– डा॰ सुभाष राय

जाड़ा जब हाड़ ठिठुरावे लागेला त सगरो गाँवन में कउड़ा के बहार आ जाले. दुवारे से थोरिक लम्मे घर भर क कूड़ा जोरि के रखि दिहल जाला अउर सूखल रहेट्ठा तोरि के ओकरे उप्पर डारि दिहल जाला. फेरू ओके बारि के पास-पड़ोस क सभै लोग कउड़ा तापे बइठि जाला. उहाँ गाँव भर क चरचा होले. थोरी-थोरी बेर में चाय बनि के आवेले अउर गरमागरम बात चलत रहेले. समझीं कि जाड़ा क चउपाल जम जाले. दिन भर गाँव में का-का भइल, सब उंहा मालूम हो जाला. मजेदार अउर लच्छेदार बातिन में लोग सब कुछ भुलाइल रहेला. गुल्लुआ के गाँव में कउड़ा के चउपाल प छोटू आ सीताराम के पूछ सबसे जियादा रहे. ऊ दूनो गाँव के खबरची के रूप में जानल जात रहें. चाहे रमेसरा की नवकी दुलहिनिया से ओकरी खटपट क बात होखे, चाहे लरिकनी छेड़ले खातिन रजिंदर क ठोंकाई, चाहे परधानजी के सपूत क चमरउटी की छोरी से इस्क होखे, चाहे रधिकवा क चोरी-छिपल रंगरेली, सगरी खबर एक्के घंटा की बइठक में मालूम पड़ि जासु. जवने दिन दूनो में से एक्को खबरची ना रहे, कउड़ा क मजा किरकिरा होई जासु आ जवने दिन दूनो आ जासु स, बइठकबाजी आधी राति ले चलत रहे. केहू उठे क नांव ना लेसु. ई बाति तब क बा जब गुल्लू दसेक साल क रहल होई. ओकरा के रोज साँझि भइले क इंतजार रहे. हाली-हाली खाना-ओना खाके ऊ कउड़ा के आस-पास मंडरात नजर आवे. कहनी सुनले में ओके बहुते मजा आवे. ऊ एतना बड़ ना भइल रहल की बिच्चे में कुछ बोले, एही से ऊ चुपचाप सुनले में मस्त रहे.

अइसने एक राति सीताराम भूतन क बात उठा दिहलन. पड़ोसे में छेदी के साथ अनहोनी घट गइल रहे. ऊ सूतले में राति क सपना देखलन कि उनुकी दहिने हाथ क बीच वाली अंगुरी क दू ठो पोर उनहीं क पड़िया चबा लेले बा. जब सबेर भइल आ ऊ उठलन त का देखत बाड़न कि उनकी खटिया की निगीचे ढेर खून जम्मल परल बा आ ओहि में सनाइल उनकर अंगुरी के कटल पोरो बा. ऊ बहुत डेरा गइलन. सगरे गाँव में हल्ला हो गइल. लोग उनके देखे खातिन भहरा के उनके घर की ओर दउरि परल. केहू कहे कि खदेरन के जल्दी बोलावे के चाही, काहे से की ई कवनो भूत-परेत क काम बुझात बा. खदेरन जइसन ओझा अरियात-करियात में कहवां मिली. ऊ आ जइहें त ए ससुरा के डंडा से धूनि-धूनि के भगा दिहें भा फेरू बोतल में बान्हि के भैरो बाबा की इहां छोड़ि अइहें. केहू कहे कि जल्दी से डकटर के बोलावल जरूरी बा. दवा-दारू होखे के चाही. तरह-तरह क लोग, तरह-तरह क बाति. छेदी क घरवाले बहुते परेशान, का करल जाय, का ना. खदेरन के पता चलल त ऊ दउरल आ गइलन. अवते भीर लगवले लोगन के डपटलन त सब पाछे हटि गइल. पचरा गावे लगलन. कहल जाला कि जब कवनो ओझा पचरा गावे लागेला त आस-पड़ोस क सगरी भूत उंहवां बटुरि जालन स, फेरू जवन कसूरवार होला ओके दबोचि लिहल जाला. पचरा चलत रहल बाकिर बहुत देर हो गइल रहे. सपना क भूत छेदी के सीना प सवार हो गइल रहल. ओकर शरीर गरमाये लागल, माथा जरे लागल. छेदिया क मेहरारू अंगोछा भिजा-भिजा के ओकर देहि पोंछत रहल बाकि सब बेकार. ओकर खून बहुत बहि गइल रहे. सांझि से पहिलहीं ओकर देहि पियरा गइल. खदेरन बुझि गइलन, पचरा बन क दिहलन आ ओकरी बाद छेदी के घरे सब रोवे-पीटे लागल.

