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– गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’

पाकिस्तान के मारि के हमार सिपाही ओकर छक्का छोड़ा दिहलन सऽ. चीन क कुल्हि चल्हाँकी भुला गइल. मिठाई खाइब… हो… हो. ईहे हई नगरी, जहाँ बाड़ी बनरी, लइकन क धइ-धइ खींचेली टँगरी. एगो बीड़ी बाबू साहेब, ना सिगरेट पियला से करेजा जरेला. हो… हो बेईमान…. हमरा के लूटि के कंगाल बना दिहलन सऽ. राधा तोहरा पर हम खुनसाइल ना रहलीं. हमके माफ क द राधा…. तोहरा खातिर जिनगी एही तरे बिता देइब. सेवक आ चाकर हम हईं राधा रानी के… बम बम भोले… या अली तोड़ पाकिस्तान की नली. अयूब खाँ क एगो दाल ना गली. बम… बम… भोले…. हा…. हा…. ही…. ही….-

बाजलि बैरनि रे बाँसुरिया,
टूटल सिवसंकर के ध्यान,
केथुवा चढ़ल सिवसंकर आवें,
केथुवा चढ़ल भगवान,
बाजलि बैरनि रे बाँसुरिया…

हा…. हा…. हा…. हो…. हो…. संसार में सभी लोग चोर हैं….. आई मीन आल आर थीफ सम आर स्माल एण्ड सम आर बिग…. हा…. हा….. माई डियर मास्टर साहेब…. गुडमार्निंग.

हम चकचिहा गइलीं. लइकन क झुण्ड लिहले ऊ पागल हमरा कीहें आके बइठ गइल. दाँत का पीरा से परेसान रहलीं. कवनों खोढ़रा ना हमरा बुद्धि क दाँत जामत रहे एह बुढ़ौती में. सरकार रबी अभियान मनावे के आदेस देले रहे. एही में गाँव-गाँव घूमि के लइकन से खेती करावे के रहे. पचोखर में सिकुमार का दुआरे बइठल रहलीं. गाँव में केहू का दुआरे साइति सँजोगे कवनो मास्टर चलि जालें त ओनकर खूब आदर होला, ओहू में जब लइकाराम कवनो गलती में पकड़ा जासु त का पूछे के. सिकुमार ओही गलती में पकड़ाइल रहलें. सब खेत पर काम करे गइल रहे, ऊ रेडियो पर फिल्मी गाना सुनत रहलन. महतारी सुनलसि त गरम हलुआ भेजलसि कि मास्टर बबुआ के कम मरिहन. बाप पान के बीड़ा थम्हवलन. अबहीं खाये के तइयारी करत रहलीं तबले ऊ पागल आके बइठ गइल. सिकुमार के बाबूजी बतवलन कि ई पहिले बहुत बड़ आदिमी रहल हऽ. आसनाई में
एकर ई दसा हो गइल. एकर दसा देखत बानीं- ईहे नऽ ईसर क मरजी हऽ. कमाला केहू खाला केहू. इनकरा कमाई पर भाई रंग लेत बाड़े स आ ई गली-गली के बहार लूटत बाड़न. ना त पचोखर में एक दिन मदन साहु क तूती बोलति रहे.
”ई राधा के हऽ?“ हम टोकलीं.
”पानी पी लेईं त कुल्हि कहत बानीं.“

