(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

नवीं कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
सावन का बरखा में राधा में मोहन के रसे रसे बरसल. फेर राधा रुपी धाना के बिआह आन गाँवे होखल, मोहन के अपना गवनई का चलते धीरे धीरे नाम कमात आ पइसा खातिर गावल. एकदिन संजोग से धाना से मुलाकात आ फेर शुरु भइल दुनु के इयारी. एही बीच नेताजी मोहन के अपना हर जलसा में ले जाये लगलन आ मोहना के धूम हर जगह देखे के मिले. अब ओकरा से आगे पढ़ीं …..


नेताजी चुनाव जीत गइलन त मोहन के एकर क्रेडीटे भर ना दिहले बलुक ओकरा के अपना साथे लखनऊओ लिवइले अइलन. आ मोहन के एगो नया नाम दिहले लोक कवि !

लोक कवि लखनऊ आ के बड़हन संघर्ष कइलन. फेर नाम आ पइसो खूब कमइले. लेकिन अपना सखी के ऊ ना भुलइले. एह बीच मौका बेमौका सखी से मिलत रहलन. नतीजतन सखी उनुका तीन गो बच्चा के महतारी बन गइली. एक बेर एह बाति के चरचा लोक कवि चेयरमैन साहब से चलवले त चेयरमैन साहब लोक कवि से पूछले, “त ऊ पहलवान सार का करत रहे ?”
“पहलवानी !”
लोक कविओ अइसना स्टाइल में कहले कि चेयरमैन साहब हँसत हँसत लोटपोट का, बेसुध जइसन हो गइलन.
बाद में सखी के पति पहलवान के माली हालत गड़बड़ाइल तो लोक कवि तब त सम्हरबे कइलन, बादो में हमेशा कुछ ना कुछ आर्थिक सहायतो करत रहले. आ साथही में सखीओ के “मदद” में रहलन. बहुत बाद में सखी के “मदद” कइल त भुला दिहले बाकिर उनुका, उनुका परिवार के आर्थिक मदद जवह बेवजह करत रहलन. इ काम लोक कवि कबो ना भुलइले. पहिले पइसा कौड़ी ले के खुदे पहुँचत रहले बाद में केहु ना केहु से भिजवावे लगले. कहसु कि, “अरे, उहो आपने परिवार हऽ.” इहाँ तक कि सखी के बेटन का बिआहो में शामिल भइले आ धूमधाम से शामिल भइले. खरव बरच कइले. अब जइसे लोक कवि नाती पोता वाला हो चलल रहले वइसहीं सखीओ नाती पोता वाली हो गइल रहली. बलुक सखी के परिवार त लोको कवि का परिवार से पहिले एह सुख वाला हो गइल रहे.
अब उहे सखी, मोहन के सखी, राधा मोहना के मीठ इयाद बोवत लोक कवि के परीछत रहली, पूरा मन, जतन अउर जान से. लोक कवि बुदबुदात रहले, “सखी !” आ सखी कहत रहली, “बड़ा उजियार कइले बाड़ऽ आपन आ अपना गाँव के नाम ए मोहन बाबू !” लेकिन लोक कवि गदगद रहले. सखी के परीछन से. ढेरहन औरतन का संसर्ग से गुजर चुकल लोक कवि के तमाम औरतन के भुला जाये के आदत बा बाकिर कुछ अइसनो औरत बाड़ी स लोक कवि का जिनिगी में जिनका के ऊ ऊ ना भुलासु ! भुलाइल चाहबो ना करसु. सखी, पत्नी, आ मिसिराइन अइसने औरतन में के तीन गो औरत रहली. एहमें से पहिला नम्बर पर रहली सखी. धाना सखी. राधा मोहना के नाम से कबहू का, अबहियो जानल जाये वाली सखी. लोक कवि के कभी का, अबहियो जिनिगी देबे वाली सखी. ऊ सखी जिनका विरह में लोक कवि के पहिला ओरिजिनल गाना फूटल रहे, “आवऽ चलीं सखी ददरी क मेला, आ हो धाना !”