सीताराम कहलन, ‘छेदिया की साथे ई बहुत बुरा भइल. ओके हम कई बेर मना कइलीं कि राउत बाबा के गाली-गुपता देवल ठीक नइखे बाकिर ऊ मनबे ना करे. कहल करे कि भूत-परेत सब बेकार क बाति बा. कबो-कबो त ऊ ओहि बरगदवा के नीचे मूति देवे, जवने प राउत बाबा क ठीहा रहल. बाबा वइसे त कवनो बाति क बुरा ना मानेलन बाकिर उनकर चेलन-पट्ठन के छेदी क ई करतूत अच्छी ना लगत रहल. बाबा की साथे ओहि बरगदवा प सौ भूतन क डेरा रहल. ओमे दू गो बहुत बदमाश रहलन. कनवा आ रतना. सबके पता बा कि कनवा कई बेर झौहरिया की नवकी मेहरारू प चढ़ चुकल बा. जब्बे कबो ऊ भुलाइयो के बरगद की निगीचे से गुजर जाले, घरे पहुंचते अभुआये लागेले. झौहरिया का करे बेचारा, ओकर झोंटा पकरिके उठा-उठा के भुइया पटकेला, खरहरा से ओकर धुनाई करेला बाकिर कनवा जिद्दी क जिद्दी. ऊ भले केतनो पिटा जासु बाकिर एक राति से पहिले ओके ना छोड़े, त ना छोडे. जब झौहरिया राउत बाबा के बकरा अउर दारू क मनौती मानि के उनक गोड़ लागेला, तब्बे ओकरी बीवी के कनवा से मुकती मिलि पावेले.

रतना एतना बदमिजाज त ना हवे बाकिर ऊ दारू क शौकीन जरूर बा. बाप-दादन से गाँव में ई रिवाज चलत आ रहल बा कि घर में केहू दारू पी त पहिले रतना खातिन निकारि के तब पी. परसाल क बाति बा. ठकुरा न जाने कहवां से एक बोतल विदेसी ले आइल आ दू गो दोस्तन क संगे पीये बइठि गइल. ओमे से एगो कहबो कइलस कि रतना के चढ़ा दे त पीयल जाय बाकिर ऊ शहर में पढ़ि के आइल रहल से केहू क बाति ना सुने, रिवाजो ना माने. ऊ गरमा गइल, ‘कवन रतना, झांटू कहीं का, ऊ हमार का उखारि लेई?’ पुरवा भरिके गटागट गटक गइल. दारू भीतर का गइल की सीना में सूई चुभे लागल. बेचारा माथा थामि के बइठि गइल. पिताजी क अलमारी में अर्जुनारिस्ट रखल रहे. ओके लागल कि हो सकेला ओहू के पिताजी जइसन दिल क बेमारी होखे से पुर्रे कटोरी भरिके हलक से उतारि लेहलस. बाकिर ऊ त रतना रहल. ऊ छोटो-मोट गलती खातिन केहू के छोड़ेला ना. लोग हकीम के बोला के ले अइलन बाकिर ई का ओकर त अवजिये बदलि गइल. ओकरी भितरां से केहू अउर बोले लागल. फेरू ऊ कोठरी से निकरि के सरपट भागे लागल? आपन बार नोचत, दांत कटकटावत आ देवार से कपार टकरावत. केहू का बुझाय ना कि का कइल जाय. बभनउली से बड़के सइयद बाबा के बोलावल गइल. ऊ ठाकुर के पोंछिया के पकड़वा लिहलन अउर खंभा से बन्हवा दिहलन. फेरू खूब जमि के पिटववलन. जब दनादन दस लाठी पीठि प परल त ऊ आपन मुंह खोलि दिहलस, ‘का करीं, ई छोकरा हमके पूछबो ना कइलस आ गिलसिये जुठार दिहलस.’ सबके बुझा गइल कि ई रतना बा. सइयद बाबा ओके वादा कइलन कि ठकुरा एक ठो नयी बोतल ले आई आ कूल्हि तहरा के दे देई. तब जाके बबुआ क पिंड छूटल.