पानी पी के हम अहथिर भइलीं त सिकुमार क बाबू कहे लगलन.
ना…. ना…. ना…. अइसन मति करीं…. हम मेहरारू हईं…. रउरा के छोड़ि के हमार एह संसार में के बा? रउरा खातिर घर छोड़लीं…. माई-बाप छोड़लीं. अब हम कहाँ जाइब? सरग से नरक में हमें फेनु मति ढकेलीं. हमके जेतना चाहीं मारि लीं, बाकिर हमके छोड़ के जाईं मति. हम अपना कहला-सुनला क माफी माँगत बानीं. राधा मदन क गोड़ छानि लिहलीं. आँखि क लोर गंगा-जमुना की धारा नीयर मदन क गोड़ बाँधे लागल. मदन पत्थर नीयर खड़ा रहलन. उनुका बुझा कि अब ढेर देरी ले खिनुसाइल ना रहि सकेलन, बाकिर बेटी क सूनि माँगि, आँख में लोर भरलि सूरति नाचि जा ….ना ….ना बाप के कइल बेटी ना भोगी…. बाप अपना प्यार के बलिदान
क देई. उनकरा ना बुझा कि राधा के सनेहि के कइसे झटकि के चलि जाईं. एक ओर भरल-पुरहर परिवार दूसरी ओरि राधा क लोर भरलि आँखि. राधा के लेके कइसे जा सकेलन? एगो मेहरारू रहते ई दूसर अनरथ? प्रेम उनुकरा आँख पर पट्टी बान्हि देले रहल….. पचोखर क बच्चा-बच्चा उनुकरा पर थूके लागी. बड़की लड़की सयान भइलि बा. ओकर हाथ पीयर करे के बा. के करी बिआह? सब कही- एकर बाप कुजाति ह! ….. पतुरिया रखले हऽ. ई बात जेवन कुल्हि आज बा ऊ राधा क दिहल ह, बाकिर ऊ त कुल्हि छोड़ि के जात बानीं खाली अपना मेहनति क कीमत ले ले बानीं. राधा क जिनगी कटि सकेले. मदन क आँखि पर ऊ दिन आके अटकल जेवना घरी गाँव से एगो लोटा आ कमरा ले के झरिया टीसन पर उतरल रहलन. मदन क गोड़ छनले राधा क आँखि क लोर बीतल दिन क परछाहीं हो गइल.

झरिया में राधा बाई क चललि रहे. कोयलरी क कुल्हि मनेजर राधा बाई के मुँह माँगल धन देसुँ सऽ. आजु धनबाद… काल्हु कतरास गढ़…. परसों सिन्दरी…. राधा क रोज परोगराम बनले रहे. ओह दिन कोयलरी में नाचे गइल रहली. नाचि खूब जमलि. नोट से राधा तोपाइ गइली. खूस होके एगो कजरी कढ़वली –
बाजलि बैरनि हो बाँसुरिया,
छूटल सिंवसंकर क ध्यान,
कथुआ चढ़ल सिवसंकर आवें,
कथुआ चढ़ल भगवान,
केकर जियरा हुलसल लागे,
केकर जिया मसान,
बाजलि बैरनि हो बाँसुरिया….

गाना खतम होत-होत कोयलरी क एगो मनेजर उठलन आ कहे लगलन-”राधा बाई के गाना सुनि के हमार कोयलरी क मिठाई वाला मदन साहु एतना खुस बाटे कि आजु दिन भर क कमाई राधा बाई के भेंट करि रहल बा. एकरा अलावे ई एक महीना तक रोज क कमाई राधा बाई के देबे के निसचय कइले बा. गड़…. गड़…. गड़…. ताली बजली स अवाजि उठली न…. साबास जवान…. बाड़े तें कलाप्रेमी … रण्डी का नाचि के सुरच्छा कोष बना लिहले. बाह रे राधा बाई…. एक नजर में कमाल करतारू.“

