात त हमार जियल व्यर्थ बा. अस्वीकार का अवस्था में हमके आपन प्रान तेयागे के अनुमति मिले!’ हिडिमा एकदम शान्त भाव से आपन फरियाद कहलस.
भीम अपना जगह पर विचलित भाव से खड़ा हो गइलन. सब अवाक् रहे. सभा में एकाएक सन्नाटा पसरि गइल. भीम का भाइयन का चेहरा पर हवाई उड़त रहे. कुन्ती जानत रहली कि आदिवासी समाज में हर युवती के आपन प्रेमी आ पति चुने के स्वतंत्रता आ स्वच्छन्दता होला. एह समाज का बीच तनिको देरी उचित ना होई. ऊ अपना जगह पर खड़ा होके जोर से बोलली, ‘हिडिमा ! हम तोहरा प्रेम का पवित्राता के पूरा सम्मान करत, महाबली बृकोदर से तोहरा बियाह के स्वीकृति देत बानी!’

हिडिमा धधाइ के कुन्ती का लगे गइल आ उनकर गोड़ छान लिहलस. ”सौभाग्यवती होखऽ!!“ छोहाइल कुन्ती असीस देत हिडिमा के कान्ह धइ के उठवली आ अपना छाती से लगा लिहली. हिडिमा उहाँ से सोझे जुधिष्ठिर का लगे पहुँचल. निहुरि के गोड़ छूवे लागल त ऊ पाछा घसकत आपन दूनों हाथ ऊपर उठाइ के मंगलकामना करत आसीस दिहलन, ”कल्यान होखे! तोहन लोग क दाम्पत्य जीवन सुफल होखे!!“ हिडिमा गद्गद रहे. ऊ मुस्कियात आ लजात धीरे-धीरे भीम के पाँव छूवे चलल त भीम के चिहुँकि के पीछे घुसुकत देखि उनकर तीनू छोट भाई हँसि दिहलन सऽ. सँकोच से गुलाबी भइल उनकर चेहरा देखे लायक रहे. ऊ बनावटी क्रोध में आँख तरेरत अपना भाइयन का ओर तकलन आ बड़का भाई लेखा, आपन दूनों हाथ उठा दिहलन, जइसे ऊहो कवनो आसीस देत होखसु.

फेरु हिडिमा आ भीम राजपुरोहित आ मंत्राी के प्रणाम कइल लोग. एही बिचे हिडिमा के आचार्य सभा में हाजिर भइलन. हिडिमा खुशी का आवेग में दउरत श्वेत केश वाला बृद्ध आचार्य जी के गोड़ छुवलस. ऊ नेह से ओकरा माथ पर हाथ फेरत कहलन,”हमके सुरूवे से एकर विश्वास रहल हिडिमा कि तूँ अच्छा-आ विशेष हऊ! तोहार चुनाव उत्तम आ यशस्वी बा! हम आज बहुत खुश बानीं!“ फेरू प्रणाम करत भीम का ओर प्रेम से देखत कहलन, ”आर्यपुत्रा से हम बहुत प्रसन्न बानी. उमेद बा आपका निर्देशन में अनार्य कहाये वाला एह समाज के बहुत हित होई.“

भीम ओह बृद्ध आचार्य का सुसभ्य बोली आ विनम्रता से बहुत प्रभावित भइलन. आर्यपुत्र का संबोधन प’ ऊ कुछ सशंकित जरूर भइल रहलन, बाकिर साथ-साथ चलत आचार्य धीरे-धीरे हस्तिनापुर के सन्दर्भ के उद्घाटित करत कहलन, ”हम ईहो जानत बानी कि आपके आर्य कहाये वाला समाजो में सब कुछ अच्छा नइखे… जइसे एह समाज में हिडिम नियर असामाजिक आ अमानवी सोच-ब्यवहार करे वाला लोग बा. उहवों साँच आ धर्म के दबावे आ खतम करे खातिर कुछ लोग राक्षसी सीमा पार क जाता… हमार कहे क मतलब बस अतने बा कि आप दूनों समाज के अच्छाई-बुराई से परिचित बानीं त निश्चित रूप से एह अनार्य कहाये वाला पहाड़ी बनवासी राज्य के कल्यान होई.“ भीम ओह बूढ़ आचार्य का जानकारी पर मने मन अचंभित रहलन.
– ‘आचार्य जी समारोह खातिर पूरूब ओर खुला मंडप तइयार बा. सब लोग आप सब के अधीरता से, इन्तजार करत बा! माता जी आ महाबली के भाई लोग आप लोगन के जोह रहल बा.’ खबर पहुँचावे वाला रच्छक झुक के आदर सहित बोलल त आचार्यजी हिडिमा आ भीम का साथे पूरूब तरफ हाली-हाली बढ़े लगलन.