छोटू बहुत अबेर से चुप रहलन. उनके ओंघाई लागत रहे, उनकर मुंह बवा-बवा के बन हो जात रहे. ऊ सीताराम के टोक के बाति आगे बढ़वलन, ‘देख भइया, भूत-परेतो अदिमिये जइसन होलन स. कुछ नेक त कुछ बदमास. परेत जोनि में सबके थोरी दिन रुके के परेला. जेकर जइसन करम बा, वोही के हिसाब से ओकरा भुकती-मुकती मिलेले. अदिमी क जवन इच्छा इहां ना पूरी हो पावेले, ऊ एहि परेत जोनी में आके पूरी करेला. कुछ भूत त जानि-बुझि के उत्पात मचावेलन स कि कवनो संत-महातमा से पाला परि जाय ताकि एहि जोनी से मुकती मिले. सभै जानेला कि रामजी चाचा क परबाबा पिंगल राय सौ बरिस से परेत जोनी में परल बाड़न. कुछ बुरा काम जरूर कइले होइहें बाकिर अब त उंहा के खाली सबकी भलाई में लागल रहीले. केकर मजाल कि रामजी चाचा क कउनो काम बिगाड़ि देवे. ऊ लोटन ससुरा, पता ना का ओकर मति बउराइल कि एक राति बाबू साहब की खेत से गेहूं काटे पहुंचि गइल. काटियो लेहलस बाकिर कपार प जइसे बोझिअवलस आ चले खातिन खाड़ भइल कि रामजी चाचा पहुंचि गइलन. सपना में पिंगल बाबा अइलन आ रामजी के दूई चाटा रसीद कइलन. उनकर आंखि खुलल त देखत बाड़न कि बाबा सम्हनवें खाड़ हउवन अउर कहत बाड़न कि, ‘बेटा, जा तनी आपन खेतवा त देखि आवा. रामजी क नजर घड़ी प गइल त राति क दू बजत रहे. मुंह प पानी क छींटा मारि के ऊ खेत की ओर चल पड़लन. बाबा ना जगवतन त लोटनवा दस-बीस किलो अनाज क झटका त देई देहले रहत.’

‘अउर गया बाबा के का भइल रहल’, गुल्लू के अनचक्के में कुछ इयाद आ गइल. रोज-रोज क भूतबतिया से ओकरा मन में थोरी दिलचस्पी जाग गइल रहल. ऊ सांझि क कबो जब राउत बाबा वाले बरगद की निगीचे से गुजरे त एक फरलांग पहिलहीं से सरपट दउरे लागे अउर बरगद से ओतने आगे पहुंचि के रुक्के. एक बेर ऊ अपने पिताजी से पूछलस, ‘काका, तू कबो भूत देखले बाड़?’ पिताजी अचकचा गइलन बाकिर जबाब दिहलन, ‘हँ हो, एक बेर अइसन भइल रहे. ओहि दिन हमके राति में मइदान जइले क मन कइलस. लोटा उठवलीं आ बगइचा की ओर निकलि गइलीं. चटक अँजोरिया उग्गलि रहल. पसेरिहवा आम के पेड़ से थोरी फरके जाके बइठि गइलीं. थोरी बेर बाद उत्तर की ओर हमार नजर गइल. हमरे नयका अमोलवा के निगीचे एक ठो मेहरारू लउकल. सफेद साड़ी पहिरले रहल. हम उठलीं त ओकरी पास से निकललीं. असमान में चांद देखि के लागल कि राति क तीसर पहर रहल होई. एतनी राति क बगइचा में एक ठो मेहरारू देखि के हमके कुछ नीक ना लागल. एक नजर ओप्पर डललीं. ओकर मुंह तनी आड़े रहल, एह से पहिचानि में ना आइल बाकिर जब हम ओकर गोड़ देखलीं त माथे प पसीना चुहचुहा गइल. ओकर गोड़ पाछे की ओर मुड़ल रहल. ऊ जरूर कवनो चुरइल रहल होई’