ऊ सखी जे लोक कवि के जवानी के पहिलका भूख पियास मिटवले रहली. जे लोकलाज के परवाह छोड़ उनुका जिनिगी के ना सिरिफ पहिलका औरत बनली बलुक उनुका पहिला बेटा के महतारिओ बनली. भलही ओह बेटा के ऊ आपन नाम सामाजिक मर्यादा का चलते ना दे पवले, बाकिर समाज त जानेला, गुपचुपे सही. ऊ सखी जे कबहु उनुका से कुछ ना मँगली, कबो डिमांडिग ना बनली, कवनो तकलीफ के गिरह, कवनो परत खोल के ना बतवली. खुद पिअत गइली सगरी तकलीफ, मुश्किल आ अपमान. ऊ ऊंच जाति के होखला का बादो, उनुका बनिस्बत समृद्ध होखतो एह गरीब से आँखि लड़वली. ऊ सखी, ओह प्यार में नहाइल सखी के, जे एहू उमिर में अफनात चलि आइल बाड़ी, बिना सोचले कि बेटा, बहू, नाती, पोता भा ई गाँव, ई समाज कवनो पुरान गाँठ खोल के ओकरा पर तोहमतो लगा सकेला ! लोक कवि अबही अबही खुदे देखले ह कि उनुकर प्यारी भउजाई, जे सबले पहिले उनुका के परीछे अइली, सखी के देखते कइसन त मुँह बनवली आ आँख टेढ़ कर लिहली. दोसरो औरत सखी के ओही रहस्य से देखली त सखी त सकुचइली बाकिर लोक कवि लहक गइलन. गनीमत कि केहु साफ तौर पर कुछ ना कहल आ बात आइल गइल हो गइल. तबहियो सखी परीछत बाड़ी लोक कवि के, पूरा लाज से आ लोक मर्यादा के निबाहत. आ लोको कवि आँखिन में ओही मर्यादा के भाव लिहले देखत बाड़े सखी के बिना पलक झपकवले. सखी एक बेर अउरी परीछले रहली मोहन रुपी एही लोक कवि के. तब जब मोहना बियाह करे जात रहल, तब जब सखी के बियाह हो चुकल रहे. लोक कवि अपलक देखत बाड़न सखी के बेआवाज ! आ लोक कवि के एह देखला के देखत बाड़े चेयरमैन साहब, ठकुआइल !
“परीछते रहबू कि केहू दोसरो के परीछे देबू ?” कहत बाड़ी भउजी तंज में आ के सखी से. आ सखी बाड़ी कि गावत गावत लोढ़ा फेरा अउरी घुमा देत बाड़ी लोक कवि का चेहरा पर, “मोहन बाबू के परीछबों !” आ चलत चलत उनुका गाल पर दही रोली मल देत बाड़ी.
“ई गाँव के बेटी हई कि दुलहिन हो ?” लोक कवि के एगो भउजाई टाइप बुढ़िया ई सब देखि के फुसफुसात बाड़ी.
“ना दुलहिन, ना बेटी. इन हईं राधा” एगो दोसर भउजाई जोड़त बाड़ी, “मोहन के राधा.”
एगो दोसर भउजाई खुसफुसात सबका के डपटत बाड़ी, “चुप्पो रहबू !” गरज ई कि कहीं रंग में भंग मत पड़ि जाव.
ई सगरी बात आ परीछन के दृश्य देखि के चेयरमैन साहब तनिका भावुक होत बाड़े तबहियो लोक कवि से ठिठोली फोड़त नइखन भुला. पूछत बाड़े, “का रे, ई ४४० वाली रहलि का ?” बाकिर तनी धीरे से.
“हँ, हँ !” मुसुकात लोक कवि धीरे से कहत हाथ जोड़ लेत बाड़न चेयरमैन साहब से आँखेआँख में इशारो करत बाड़े कि “बस चुपो रहीं !”
“ठीक बा, ठीक बा ! तें मजा ले !” कहिके चेयरमैनो साहब लोक कवि से हाथ जोड़ लेत बाड़न.

तनिका देर में औरतन के कार्यक्रम खतम हो गइल. सचमुच में खतम त तबहिये हो गइल रहल जब सखी परीछल बंद कर दिहले रही. बाकिर अब बाकायदा खतम हो गइल रहे. औरतन का बाद अब मरदन के लोक कवि से मिलल जुलल शुरु हो गइल रहे. लोक कवि के खुशी के ठिकान तब अउर ना रहल जब देखलन कि सखि के पति पहलवानो आइल बाड़े.
“आईं पहलवान जी !” कहि के लोक कवि उनुका के अँकवारी भर लिहले.
