(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

एगरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
गाँवे से लवटि के लखनऊ चहँपलो पर लोक कवि के शानदार स्वागत भइल. सम्मान मिलला का बाद लोक कवि के भाव अउरियो बढ़ि गइल रहे आ लोक कवि के बिहारो के यादव मुख्यमंत्री दू लाख रुपिया के पुरस्कार दे दिहले. आ यादव ना रहला का बावजूद लोक कवि के पूरा जिनिगी यादवने का कृपा से चलत रहे. अब पढ़ीं आगा के कहानी…..


जवने रहे बाकिर अब लोक कवि के चांदी रहुवे. बलुक कहीं कि उनुकर दिन सोना के आ रात चानी के हो गइल रहे. जइसे जइसे उनुकर उमिर बढ़ल जात रहे, लड़िकियन के व्यसनो उनुकर बढ़ल जात रहे. पहिले कवनो लड़िकी उनुकर पटरानी बन के महीनन का साल दू साल ले रहत रहे बाकिर अब महीना, दू महीना, चार महीना, बेसी से बेसी छह महीना में बदल दिहल जाव. केहू टोकबो करे त ऊ कहसु, “हम त कसाई हईं कसाई.” ऊ आगा जोड़सु, “बिजनेस करीला बिजनेसवाला हईं, जवन जतना बेचाले ओतना बेचीले. कसाई मांस ना काटी बेची त खाई का ?”

पता ना काहे ऊ दिन-ब-दिन कलाकारन ला निर्दयीओ बनल जात रहले. पहिले उनुकर छांटल, निकालल कलाकारन में से कुछ लोग मिल जुल के साल दू साल में एक दू गो टीम अलग-अलग बना के गुजारा कर लेत रहे. लोक कविओ उनुका के टीम से भलही अलग कर देत रहले लेकिन अपना गानन के गावे से मना ना करत रहले. त उ नयका टीम अलगा भलही रहत रहे लेकिन रहत रहे लोक कवि के बी टीम बनिये के. लोके कवि के गाना गावत बजावत, लोक कवि के मान सम्मान करत.

बाकिर अब ?

अब त हर तीसरे चौमासे लोक कवि के छंटनीशुदा कलाकार एक दू गो टीम बना लेस. गावस-बजावस लोके कवि के गाना बाकिर उनुका के गरियवला का अंदाज में. शायद एहू चलते कि ई लोग एक त मेच्योर ना होत रहे, दोसरे ओह लोग के लागे कि लोक कवि उनुका साथे अन्याय कइले बाड़े. एहमें से कईजने त ईहाँ ले करसु कि गावस-बजावस सब लोके कवि के गाना पर गाना का आखिर में जहां लोक कवि के नाम आवे, ओहिजा आपन नाम लगा दिहल करसु. गोया कि ई गाना लोक कवि के लिखल ना, ओह कलाकार के आपन लिखल ह, जे गा रहल बा. कबो कभार ओरहन चहुँपावे का अंदाज में ई बात लोग लोक कवि का कानो तक चहुँपावल करे कि, “देखीं, अब फलनवो रउरा गाना में आपन नाम ठूंस के गावत बा.” त ई सब सुन के लोक कवि या त चुप लगा जासु भा बिना खिसियइल कहसु, “जाये दीहीं, खात कमात बा, खाये कमाये दीहीं !” ऊ कहसु, “मंचे पर नू गावऽता, कैसेट में नइखे नू गावत ? अरे जनता जानत बिया कि कवन गाना केकर ह. परेशान जिन होईं. ” ओरहन ले के आइल लोग के ऊ लगभग एही तरह चुप करा देसु.

आ अब त हद ई होखे लागल कि जवने कलाकार के लोक कवि आपन मैनेजर बनावसु उहे ना सिरिफ उनुका कलाकारन के तूड़ देव, बलुक उनुका पइसा रुपिया के हिसाबो में लमहर घपला कर देव. बात एहिजे ले रहीत त गनीमत होखीत, कई बेर त ऊ मैनेजर घपला कर के लोक कवि के कईगो सरकारी कार्यक्रमो चाट जाव. आ कई बेर पोरोगराम लोक कवि करसु बाकिर पेमेंट कवनो अउरे बैनर के नामे हो जाव जे आड़े तिरछे लोक कवि के मैनेजर के बैनर होखल रहे !