राधा बाई सोचली कि एगो बेवकूफ फँसल. बाकिर ओह राति मदन का नीनि ना परलि. पलक पर राधा खुमारी नीयर छवले रहली. सोचसु त बुझा कि राधा क कुल्हि हाव-भाव उनहीं खातिर रहल ह. ऊ मुसिकयाइल, ऊ दूध क धोवल दाँत… राधा इनरासन क परी ले कम मदन के ना बुझासु. रोज राधा का घरे जाये लगलन. दिन भर क कमाई हाथ पर ध के चलि आवसु. राधा बड़ा हरान भइली. कवनों कहानी नीयर उनकरा ई बुझा. भला ई कवन लति ह कि आवत बा आ पइसा थम्हा के चलि जात बा… न गाना सुने के, न कुछ. विचित्र आदिमी बा. पूरा बेवकूफ ई बा. पहिले त राधा बेवकूफ पर टारि दिहली बाकिर एही तरे पनरह , दिन बीतल त मन क दया उभरि आइल. ए राधा तोहके केहू के दिनभर के मजूरी सेतिहाँ लिहला के का अधिकार? राधा कान मूँदि लिहली. सोमार क दिन रहे. आजु घरे केहू ना रहे. छोटकी बहिन गीता एगो कोयलरी में गोमो नाचे गइल रहली. अम्मा ओकरा साथे गइल रहे. बुढ़वा बाबा रहलन ऊ बजारे गइल रहलन. राधा के दिन भर उदासी घेरले रहे. अकेल बितावे के परेला त दिन पहाड़ हो जाला. मन क उदासी तोरे खातिर उनकी ओठ पर गीत फूटल –
बैल चढ़ल सिवसंकर आवें,
गरुड़ चढ़ल भगवान,
पिया संग जियरा हुलसल लागे,
पिया बिना जिया मसान,
बाजलि बैरनि रे बाँसुरिया.

राधा चिहुँकली…. केहू क गोड़ क आहट पाछे पवली. देखली मदन हाथ बढ़वले खड़ा रहलन. हथोरी पर दिन भर क कमाई हँसति रहे.

”ले जा रुपया हम ना लेइब. हम खटि के खाये जानींला, ई हराम क रुपया हम ना लेइब. हमरा के बेवकूफ बनावे के अच्छा उपाय सोचले बाड़ऽ.“
”गलत समुझत बानीं…. ई हराम क ना ह…. ई सुघराई के कीमत हऽ. ….एही बहाने कम से कम एक बेर देखि त लेत बानीं. ई बहुत बा…. ई पूजा क फूल भगवती का मंदिर में चढ़ावत आवत बानीं. बड़ा साधि से आईंला“ – मदन मिनती कइलन.
”जा…. जा ई कुल्हि बेवकूफी हम ना करबि. अब मत कबो अइहऽ. घरे मेहरारू लइका खइला बिना मरत होइहन. एहिजा दिन भर के कमाईं रण्डी के लुटावत बाड़ें… जा बाबू साहेब…. जा मरद-मेहरारू के नाता बड़ा पवित्र होखेला, ओके एह तरे ना तोरल जाला.“ राधा घर में चलि गइली. ना जाने काहें राधा का अपना जवार की ओर के लोगन के मोहि लागेले. अम्मा एह काम में ढीठ परेले. कहेले-मोह कइसन बेटी! पतुरिया केहू के ना जोरू, ना तबलची केहू क बाप. बाकिर राधा के ना जानी काहें ई कुल्हि ठीक ना लागे. अम्मा का सोझा कुछ ना बोलति रहली. आजु बड़ा नीक मोका मिलल रहे. घर में जाके केवाड़ी बन क लिहली. मदन भारी मन से लवटि गइलन.

साँझि क बेरा राधा क मन अउरी भारी हो गइल. सुनले रहली बिहार टाकीज में भोजपुरी खेला लागल बा. सोचली चलीं देखि आईं तबले त दस बजे वाली गाड़ी से अम्मा चलि अइहन. पहिर-ओढ़ि के तइयार होके जइसहीं घरसे निकलल चहली तब ले कोयलरी क मनेजर सेाझा खड़ा हो गइलन.
”बाबू-साहेब एह घरी त फुरसत नइखे फिर कबो आइब“! – राधा कहली.
”राधा हम नाच देखे नइखीं आइल. हम बहुत जरूरी बात तोहसे कहल चाहत बानीं. मदन मिठाई वाला आज सबेरे से बेहोस बा. जब ऊ थोड़ी देर खातिर होस में आवत बा त तहार नाम लेके गीत गावे के बिनती करे लागत बा. तूँ जल्दी चलि के ओकर जान बचा लऽ. हम तोहके मुँह माँगल ईनाम देइब.“