“असल में औरतन के कार्यक्रम चलत रहल त हमनी का तनी दूरे खड़ा रहनी ह”, पहलवान जी सफाई दिहले.
“ई पहलवान जी हईँ, चेयरमैन साहब !” कहिके लोक कवि उनुकर परिचय करवलन आ आँखि मरलनकि मजा लींही लेकिन साथही इहो इशारा कइले कि “कवनो खराब टिप्पणी करि के गुड़-गोबर मत करीं.”
मिलल जुलल जब खतम भइल आ धीरे-धीरे भीड़ छँटे लागल त लोक कवि अपना दुनु भाईयन के बोलववले. लेकिन एगो के त चेयरमैन साहब दस हजार रुपिया दे के लड्डू ले आवे खातिर भेज चुकल रहले. त सिर्फ एक जने अइले, “हँ भईया !” कहत.
ऊ ओकराके एक किनारा ले जा के कहले, “देखऽ, हमरा के आजु पाँच लाख रूपिया मिलल बा !”
“इनाम में ?” लोक कवि के बात काटत छोटका भाई पूछलसि.
“ना रे, सम्मान में !” लोक कवि बात शुरू कइले त ऊ फेर बोल पड़ल, “अच्छा अच्छा !” त लोक कवो ओकरा के डपटत कहले, “पिकिर-पिकिर जिन कर. पहिले पूरा बाति सुन ले.”
“भईया !” कहत ऊ फेर बोल पड़ल.
“कहीं कवनो खेत तजबीज करऽ. खरीदे खातिर.” लोक कवि कहले, “झगड़ा-झंझट वाला ना होखे. एक साथ पूरा चक होखे.”
“ठीक भइया !”
“रजिस्ट्री कराएब तीनो भाईयन का नाम से !” लोक कवि गदगद हो के बोललन.
“ठीक भइया !” भाईओ ओही गदगद भाव से छलकल.
साँझ होखे चलल रहे लेकिन लड्डू आ गइल रहे आ गाँव में बँटाये लागल रहे. चेयरमैन दहाड़त रहले, “केहू छूटे ना. लड़िका-सयान सभका के बाँटऽ. बाँच जाय त बगल वाला गाँवो में बँटवा दऽ.”
पूरा गाँव लड्डू खात रहे लोक कवि के चरचा में डूबल. हँ कुछेक घर आ लोग अइसनो रहले जे ई लड्डू ना लिहले. ऊ लोग लोक कवि पर भुनभुनात रहे, “भर साला लड्डू बँटवावत बा.” एगो पंडित जी त खुलेआम बड़बड़ात रहले, “बताईं, एह गाँव में एक दू ठो क्रांतिकारिओ भइल बाड़े. केहू ओह लोग के नाम लेवईया नइखे ! बाकिर हई नचनिया-पदनिया के आरती उतारल जा रहल बा. पाँच लाख रुपिया मुख्यमंत्री देत बा. सम्मान कर के.” ऊ बोलत रहले, “उहो साला अहिर इहो साला भर ! जनता के गाढ़ कमाई साले भाड़ में डालत बाड़े आ केहू पूछेवाला नइखे.” केहू टोकबो कइल कि, “चुप्पो रहीं !” तऊ अउरी भड़कलन, “काहें चुप रहीं ? एह नचनिया‍-पदनिया के डर से ?”
“त तनी धीरे बोलीं !”
“काहें धीरे बोलीं जी ? एह नचनिया‍-पदनिया के हम लड्डू खइले बानी का ? कि सार के कर्जा खइले बानी ?” कह के ऊ अउरी जोर से बोले लगले. पंडित जी के बात खुसुर‍-फुसुर में लोको कवि ले चहुँपावल गइल. त लोक कवि चेयरमैन साहब के बतवले.चेयरमैन साहब चिन्तित होत कहले, “ऊ पंडितो ठीके बोलत बा. लेकिन गलत समय पर बोलत बा.” फेर चेयरमैन साहब लोक कवि के तुरते आगाहो कर दिहले कि, “कह दऽ कि कवनो रिएक्शन ना. पंडित के जबाब में केहू कुछ ना बोली.”
“काहें साहब ? हमनी का केहू से कम बानी जा का !” लोक कवि के भाई बिदकत कहलसि.