गुल्लू के एक बेर पिताजी गया बाबा क कहनीओ सुनवले रहलन. बहुत मजेदार रहलि. बाबा आपन जमाना क बड़का पहलवान रहलन. ऊ कुश की झुरमुट के भूत समझि के ओसे बाजि गइलन. गुल्लू क मन कइलस कि गया बाबा क कहनी सीताराम के मुंह से सुनल जासु, ‘हँ त सीता चाचा, गया बाबा क बाति बताव नु’ सीताराम शुरू हो गइलन, ‘कहनी न कहा बाबू, सौ आना सच बाति बा. गया बाबा अकसर राति-बिराति खेत देखे खातिन निकलि जात रहें. अइसने एक राति जब ऊ अपनी खेत पर पहुंचलन त उनुके लागल कि कवनो छांह जइसन चीजि उनकी ओर लपकति बा. चांदनी राति रहल. पुनवासी रहलि होई. दूर ले साफ-साफ लउकत रहे. खेते की मेंडन प कुश क झुरमुट झबराइल रहल. मीठ-मीठ पुरवाई बहति रहल. कुश लहरात रहल त ओकर छांहो लहरात रहल. गया बाबा थोरी लम्मे रहलन तबे ओके ललकारे लगलन, आवे दे निगीचे तब तोके बताइब. ऊ छांहे की ओर बढ़ि गइलन आ आव देखलन न ताव कुश के झुरमुट में घहरा के घुसि गइलन. कुश क नोंक उनके खुलल देहि में धंसे लागल त ऊ बुझलन कि केहू उनसे लड़त बा. ऊ कुश से बाजत-बाजत थाकि गइलन बाकिर कुश क झुरमुट उखारि डललन. एहि झूठ-मूठ क लड़ाई में बाबा के बहुत घाव लागि गइल. ऊ लथ-पथ उहवें पसरि गइलन. सबेर भइल त केहू उनूके लहूलुहान देखलस आ उठा-पठा के घरे ले आइल. बाबा बेमार हो गइलन आ सरग सिधारि गइलन.’

कल्ले-कल्ले गुल्लू के लागे लागल कि भूत-परेत क सगरी कहनिया मनगढ़ंत बा बाकिर ओकरी मन में बहुत गहिरे एगो डर जरूर बइठि गइल रहल. ऊ जानल चाहत रहल कि आखिर ऊ कूल्हि रहस्स का बा बाकिर कइसे जाने, कवनो रस्ता ओके सूझे ना. गुल्लू की घर-पलिवार में सबही क आपन पुरखन क रसम-रेवाज में पूरा भरोसा रहल. उहां सभै देवी-देवतन के मान-सम्मान रहल. सब लोग भगवान के माने वाला रहल. एक ठो बेमार बहिन रहल, जवने की इलाज खातिन डकटर की जगह अकसरुए खदेरन के बोलावल जासु, उनकर पचरा होसु. कबो-कबो गुल्लू क माई आपन बाल-बच्चन के जोग-छेम खातिनो ओझइती करावति रहलिन. दवा प पइसा लुटवले से अच्छा इहे समझल जासु. ओझा बाबा के का चाही. जियादा से जियादा भर पेट खाना अउर दू-चार आना दछिना. माई सालि में एक बेर देई माई की थाने जरूर जासु. गुल्लू क दिलचस्पी उहां देसी घीव में छनल पूड़ी अउर बखीर में जियादा रहे. ऊ चुपचाप भूत-परेत की खोज में लागि गइल. ओकरा के लागे की साधू-संत ऊ रहस्स क बारे में जियादा जानत होइहें. एहि तलास में ऊ रोज तपसी बाबा की कुटी क एक चक्कर जरूर लगावे. तपसी बाबा गिरहत्थ साधू रहलन. ऊ घर-बार क जिम्मेवारी छोड़ि के अबादी से थोरी दूर एगो कुटी बना के रहत रहें. सबेर की पूजा के बखत ऊ घंटा बजावें त अवाज लम्मे ले जासु. गुल्लू ओकर बाटि जोहे. घंटा बजल कि ऊ कुटी की ओर दउरि परल. बाबा भूनल चना, हलुआ अउर बतासा क परसाद देसु. कुछ दिन बीतल त गुल्लू क ई खोज खाली परसादे ले सीमित रहि गइल. तपसी बाबा हरे राम, हरे कृष्ण से जियादा कुछू जानत ना रहलन. गाँव में नागा बाबा, जोगी अउर दूसरी किसिम क साधू लोग भी आवत-जात रहे. बाकिर ओमे से कवनो मंगन से जियादा कुछ बुझाइल ना.