मनेजर साहब क चेहरा पर बदहवासी नाचत रहे. राधा क जीव धक् से हो गइल…. एतना मदन उनुकरा के चाहत बाड़न. राधा ई कब्बो ना सोचले रहली. अब ले जानत रहली बेसवा से परेम कम, खेले अधिक लोग जानेलन. एकरा खातिर न कवनों दुख न सुख…. राधा कुछ कहि ना सकलीं. अइसन बुझा कि करेजा के केहू खींचत बा… मन क सबेरे वाला चेहरा आँखि पर नाचल. चुप-चाप आके मोटर में बइठ गइली.

मजूरन क भीड़ि लागलि रहे, हाथे-मुँहे करिखा पोतले. मनेजर आ राधा के गाड़ी से उतरते सब हटि के रहता दिहल. एगो छोटीमुकी कोठरी में मदन सुतल रहलन. ओहिजे बगल में कुरसी पर कोयलरी क डाक्टर बइठल रहलन. डाक्टर बतवलन कि रोगी के कवनों बाति क अइसन सदमा पहुँचल बा, जेवना से ओकर दिमाग पर असर पड़ल बा. जदि ठीक से इलाज ना भइल त हो सकेला ऊ पागल हो जा…. राधा…. राधा…. गीत ऊ चिचियात बा.

राधा सोकता हो गइली. ई ना जानति रहली कि एह गरीब आदिमी का मन में उनुकरा खातिर एतना प्यार बा. करेजा मिमोरा उठल. मदन बड़बड़इलन…. ”राधा…. राधा… ऊ गीतिया सुना दऽ राधा.“ राधा बेहोस मदन की ओर देखली…. लिलार पर हाथ धइली तावा नीयर जरत रहे. धीरे से गोहरवली….. ”मदन…. मदन हम तोहार राधा गोहरावत बानीं बोलऽ…. बोलऽ ना…..“ रोगी आँखि बन कइले सुतल रहे. राधा क लाजि से गाल लाल हो उठलन स. लिलार पर पसीना चुहचुहा गइल. कुरसी पास में खींच के ले गइली…. कान कीहें मुँह ले जा के धीरे से कढ़वली-/के रामा जेंवे सोने क थारी, के खाये मगही पान/पियवा जेंवे सोने क थारी, धनिया कचरे पान,/बाजलि बैरनि रे बाँसुरिया, छूटल….

गीत जादू नीयर असर कइलन. मदन क आँखि खुललि. राधा के टुकुर-टुकुर देखे लगलन…. फेनु कुछ खियाल पारि के चकचिहा गइलन ‘तूँ…. राधा.. …’ राधा चुप करवली- ”बोलीं मत हम राउर राधा हईं. आप के जवन कुछ कहले रहलीं ओहके माफ करीं…. आप रोज हमरा कीहें आइल करबि- राधा क आँखि लोर में ना जाने काहें डूबि गइली स.“

”राधा!“ मदन राधा क हाथ ध लिहलन ”राधा हम तोहरा बिना जी ना सकीं. ई साँच बा कि हमरा मेहरारू लइका कुल्हि बा, बाकिर तोहरा के छोड़ि हमरा ओंठन के मुस्कुराहट केहू ना दे सके… दिनभर क थकावट केहू ना हर सके…. हम गरीब बानी बाकिर मन से ना…. देखिहऽ जइसे जिअवलू ओहसे निबहिहऽ. मदन क आँखि के लोर खरकि के गाल पर आ गइल. ई सब बात-चीत सुनि के डाक्टर मनेजर साहब का साथे भीतर अइलन. मदन क नाड़ी देखी के डाक्टर साहेब कहलन- अब कवनों खतरा क डर नइखे.“