“कम नइखऽ बेसी बाड़ऽ. एहीसे चुप रहऽ सभका के चुप राखऽ !” चेयरमैन साहब लोक कवि से मुखातिब होत कहले,”तू त जानते बाड़ऽ. देश में मंडल‍-कमंडल चल रहल बा. अगड़ा‍-पिछड़ा चलत बा त कहीं बात बढ़ के बिगड़ गइल त तोहार सगरी सम्मान माटी में मिल जाई. से लड़ाई रोकऽ.” चेयरमैन साहब समुझावत कहले,”पंडित गरियावतो बा त चुपचाप पी जा.”
बात लोक कवि का समझ में पूरा तरह आ गइल आ ऊ सभका के हिदायत दे दिहलन कि, “केहू जबाब मत देव.” अतने ना, बात आगा जिन बढ़ो से एही गरज से खुदे पंडित जी का घरे जा के “पाँ लागी” कहत उनुकर गोड़ छूवले. पंडित जी पिघल गइले. लोक कवि के असीसे लगलन,”अउरी नाम कमा, खूब यश कमा, गाँव‍-जवार के नाम बढ़ावऽ !” बाकिर लगले हाथ आपनो बात कह दिहले,”सुनी ला कि मुख्यमंत्री के तू बहुते मुँहलगा हउवऽ ?”
“अपने के आशीर्वाद बा पंडित जी.” कहत लोक कवि विनम्र भइलन आ फेर उनुकर गोड़ छू लिहले.
“त ओकरा से कहि के गाँवो के कुछ भला करा दऽ.” पंडितजी कहलन, “गाँव में दू ठो क्रांतिकारी भइल बाड़े. धुरंधर क्रांतिकारी. ओह लोग के स्मारक, मूर्ति बनवावऽ.” ऊ कहत गइले,”कि खाली नचनिये‍-पदनिये एह सरकारमें सम्मान पइहें ?”
पंडित जी के ई बाति सुन के लोक कवि तनी विचलित भइले. कुछ बोलतन कि चेयरमैन साहब लोक कवि के कान्ह दबा के चुप रहे के इशारा दिहले. लोक कवि चुपे रहले. बोलले ना. लेकिन पंडित जी बोलत जात रहले, “गाँव में प्राइमरी स्कूल बा. पेड़ का नीचे मड़ई में चलेला. ओकर भवन बनवा द. प्राइमरी स्कूल के मिडिल स्कूल बनवा द. सड़क ठीक करवा द. सरकारी मोटर चलवा द. अउरियो जवन करि सकत होखऽ तवन करवा द. गाँव में नवही बेकार घूमत बाड़न सँ, ओकनी के नौकरी, रोजगार दिलवा द !”
“ठीक बा पंडित जी.आशीष दीं.” लोक कवि पंडित जी के फेर गोड़ छूवले आ कहलन कि, “कोशिश करब कि रउरा हुकुम के पालन हो जाव !”
“तोर नचनिया‍-पदनिया के बात मानी मुख्यमंत्री ?” पंडित जी फेर ना मनले आ घूम‍-फिर के अपना पुरनके बाति पर आ गइले. लेकिन लोक कवि भितरे‍-भीतर सुलगत उपर से मुसुकात चुपचाप खाड़ रहलन. फेर पंडित जी जइसे अपने सवाल के खुदही जबाब देत कहले,”का जाने, मुख्योमंत्री साला अहिर ह, नचनिये‍-पदनिये का सलाह से सरकार चलावत होखे. पढ़ल‍-लिखल लोग, पंडित लोग ओकरा कहाँ भेंटइहें ” बोलत‍-बोलत पंडित ही फेर पूछे लगलन लोक कवि से कि,”सुनले बानी तोर मुख्यंमंत्री पंडित से बहुते चिढ़ेला, बड़ा बेइज्जत करेला ?” ऊ तनी रुकलन आ पूछे लगले, “सही बात बा ?” केहू कुछ ना बोलल त उहे बोलले, “तुँहू त ओही जमात के हउवऽ. तुहूँ उहे करत होखबऽ ?” फेर ऊ हँसे लगले,”हमरा बात के खराब जिन मनीहऽ. बाकिर समाज अइसने हो गइल बा. राजनीतिये अइसन हो गइल बिया. केही करबो करे त का करी ?” ऊ कहले, “बाकिर हमरा बाति पर रिसिअइहऽ जिन, पीठ पाछा गरियइहऽ जिन. बाकिर गाँव खातिर कुछ करवा सकऽ त करवइहऽ जरूर” ऊ फेर बोलले,”का जाने नचनिये‍-पदनिये से एह गाँव के उद्धार लिखल होखे !” कहि के ऊ फेर से लोक कवि के ढेर‍-सगरी आशीष, कामना वगैरह के बौछार कर दिहलन. बिलकुल खुला मन से. लेकिन बीच‍-बीच में नचनिया‍-पदनिया के पुट दे‍-दे के !