परेशान हो जासु लोक कवि अइसन घपल देख-देख के, भुगत-भुगत के ! ऊ पछतासु कि काहें ना ठीक से उहो पढ़ले लिखले. ऊ कहबो करसु कि, “ठीक से पढ़ल लिखल रहतीं त ई बदमाशी ना नू करीत कवनो हमरा साथे !”

नतीजा भइल कि उनुका इर्द-गिर्द अविश्वास के बड़-बड़ झाड़ झंखाड़ उग आइल रहे. ऊ अब जल्दी केहू दोसरा पर भरोसे ना करसु.

अविश्वास का ई उहे दौर रहल जब लोक कवि कभी कभार काफीओ हाऊस में बइठे लगले.

काफी हाऊस में लोक कवि का बइठलो हालांकि एगो शगले रहत रहे बाकिर बहुते दिलचस्प शगल. का रहे कि लोक कवि के पड़ोसी जनपद के एगो तपल तपावल स्वतंत्रता सेनानी रहले त्रिपाठी जी. ख़ूब लमहर, ख़ूब करिया. अपना समय के बड़का आदर्शवादी. एह आदर्शवादे का चलते शुरू-शुरू में त्रिपाठी जी देश के आजाद होखला का बादो, जब तमाम लोग चुनावी राजनीति के मलाई काटे लागल रहुवे, ऊ एकरा से फरके बनल रहले. तमाम फर्जी स्वतंत्रता सेनानी ना सिरिफ चुनावी बिसाते जीतले बलुक सरकार में मंत्रीओ बन गइले. तबहियो आदर्शवाद मे डूबल त्रिपाठी जी एह टोटकन से दूरे रहले. शुरू-शुरू में त सब कुछ चल गइल. बाद में दिक्कत बढ़े लागल. लड़िका फड़िका बड़ होखे लगले. पढ़ाई-लिखाई के खर्रचो बढ़े लागल. ऊ एक बेर हार थाक के एगो चीनी मिल मालिक का भिरी गइले जे उनुका के उनुकर आदर्शवादी राजनीति का चलते जानत रहल. आपन तकलीफ बतवलन. मिल मालिक सरदार रहे. देश भक्ति के जज्बो अबही ओकरा में बाचल रहुवे. त्रिपाठी जी के दिक्कत में ऊ सहारा दिहलसि आ कहलसि कि जबले उनुकर सगरी बच्चा पढ़ लिख नइखन जात तबले ओकनी के पढ़ाई-लिखाई के सगरी खरचा के जिम्मेदारी उनुके रही. आ सरदार जी त्रिपाठी जी खातिर एगो सालाना फंड तुरते फिक्स कर दिहले कंपनी के वेलफेयर फंड से. त्रिपाठी जी के लड़िकन के पढ़ाई सुचारू रूप से होके लागल. लेकिन जइसे-जइसे लड़िकन के उमिर बढ़त गइल, ओकनी के क्लास बदलत गइल, ओकनी के पढ़ाई के खरचो बढ़त गइल. लेकिन चीनी मिल के वेलफेयर फंड से लड़िकन के पढ़ाई ला मिले वाल फंड में कवनो बढ़ोत्तरी ना भइल.