मदन त नीक हो गइलन बाकिर राधा उनुकरा प्यार में बेमार हो गइली. दिन-राति क गाड़ी अपना गति पर रहे. दूनों एक दूसरा का पँजरा अइसन आ गइलन कि एगो का बिना दुसरका क जिनगी बेकार रहे. अम्मा से जब राधा मदन से बिआह करे क बाति कहली त खिनिस के ऊ लाल हो गइली- ”सादी त हमनी क एगो मरद से होले… ऊ मरद ह रुपया…. दूसर कवनों मरद पतुरिया क बाँहिं ना थाम्हि सके. एही से हमनी का सदासुहागिन हईं जा. तूँ छोकरी बाड़ू. तूँ अबहीं का जनबू की कइसन धोखा ई समाज आ ई मरद हमनी के देलन सऽ“.

बाकिर राधा अपना कहला पर टस से मस ना भइली. कमरा में जाके उदासी तोरे खातिर रेडियो पर हाथ गइल त गीत क आखिरी लाइन कमरा में गूँज गइल-/आली रे मोरे नयनन बानि परी मोरे नयनन बानि परी/मीरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहे बिगरी/मोरे नयनन बानि परी. राधा रेडियो बन्द क दिहली. आँखि गंगा-जमुना हो गइली स. ओही दिन राधा मन में निसचय कइली- ”मदन क संग ना छूटी.“ राति के मदन का घरे चलि गइली. नाँवें बैंक में पचास हजार रुपया रहे. जिनिगी क नाव खेवे खातिर काफी रहे. अम्मा सुनलसि त राधा का नाँव पर थुकी के गोड़ से दरि दिहलसि.

झरिया में मदन लाल क लकड़ी क गोला मसहूर हो गइल. राधा त उनका के मिलबे कइली, साथे एगो मोट संपति उनुकरा के मिलि गइल जेवन उनुकर गरीबी तोपि दिहलसि. पचोखर में हवेली उठि गइल. धूरि लपेटले जवन लइका उनुकर घूमें स, ऊ चिकन-चाकन लउके लगलन स. जवना घरी कमा के मदन पचोखर में गोड़ धइलन लोग माला फूल से उनुकरा के लादि दिहलन. गाँव क बड़कवा लोग उनकरा धन का आगे आँखि मूँदि ले. उमा साहु अँकवार दिहलन. गँगा साहु पीठि ठोकलन. मुनीर मियाँ जयहिन्द कहलन. लाखन क कारबार एह से गाँव में तूती बोले लागलि. मदन राधा वाली बात के मन में रखलन. केहू से ना बतवलन ना ओके सँगे के अइलन, बाकिर दुसमन जे रहे ऊ दाँव खोजे. दुसरी बेर झरिया से जब गाँवे अइलन, ओकरा ले पहिलहीं एगो गाँव क आदिमी झरिया कमात रहे ऊ आके कुल्हि बाति कहि देले रहे. बिरादरी क कान खड़ा हो गइल, काहें से कि एगो मोट असामी भेंटाइल रहे. कन्हई मास्टर मोंछि पर हाथ फेरलन- अब बच्चू पकड़इलन. लइकी सयान भइल रहे. भाई मदन के समुझवलस ‘भइया! ई का कइलऽ हऽ बबुनी क बिआह कइसे होई? बिरादरी कुजाति निकाले के सोचति बा….’ आ मदन साहु का आँखि का सोझा फूल नीयर बेटी माला क लोर से डूबल चेहरा नाचि गइल. मदन साहु के आपन इज्जति घूरि में मिलति लउके लागलि. प्रेम के भूत उतरि गइल.

समाज का आगे घुटना टेके के परल. लोग उनके समुझवलन- ‘पंचों बिसवास करो हम अइसन काम नइखीं कइले… ई झूठ ह…. हमरा माला के बिआह होखे देईं जा.’ बाकिर पंच ना मानल निरनय भइल- ‘अगर तूँ नइखऽ कइले त सफाई खातिर गाँव पर आकें कारबार करऽ. झरिया छोड़ दऽ अब. मदन कपार पीटि लिहलन.’