“ब्राह्मण देवता के जय !” कहि के लोक कवि फेर पंडित जी के गोड़ छूवले.

पंडित जी किहाँ से निकलि के लोक कवि चेयरमैन साहब का साथे गाँव में दू चार अउरियो बड़का लोग का घरे गइलन. कुछ अउरीओ पंडितजी लोग किहाँ. फेरु बाबू साहब लोग किहाँ. बाकिर पंडित जी लोग में से कुछ लोग खुला मन से, कुछ आधा मन से, आ कुछ लोग बूताइले मन से सही बाकिर लोक कवि के स्वागत कइल, आशीष दिहल. लेकिन अधिकतर बाबू साहब लोग किहाँ लोक कवि के नोटिस ना लिहल गइ. ओह लोग का घर के नौकरे सा भा लड़िकने से मिल के लोक कवि अपना कर्तव्य के इतिश्री कर लिहले. हँ एगो बाबू साहब आधे मन से सही लोक कवि के सम्मानित होखे के बधाई दिहल, आ कहलन कि,”अब त तोहार बड़ नाम हो गइल बा. सुनत बानी जे लखनऊ में पइसा पीटत बाड़ऽ !”
“सब राउर आशीर्वाद बा.” कहि के लोक कवि बबुआन टोला से निकल अइले. कुछ पहलवान-अहीरो लोग का घरे गइलन जहाँ उनुकर मिलल-जुलल आ भाव-विभोर स्वागत भइल. अपना बचपन के कुछ संघतियो लोग के खोज-हेर के लोक कवि भेंट कइले. उनुकर एगो हमउमरिया फेर चिकोटी लिहलसि, “सुननी ह गुरु कि रधवा फेर गाँवे आइल बिया आजु ?”
“कवन रधवा ?” लोक कवि टरलन त ऊ लोक कवि के हाथ दबावत कहलसि,”भुला गइलऽ राजा धाना के !”
लोक कवि कुछ कहले ना, मुसुका के टार गइले.
लोक कवि वापिस अपना टोला में आ गइले. अपना समाज में, जहाँ उनुकर स्वागर लोग दिल खोल के पहिलहू कर चुकल रहे, फेर करत रहे.
“पा लागी, पा लागी” करत हाथ जोड़त लोक कवि सभका दरवाजा पर गइलन. जेहसे केहू कहे वाला ना रहि जाव कि “हमरा घरे ना अइलऽ ?”
गदबेरा होत आवत रहे आ रात अपना आवे के राह बनावत रहे. चेयरमैन साहब लोक कवि से साफ-साफ पूछलन कि “रूकब एहिजा कि चलबऽ लखनऊ ?
“लखनऊ चलब. का करब एहिजा रुकि के ?” लोक कवि कहले, “जे कहीं हमरा रहला से मंडल-कमंडल खड़खड़ा गइल त बड़ी बेइज्जति हो जाई.”
भाईयन आ बाकि परिवार जनो लोक कवि के रात में रुके के कहले. अहिर टोल से खास सनेस आइल कि सगरी लठैत आ बंदूकधारी पहरा दीहें. कवनो डकैत-चोर लोक कवि के पाँच लाख रुपिया छू ना पाई. आजु रात ऊ बेधड़क गाँव में रुकसु.
“सवाल पइसा चोरी भा डकैती हो जाये के नइखे.” लोक कवि भाईयन आ परिवारवालन से बतवलन कि,”ऊ त चोर डकैत अइसहूँ ना छू पइहे काहे कि ऊ चेक में बा, नगद नइखे. बाकिर गइल जरुरी बा. काहें से कि लखनऊ में कुछ जरुरी काम बा. ओहिजो लोग अगोरत होई.”
कुछ लोग गाँव में जानल चाहल कि “चेक में” के का मतलब ? का कवनो नया तिजोरी निकलल बा ? लोक कवि हँसत हँसत लोगन के समुझवले कि,”नाहीं, कागज हऽ.” आ ओकरा के देखइबो कइलन.