सैकड़न आदिवासी नर नारियन के ओह उछाह भरल जलसा में पुरोहित, मंत्राी, रच्छकन का सँगे मुख द्वार पर आगा खड़ा अपना माता आ भाइयन के देखि के भीम का बहुत खुशी भइल. एकदम बीचो बीच खाली चौरस जगह पर, चारो कोना में खम्हा आ केरा के पतई बान्हि के खुला मण्डप बनावल गइल रहे ओह खम्हा में किसिम-किसिम क फूल पतइयन के माला नियर बान्हल रहे. एक तरफ खाली जगह छोड़ल रहे, ओकरा चारू ओर नवहा रच्छक मुस्तैदी से खड़ा रहलन स, ओही खाली लउकत जमीन का पछिला भाग में एगो बड़हन एकपलिया पलानी बनल रहे. ओकरा दुआरी पर कुछ युवतियन का साथ निरिमा खड़ा रहे. हिडिमा के देखते कूल्हि युवती निरिमा का सँगे दउरि के आ गइली स आ हिडिमा के लिया के चलि गइली सन. फेरू युवकन का सँगे निरिमा के छोट भाई निम्बा भीम के आदरपूर्वक लेके, दुसरा ओरि चल गइल. समारोह के दूनों ओर खड़ा नगरवासी हर्ष आ उछाह में जयघोष करे लगलन सऽ.

तनिके देरि बाद हिडिमा के नया वस्त्रा में सजा के लेके युवती बाहर आ गइली स. कण्ठ में मूँगा-मोती क दमकत माला आ हँसुली नियर बनावल फूलन के कण्ठहार. केश में गूँथल श्वेत सुगंधित फूलन क बान्हन. दूनों बाँह में गुलाबी फूलन क मोट बाजूबन्द. कमर में कउड़ी, आ हाथी दाँत क छोटी छोटी टुकड़न के गूँथि के नीला आ लाल रत्न से बनावल करधनी. कमर का निचला हिस्सा में घुटना तक, जतन से लपेटल मृगछाल… आ एह सजावट में सलोनी बहुअरि अस लाजवंती बनदेवी बनल हिडिमा. युवकन का सँगे आवत भीमो के बनवासी भेख में सजावल रहे. उनका माथ पर फूलन क मुकुट रहे, जवना में दूनों कान का ओर लटकत श्वेत फूलन क झालर रहे. कमर का निचला भाग में मृगचर्म वाला वस्त्र रतन जड़ल पेटी से कस के बान्हल रहे. उनका दूनों बाँहि आ चौड़ा छाती पर उज्जर रंग आ गेरूआ रंग क अजब-गजब चित्रकारी रहे. गर में मूँगा, मोती आ कउड़ियन क मोट माला आ दूनों भुजदंड में पीयर लाल फूलन क माला कसि के लपेटल गइल रहे.

बर आ बहू का रूप में जब प्रेमी युगल मण्डल में ले आवल गइल त बनवासियन क हर्ष भरल जयघोष से बन गँउँजि गइल. राजपुरोहित हिडिमा आ भीम पर जल आ फूल छिरिक के कुछ मंत्र बुदबुदइलन फेरू युवक युवतियन का ओरि घूमि के संकेत कइलन त बेरा, कमलिनी आ बन के फूलन के बनावल दू गो बड़ बड़ माला आ गइल. हिडिमा के सजल धजल सुघड़ सलोना रूप देखि के भीम का दीठि में अनुरागल भाव उमड़ि आइल, ओइसहीं हिडिमा का भीतर निगिचा खड़ा सजल धजल प्रियतम के देखि के प्रेमावेग बढ़ि गइल. आचार्य जी आ राजपुरोहित के मंगल कामना आ स्वस्तिवाचन सुनि के पाण्डव परिवार चमत्कृत रहे. कौतूहल में देखत भीमो के अइसन शुद्ध भाषा में गतिमान स्वस्तिवाचन सुनि के अचम्भा भइल. सबका आभास भइल कि ऊ लोग जेके जंगली, अनार्य, असभ्य आ असंस्कृत बूझत रहल, ऊ मिथ्या रहल.

जैमाल भइला का बाद हिडिमा आ भीम के एगो बड़ शंख में पहिलहीं से राखल मधुर पेय पियावल गइल. एकरा बाद एकबेर फेरू, बड़-बुजुर्गन क आसीस आ मंगल कामना का साथे बनवासियन के सामूहिक फूल-बरखा से भीम रोमांचित हो गइलन. ढोल, झाँझ, सिंघी आ नगारा बाजे लागल, त आदिवासी, जंगल में मंगल के सूचना देबे वाला नाच-गाना में मस्त हो गइलन सऽ. प्रफुल्लित पाण्डव परिवार ओ बेरा, बन में रहे वाला ओह सहज बनवासियन से अइसे मिल गइल, जइसे अलगा अलगा राह पकड़ि के बहे वाली नदियन के धारा एक में मिलि के एकरूप हो जाले.