गुल्लू दिन प दिन बढ़त जात रहल. घर में जेतना किताबि रहलिन सन, ऊ पढ़ि डरलस. कबो-कबो ऊ बजार से तंतर-मंतर क किताबि आ पतरिका खरीद लेसु. जब राति क सब लोगन क आंखि लागि जासु त चोरी-छिपल ऊ नयी-नयी चीज पढ़ल करे. रहस्स-रोमांच क कहनिन में ऊ गोता लगा लेवे बाकिर सब बिरथा. कबो-कबो ओकरा मन होखे कि ई कहनिन क लेखकन से मिलि के सचाई जानल जा सकेले पर अबहिन ले ऊ कबो अकेले गाँव से कवनो बड़ शहर की ओर निकलल ना रहे, से ऊ कवनो फइसला ना क पावे. जब ओके कवनो रस्ता ना लउकल त ओकरा मन में प्रतिक्रिया होखे लागल. कबो-कबो ऊ सोचे कि ई सब बकबास बा, झूठ बा. ओहि बखत गाँव में काली माई की थान प एगो मेला लागल. घर-घर से माई के धारि चढ़ल. धारि से भरल घइली सजा-सजा के माई की चउरा प रखल गइल. गुल्लू खातिन भूत, परेत, देवी, देवता, केहू प बिस्सास कइल कठिन हो गइल रहे. केहू सच बतावे आ देखावे आला ना मिलत रहल. ऊ कबो-कबो त बहुत बेचइन हो जाय. एहि मनोदसा में एक दिन ऊ चउरा के पास खाड़ पेड़े प चढ़ि गइल आ माई की कपार प कूदि परल. ऊ ई काम कई बेर कइलस. ई सोचि के कि अगर माई होई त चउरा से कबो त निकली. चाहे भले गुसियाईये के निकले बाकिर निकले त. माई ह, त पियारे नू करी. पियार एह खातिन कि बच्चा बा, जानत नइखे बाकिर जानल चाहत बा. कवनो माई आपन बच्चा से कहां गुसियाले, आ अगर गुसियाले भी त पियारे खातिन नू. जब कपार प गोड़ रखले के बादो माई ना निकललि त ऊ ओकरे कपार प डंडा बरसा दिहलस अउर उंहा सजाइ के रखल कूल्हि घइली फोरि डरलस.

अब कल्ले-कल्ले ओकर डर कम होखे लागल. ऊ हर घरी देवी-देवतन क बेइज्जती करे खातिन तइयार रहे. गाँव में डीह बाबा की थान से माटी क हाथी घरे उठा ले आवे. जब कई ठो हो जासु त लठिया के फोरि देसु. खेते प सइयद बाबा क समाधि रहल. मजार ढहि गइल रहे. खाली एक ठो देवार खाड़ रहल. जब ऊ पिताजी के संगे खेत प जासु, बाबा की देवार से एगो ईंटा उखारल ना भुलासु. ओकर खोज खतम ना भइल रहल बाकिर ऊ एतना मेहनत के बाद ई माने लागल रहल कि ई सब खाली गढ़ल-गढ़ाइलि बाति बा. एहि उधेड़-बुन में ओकर गाँव की इस्कूल क पढ़ाई पूरा हो गइल. शहर में दाखिला हो गइल. पढ़ाई क बोझा बढ़ि गइल. भूत-परेत में ओकर दिलचस्पी खतम ना भइल रहे बाकिर ओकरे पास अब बखत कम पड़े लागल. नवका इस्कूल में हिंदी क माट साब बहुत नीक से पढ़ावत रहलन. एक दिन ऊ सब बच्चन क इम्तहान लेवे के सोचलन. सबसे पूछलन कि भूत क माने केहू बताई? सब नया-नया इस्कूल में आइल रहल, केहू हाथ ना उठवलस. फेरू ऊ खुदे बोललन, ‘अरे बेटे, भूत ऊ बा जवन न वर्तमाने में बा, न भविस्से में होई. जवन बीति गइल बा, जवन बटले नइखे.’ गुल्लू चिहा-चिहा के माट-साब क मुंह ताके लागल. ऊ मिडिल क्लास में काल पढ़ले रहल. मुंसीजी खूब समझा के बतवले रहलन, ‘काल तीन ठो होला, भूत, वर्तमान आ भविस्स.’ तब ओके भूतकाल क पूरा बोध ना भइल रहल. ऊ नवका माट-साब की तऊर-तरीका से बहुत परभावित हो गइल रहे. ऊ जब भूत क अरथ बतवलन त ओकरे दिमाग में बिजुरी कउंधि गइल. ओकर खोज एके झटका में पूरी हो गइल. ओकरे मन में ई सवाल उठल, ‘हम बिरथे में एतना दिन से भूत खोजत रहलिन. ऊ बा कहां?’


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