त गाँव में एगो चरचा इहो चलल कि मुख्यमंत्री सरकार का ओर से लोक कवि के पुरनोट लिख के दिहले बाड़े. एगो बुजुर्ग सुनले त कहले, “त अइसे ! अरे बड़ा रसूख वाला हो गइलबा मोहना !”
चले का समय लोक कवि एक बेर फेर धाना का घरे गइलन. धाना आ धाना के मरद से भेंट करे. फेर निकल पड़लन ऊ गाँव से, डीह बाबा के हाथ जोड़त, गाँव का लोग आ सिवान के प्रणाम करत.
शहर चहुँप के चेयरमैन साहब शराब खरीदलन, साथ में कुछ खाये के लिहलन आ पानीओ के बोतल खरीद के लोक कवि का साथे खात-पियत चल दिहलन लखनऊ का ओर. लाल बत्ती वाला कार में. लोक कवि के कार, चेयरमैन साहब के एम्बेसडर, आ बाकी दुनु कार संगी साथियन के बइठवले पाछा-पाछा आवत रहे.
रास्ता में जब लोक कवि दू पेग पी चुकलन त बोललन, “चेयरमैन साहब, ई बताईं कि हम कलाकार हूं कि नहीं ?”
“त का भिखारी हउव ?” चेयरमैन साहब लोक कवि के सवाल के मर्म जनले बिना बिदक के कहले.
“त कलाकार हईं नू ? ” लोक कवि फेर बेचारगी में बोलले.
“बिल्कुल हउवऽ.” चेयरमैन साहब ठसका का साथ कहले. “एहू में कवनो शक बा का ?”
“तब्बे नू पूछट बानी.” लोक कवि एकदम असहाय हो के कहले.
“तहरा चढ़ गइल बा. सूत जा.” चेयरमैन साहब लोक कवि का माथा पर थपकी देत कहले.
“चढ़ल नइखे, चेयरमैन साहब !” लोक कवि तनी ऊँच आवाज में कहले, ” त ई बताईं कि हम कलाकार हईं कि नचनिया-पदनिया ?”
“धीरे बोल साले ! हम कवनो बहिर हईं का कि चिचिया के बोलत बाड़े.” ऊ कहले, “पंडितवा के डंक तोहरा अब लागत बा ?” ऊ लोक कवि का ओर मुँह करके बोलले. “कवनो अंडित-पंडित के कहला से तू नचनिया-पदनिया ना हो जइबऽ. कलाकार हउवऽ कलाकार रहबऽ. ऊ पंडितवा साला का जाने कला आ कलाकार !” ई तुनकलन, “हम जानत बानी कला आ कलाकार. हम कहत बानी तू कलाकार हउवऽ. आ हमही का, कला के सगरी जानकार तोहरा के कलाकार मानेले. भगवान,प्रकृति तोहरा के कला दिहले बाड़े.”
“से त ठीक बा.” लोक कवि कहले,”बाकिर हमार गाँव आजु हमरा के हमार औकात बता दिहलसि. बता दिहलसि कि हम नचनिया-पदनिया हईं.”
“राष्ट्रपति का साथे अमेरिका, सूरीनाम, फिजी, थाईलैण्ड जाने कहाँ कहाँ गइल बाड़ऽ. गइल बाड़ऽ कि ना ?” चेयरमैन साहब तल्ख हो के पूछले.
“गइल बानी.” लोक कवि छोटहन जबाब दिहले.
“त का गाँड़ मरावे गइल रहलऽ कि गाना गावे ?”
“गाना गावे.”
“ठीक” चेयरमैन साहब कहले, “कैसेट तोहार बाजार में बा कि ना ?”
“बा.”
“तोहार सरकारी गैरसरकारी कार्यक्रम होत रहेला कि ना ?”
“होला.”
“मुख्यमंत्री तोहरा के आजु सम्मानित कइलन ह कि ना ?”
“कइले हँ, चेयरमैन साहब !” लोक कवि आजिज आ के कहले.
“त फेर काहें तबसे हमार मरले बाड़ीस ? सगरी नशा, सगरी मजा खराब करत बाड़ऽ तबहिये से.” चेयरमैन साहब तनिका प्यार से लोक कवि के डपटत कहले.
“एह नाते कि हम नचनिया-पदनिया हईं.”