महाभोज में किसिम किसिम के जंगली कन्द मूल फल का साथ साथ; विचित्र किसिम के पकावल व्यंजन एकोर पत्थल के बड़ बड़ पटिया पर सजावल रहे, त दुसरा ओर शिकार कइल वनचर पशु-पक्षी लाल लेप लगा के लकड़ी का आँच पर भूनि के राखल गइल रहे. विशेष बिधि से पकावल-बनावल मदिरा आ पेय अलगे चलत रहे. कुन्ती के मन में ओह मदमस्त उन्मादी नाच गाना में रमत ना रहे. ऊ जुधिष्ठिर से आपन बिकलता बतावते रहली, तब्बे अउरू भाई उनका लगे आ धमकलन.

ओह लोगन का ओह गुपचुप-बतकही आ हावभाव के समझत मंत्राी उत्तुंग तुरंते पहुँचि के निहोरा कइलस, ”माता रउरा सब खातिर, उहाँ एकोरा फल-फूल कन्द मूल के ब्यवस्था बा! रउरा सब का रुचि लायक त ना होई, बाकिर एह शुभ समय में, हम बनवासियन के जल्दी-जल्दी जवन समुझ में आइल, इन्तजाम कइले बानी जा! रउरा जलपान कइके कुटिया में विश्राम कर सकीले.“ मंत्राी के अनुनय भरल विनम्र ब्यवहार से कुन्ती के बहुत राहत मिलल, बाकि अइसे, बिना समग्र परिवार के ऊ भोजन कइसे करिती असमंजस में ऊ तिरिछा दीठि से एक हाली हिडिमा सँगे खड़ा अपना भोला-भाला भीम के तकली.

वयोवृद्ध उत्तुंग के अनुभवी आँखि बहुत कुछ समझि गइल, ”हम महाबली वृकोदर आ देवी हिडिमा के अब्बे बोलाइ के ले आवत बानी, तब तक आप सब उहाँ जलपान वाला वाला जगहा पर चलीं.“ ऊ अँगुरी से एकोरा पत्थल पटिया पर सजा के धइल स्थान का ओर इशारा करत आगा बढ़ि गइलन.

कुछुये छिन में हिडिमा भीम का सँगे भोजन स्थल पर आ गइल, ”माता छिमा करब! एह सोर-सराबा में हमरा एकर ध्यान ना रहल, चलीं माता, स्थान ग्रहण करीं.“ कुन्ती जब आगा बढ़ली त ऊ पाछा पाछा आइल अपना सखी के कुछ संकेत कइलस. निरिमा दउरल आ तुरंते पलानी में से नरकुल के बीनल दू गो चटाई लियाइ के एक तरफ बिछाइ दिहलस. हिडिमा केरा क बड़े बड़े छव गो पतई बीच में धरत सबके बइठे के निहोरा कइलस. भीम के अनुज हिडिमा के सहायता में फल आ कन्द मूल क टोकरी उठाइ के बीच में रखल लोग आ फेरू प्रेम से मुस्कियात कुन्ती का संकेत पर अगल-बगल बइठि गइल. परिवार के फलाहार करावत, कुन्ती हिडिमो के सँगे बइठाइ के फलाहार करे के कहली त ऊहो लजात सकुचात परिवार का प्रेम-पगल जलपान में शामिल भइल. अपना स्वतंत्रा शैली आ तौर-तरीका के जइसे ऊ भितरे जाँत देले होखे, कुन्तिये का अनुसार चुपचाप ऊहे करे लागल जवन कुन्ती चाहत रहली.
(अगिला कड़ी के इन्तजार करीं.)


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डा॰ अशोक द्विवेदी के परिचय

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  • हम कई दिन से भोजपुरी के पहिलकि वेब्साइट अँजोरिया के सदस्य लोगन से कई बेर निहोरा कइनी कि, ऐह सुप्रसिद्ध उपन्यास के अगिला कड़ी डालीं सभे बाकि रउवा लोगिन के इचिको धियान नइखे । जदि रउवा लोगिन के ऐह रसिक उपन्यास के शेयर करही के रहल हव त पूरी तरह से आपन योगदान दीं सभे, ना त अनुगते विमोचन कई के छोड़ देवे के चाहत रहे ।

    रउवा लोग हमरा के आपन बैंक भ पोस्ट ऑफिस के डीडी क्रम० होखे त बताई सभे ।

    अभिषेक यादव
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    JayBhojpuri@Gmail.Com

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