इहे रोना एक दिन त्रिपाठी जी एगो दोसरा सरदार से रोवे लगलन. कहे लगलन कि, “पहिले चीनी मिल वाला सरदार आसानी से मिल लेत रहे, अब पचासन कर्मचारी बाड़े ओकरा से मिलवावे वाला. सगरी नया. कवनो हमरा के जानबेना करे जे हमरा के उनुका से मिलवा देव. मिलवा देव त बताईं कि भाई सारा खर्च, कापी किताब, फीस कहां से कहां निकल गइल लेकिन तोहर वेलफेयर फंड जस के तस बा !” जवना सरदार से ई रोना त्रिपाठी जी रोवत रहले ऊहो सरदार ट्रांसपोर्टर रहे आ ओह घरी ट्रक के टायरो के परमिट चलत रहे. त्रिपाठी जी के एगो आदत इहो रहे कि अकसरहा फउँकल करसु कि फलां मंत्री, फलां अफसर हमार चेला ह. से ट्रांसपोर्टर सरदार बोलल कि, “पंडित जी फलां मिनिस्टर त आप क चेला ह ?”
“हँ, हवे. बिलकुल हवे. ” त्रिपाठी जी पूरा ठसका से बोलले.
“त आप हमरा ला ट्रक के टायरन के परमिट के पक्का इंतजाम ओकरा से करवा दीं. ” सरदार बोला, “फेर हम अतना कुछ त बिटोरिये देब कि रउरा लड़िकन के पढ़ाई खातिर हर साल वेलफेयर फंड देखे के जरूरते ना पड़ी.”
“त ?”
“त का जाईं, रउरा परमिट ले आईं. बाकी इंतजाम हम करत बानी.”
त्रिपाठी जी छड़ी उठवले, गला खंखारले आ चहुँप गइले ओह चेला मिनिस्टर का लगे. ऊ बड़ा आदर सत्कार से त्रिपाठी जी के बईठवलन. फेर त्रिपाठी जी ने तनी घुमा फिरा के ट्रक के टायर के परमिट खातिर बात चला दिहले. उनुकर चेला मिनिस्टर बाति सुन के मुसुकाइल. कहलसि, “पंडित जी, रउरा लगे एगो साइकिल तकले त बा ना, उ ट्रक के टाय के का करब ?”
“पेट में डालब !” त्रिपाठी जी बम-बमा के कहले, “मिनिस्टर बन गइल बाड़ऽ त दिमाग ख़राब हो गइल बा. जानत नइखऽ कि ट्रक के टायर के का करब.”
मिनिस्टर त्रिपाठी जी से माफी मांगलन आ उनुका परमिट ख़ातिर आदेश दे दिहलन.
त्रिपाठी जी के काम बन गइल रहे.
लेकिन अब ई एगो काम एह तरह हो गइला से त्रिपाठी जी के मुंहे खून लाग गइल. अब ऊ अइसन काम खोजत चलसु आ कहत फिरु कि, “केहू के कवनो काम होई त बतइहऽ !” धीरे-धीरे त्रिपाठी जी दलाली खातिर मशहूर होखे लगले. एह फेर में ऊ फजिरही से घर छोड़ देसु आ देर रात घरे चहूँपसु. उनुकर पंडिताइन कबो कभार उनुका से दबल जबान से पूछबो करसु कि, “ए बड़कू क बाबू, आखि़र रउरा कवन नौकरीकरीले जे सबेरे के निकलल देर रात घरे आइले ?” ऊ अड़ोस पड़ोस के हवाला देत बतावसु कि, “फलांने फलांने क बाबू लोग एतने बजे जाला आ एतने बजे घर आइयो जाले ?” फेर ऊ पूछसु, “रउरा काहें सबसे पहिले जाइले आ सबले देर से आइले. आ फेर रउराकवनो छूट्टियो ना मिले. ई कवन नौकरी ह जे आप करीले !”
त्रिपाठी जी बेचाररू का बतऽवतन ? का ई बतऽवतन कि आदर्शवादी स्वतंत्रता सेनानी रहल तोहार ई पति अब दलाली खातिर घूमत रहेला, दिन रात एने-ओने ! ऊ पंडिताइन के घुड़पत एतने कहसु, “सूतऽ तू बुझबू ना !”