मदन साहु बदलि गइलन. राधा के ना बुझा कि बाति-बाति पर काहें मदन अब खिनुसात बाड़ें. आजु त मारि दिहलन ह, जवन कबो ना कइले रहलन ह. राधा का ना बरदास भइल ह ऊ जबाब दिहली. एह पर मदन साहु झरिया छोड़ि के जात बाड़न.

राधा कहाँ जासु. बैंक क कुल्हि रुपया बेपार में लागि गइल. आजु ले बेसवा सबके ठगली सऽ आजु ऊहे ठगा गइल…. राधा का सोझा अम्मा क मुसकियात चेहरा नाचि गइल. राधा, मदन साहु क गोड़ छानि लिहली- ”दया करीं…. हम जेवन कहि देहलीं, ओकरा खातिर माफी माँगत बानीं…. हमरा अब के बा….खियाल करीं हम रउरा के कइसे अपनवलीं… रउरा के हम जिअवलीं. हमरा के मारीं मति.“ मदन क करेजा मिमोरात रहे, बाकिर पत्थर बनल रहलन. आँखि का सोझा पंचन क आ माला क मुँह पारी-पारी से घूमि जा. जाके समान बान्हे लगलन. सबेरे गाड़ी जाति रहे. तय कइलन इहिजा क कुल्हि संपति छोड़ि दीहें. लोटा कमरा के बान्हि के ध दिहलन. राधा कमरा में जाके रोवति रहली. सबेरे मदन हाथ-मुँह धोके जाये के तइयार होत रहलन तबले नोकर दउरल आइल आ कहलसि- बाबूजी, मलकिन पागल हो गइल बाड़ी. मदन भीतर गइलन देखि के जीव धक्क् से हो गइल. राधा कुल्हि सिंगार ओइसने कइले रहली जइसन क के कोयलरी में पहिली बेर नाचे आइल रहली. मदन के देखते नाचि के कढ़वली-/बैल चढ़ल सिवशंकर आवें, गरुड़ चढ़ल भगवान/पिया संग जियरा हुलसल लागे, पिया बिना जिया मसान,/बाजलि बैरनि हो बाँसुरिया.

राधा…. राधा… मदन क मन क बान्ह टूटि गइल. हम ना जाइब राधा…. हम ना जाइब. राधा रुकि कइली आ धाँय से गिरि पड़ली. मदन दउरि के उठा लिहलन. राधा…. राधा….. आँखि खोलऽ राधा! हम तोहरा बिना ना जी सकीं. सावन भादों नीयर आँखि चूवे लगली स. राधा आँखि खोलली आ कहली- ”खियाल करीं एक बेर आप हमरा खातिर मरत रहलीं बाकिर हम आप के जिया लिहलीं, बाकिर आज आप खातिर हम मरत बानीं, हो सके त जिया लेईं.“ राधा क मूँड़ी एक ओर लटकि गइलि. माहुर क करियई ओंठ पर हँसे लागलि. मदन चिचिआये लगलन- राधा…. राधा…. अवाजि कमरा से लवटि आइल. के जबाब दे? जबाब देवे वाली राधा मदन क रास्ता दूर जाके खोजति रहे.

सिकुमार बाबू आँखि पोंछलन. फेनु कहे लगलन. ओहिजा क लोग मदन के घरे पहुँचावल, काहें से कि मदन क दिमाग ओही दिन फेल हो गइल. आजु देखते बानीं गाँव की गली-गली में घूमि के राधा के गोहरावत बाड़न…. घर क भाई जेवन इनहीं की कमाई पर धनी भइलन स, आजु बाति नइखन स पूछत. पागल उठल. भागि चलल….. हा….. हा….. संसार में सब धोखा- विसवासघात…. बाबू दूधनाथ क जय…. सिपाही भइया राजनरायन, माखन दऽ…. राधा कीहें जाइब, लकड़ी बेचब…. हा…. हा…. ही….. ही… गावे लागल- ‘बाजलि बैरनि रे बाँसुरिया, टूटल सिवसंकर क ध्यान….


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)

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