“देखऽ लोक कवि, मारे के बा त जा के ओह पंडितवा के मारऽ जवन तोहरा के ई नचनिया-पदनिया के डंक मरले बा. हमरा के बकसऽ !” चेयरमैन साहब बात जारी रखले, “अच्छा चलऽ. ऊ पंडितवा तोहरा के नचनिया-पदनिया कहिये दिहलसि त ओकर माला काहे जपले बाड़ऽ ?” ऊ कार का खिड़की से सिगरेट के राख झाड़त कहले, “फेर नचनिया-पदनिया कवनो गारी त ह ना. आ फेर तूही बतावऽ, का नचनिया-पदनिया आदमी ना होला ” आ इहो बतावऽ कि नचनियो कलाकार का खाता में आवेला कि ना ?” चेयरमैन साहब बिना रुकले बोलत जात रहले, “फेर तू जवन आर्केस्ट्रा चलावत-चलवावेलऽ ऊ का हऽ ? त तुहू नचनिया-पदनिया भइलऽ कि ना ?”
“बड़का जाति वाला लोग अइसन काहे सोचेला ” लोक कवि हताश हो के कहले.
“रे साला, तू कहल का चाहत बाड़ऽ? का हम बड़का जाति वाला ना हईं ? राय हईं आ तबहियो तहरा गाँड़ का पाछा-पाछा घूमत बानी. त केहू हमरो के त नचनिया-पदनिया कहि सकेला. आ केहू कहिये दी त हमरा खराब काहे लागी ? हम त हँस के मानि लेब कि चलऽ हमहू नचनिया-पदनिया हईं.” ऊ बोलत गइले, “एह बाति के गाँठ बान्हि के बा त बान्हऽ बाकिर दिल में मत बान्हऽ.”
“चलीं रउरा कहत बानी त अइसने करत बानी”
“फेर देखऽ. लखनऊ में भा बाहरो कहीं तोहरा के जाति से तौल के त ना देखल जाला ?” ऊ कहले,”ना नू देखल जाला ? त ओहिजा त बाभन, ठाकुर, लाला, बनिया, नेता, अफसर, हिंदू, मुसलमान सभे तहरा के कलाकारे नू देखेला. तोहरा जाति से त तोहरा के केहू ना आँके. बहुते लोग त तहार जाति जानबो ना करे.”
“एही से, एही से.” लोक कवि फेर उदास हो के कहले.
“एकदमै पलिहर हउवऽ का ?” चेयरमैन साहब कहले, “हम छेद बन्द करे में लागल बानी आ तू रहि-रहि के बढ़वले जात बाड़ऽ. हमरा से कुछ अउरी कहवावल चाहत बाड़ऽ का ?”
“कहि देईं चेयरमैन साहब. आपहूं कहि देईं.”
“त सुनऽ. हई मुख्यमंत्री आ ओकर समाज जे तोहरा के यादव-यादव लिखऽता पोस्टर आ बैनर पर आ अनाउंस करऽता यादव-यादव, त ई का हऽ ?” ऊ कहले, “एह पर त तोहार गाँड़ नइखे पसीजत ” काहें भाई ? तू साँचहू यादव हउवऽ का ?”
“ई बाति के चरचा जनि करीं चेयरमैन साहब.” हाथ जोड़त लोक कवि बोलले.
“त तू एकर विरोध काहें ना करेलऽ, एकहू बेर ?” ऊ कहत रहले, “ई बाति खराब ना लागे तोहरा आ नचनिया-पदनिया सुन लिहला पर खराब लाग जात बा ! डंक मार देत बा. अतना कि पूरा रास्ता खराब कर दिहलऽ, सगरी दारू उतार दिहलऽ आ अपना अतना बड़ सम्मान के सूखा दिहलऽ. अउर त अउर अपना ४४० वोल्ट वाली सखी से बरीसन बाद भइल मुलाकात के खुशीओ राख कर लिहलऽ !”
सखी के बात सुन के लोक कवि तनी मुसुकइले आ उनकर गम तनी फीका पड़ल. चेयरमैन साहब कहत रहले, “भूला द ई सब आ लखनऊ चहुँप के खुशी देखावऽ, खुश लउकऽ आ काल्हु एकरा के जम के सेलिब्रेट करऽ आ करवावऽ. कवनो छमक छल्लो बोला के भोगऽ !” कह के चेयरमैन साहब आँख मारत मुसुकइले आ दोसर सिगरेट जरावे लगलन.


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

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