एक बार इहे त्रिपाठी जी लोक कवि के धर लिहलन. कहे लगलन, “सुनत बानी ई मुख्यमंत्री तोहार बाति बहुते मानेला. हमार एगो काम करवा द !”
“का काम हवे पंडित जी ?” गोड़ छूवत लोक कवि पूछले.
“बात ई बा कि बिजली विभाग के एगो असिस्टेंट इंजीनियर हवे ओकरे ट्रांसफर रोकवावल चाहऽतानी.” ऊ कहले, “तू तनी मुख्यमंत्री से कह दऽ, बात बनि जाई. हमार इज्जत रहि जाई !”
“लेकिन मुख्यमंत्री जी के त आपहू निमना से जानीले. आपही सीधे कह देब त आपहू के कहल टरिये त नाहीं.” लोक कवि कहले, “आपही कहि दीं !”
“अरे नालायक, अब तू हमरे के पहाड़ा पढ़ावे लगलऽ !” त्रिपाठी जी लोक कवि से कहले, “तू बात त ठीक कहऽतार. मुख्यमंत्री हमार बातो सुन लिहन. ” ऊ कहले, “हम कहनी त ऊ सुनबो कइलन आ कामो कइलना बाकिर कह दिहलन कि अब एह विभाग के दोसर कवनो काम मत ले आएब !”
“हम कुछ समुझनी ना त्रिपाठी जी !” लोक कवि साचहू कुछ ना समुझले रहन.
“त सुन अभागा कहीं का !” त्रिपाठी जी उतावली में बोलत गइले, “एह बिजली विभाग के एगो जूनियर इंजीनियर आपन ट्रांसफर रोकवावे खातिर हमरा के दस हजार रुपया दिहलसि. हम मुख्यमंत्री से कह दिहनी त रुक गइल ओकर ट्रांसफर. अब ओह जूनियर इंजीनियर के ऊपर हवे ई असिस्टेंट इंजीनियर. एकरो ट्रांसफर हो गइल बा. जब जूनियर इंजीनियर के ट्रांसफर रुक गइल आ एकरा पता चलल कि हम रोकववनी त ईहो हमरा लगे आइल. कहलसि बीस हजार रुपिया देब, हमरो ट्रांसफर रोकवा दीं.” त्रिपाठी जी अफनात कहले, “आ मुख्यमंत्रिया पहिलवैं मना कर चुकल हवे !” फेर ऊ आपन किस्मत के कोसे लगले. कहे लगले, “ईहो साला अभागा रहल. ओह जूनियर इंजीनियर से पहिले इहे सार भेंटा गइल रहीत त एकरे काम हो गइल रहीत आ हमरो बेसी पइसा मिलल रहीत !” कह के ऊ आपन माथ ठोंके लगले. लोक कवि से कहले, “कह सुनि के तूही करा द !”
लोक कवि त्रिपाठी जी के दिक्कत समुझले आ उनुकर पैरवी खुद त ना कइले बाकिर करवा दिहलन तब उनुकर काम !
एही त्रिपाठी जी के एगो अउरी शगल रहे. पुरान शगल. ऊ अकसर काफी हाऊस में बइठ जासु. काफी पियसु, कुछ खइबो करसु. अउर केहू जे आपन परिचित लउक जाव त ओकरो के बोला लेसु, खियावसु पियावसु. तब जब कि पइसा उनुका जेब में धेलो ना रहत रहे. तबो उनुकर आदत रहे जब तब काफी हाऊस में बइठल, लोग के बोला के खियावल पियावल. अइसे जइसे कि ऊ कवनो बड़हन नवाब भा धन्ना सेठ हउवें. ऊ लोग के बोलावसु, काफी पियावसु आ पूछसु, “कुछ खइबो करबऽ ?” आ जे ऊ हामी भर दिहलसि त ओकरा के खियइबो करसु. फेर ओकरा से पुछसु, “तोहरा लगे पइसा कतना बा ?” आ जे ओकरा लगे अबही तक के बिल के बराबर पइसा होखे त त्रिपाठी जी कह देसु, “बिल भर द !” अउर जे कहीं ओकरो लगे बिल भर के पइसा ना होखे तबहियो त्रिपाठी जी पर कवनो फरक ना पड़े, ना ही उनुका चेहरा पर कवनो शिकन आवे. ऊ ओही फराख़दिली से तब तक सबका के काफी पिआवत रहसु, कुछ ना कुछ खियावत रहसु, खात रहसु जबले केहू पूरा बिल जमा करे वाला उनुका काफी हाऊस में मिल ना जाव ! तबले ऊ खुदो ना उठसु, बइठल रहसु. एने-ओने के गपियावत रहसु. मजमा बन्हले रहुस. बेफिकिर ! काफी हाऊस के वेटर, मैनेजरो बेफिकर रहत रहले. उहो जानत रहले कि त्रिपाठी जी के खाता के पइसा डूबी ना. केहू ना केहू से त ऊ पेमेंट करवाइये दीहें. अइसनो पेमेंट करे वालन में लोको कवि रहले. आ अकसरहे. कई बेर त लोक कवि जान बूझ के काफी हाऊस का राहे जासु आ भीतर घुस के झाँक लेसु कि त्रिपाठी जी के चौपाल लागल बा कि ना. त्रिपाठी जी ना होखसु त लोक कवि ओहिजा से फौरन निकल लेसु. आ जे त्रिपाठी जी ओहिजा भेंटा जासु त लोक कवि जातही उनुकर गोड़ छू के “पालागी !” बोलसु. कहसु, “त्रिपाठी जी हमहू काफी पियब !”
“हँ, हँ, बिलकुल !” कह के त्रिपाठी जी, “लोको कवि ला काफी ले अइह भाई !” के हांक लगा देसु. लोक कवि जब काफी पी लेसु त त्रिपाठी जी ओही बेफिक्री से कहसु, “लोक कवि पइसा वइसा रखले बाड़ऽ कि बइठब ? केहू दोसरा के आवे के इंतजार कइल जाव !”
अकसर लोक कवि कहसु, “कहां पंडित जी हमारे पास पइसा कहां है ?” ऊ हंसत कहसु, “हमहू बइठब तनी देर रउरा लगे. अबहिये केहू ना केहू आ जाई. काहें फिकिर करऽतानी !”
“हमरा काहें के फिकिर. ” कहत त्रिपाठी जी अपने ठहाका में भुला जासु. आ उनुकर पूरा महफिल. फेर धीरे से लोक कवि वेटर के बोला के सगरी बिल चुकता कर देसु. अइसही ओह साँझ काफी हाऊस में बइठल लोक कवि त्रिपाठी जी के ठहाकन के काफी के साथ पियत गप सड़ाका में लागल रहले कि उनुका एगो अइसन सूचना मिलल कि मिलते उनुका के ठकुआ मार दिहलसि. हरदम का तरह ओह दिन काफी हाऊस के पेमेंटो ना कइलन आ “माफ करब त्रिपाठी जी. ” कहत उठ खड़ा भइलन.

लोक कवि के छोट भाई के एगो लड़िका के एड्स हो गइल रहल.
ढेरे दिन से ऊ बेमार रहुवे. इलाज करावत-करावत घर के लोग हार गइल रहले. हार के ओकर इलाज ला लोक कवि का लगे लखनऊ भेज दिहले रहले घर वाले. एहिजो इलाज बेअसर होत रहल. डाक्टर पर डाक्टर बदलइले बाकिर इलाज कारगर ना पावत रहे. थाक हार के लोक कवि अपना एगो कलाकार का साथे ओकरा के मेडिकल कालेज भेजले. ओहिजा शुरुआती जांच पड़ताल में डाक्टर के शक भइल त खून के टेस्ट करवावल गइल. एच.आई.वी. पाजिटिव निकलल. कलाकार रिपोर्ट जान के घबरा गइल. भागत-भागत लोक कवि का घरे गइल. ओहिजा ना भेंटइले त विधायक निवास वाला गैराज पर गइल, मिसिराइन किहां गइल, फेर खोजत-खोजत काफी हाऊस आइल. काफी हाऊस में लोक कवि भेंटा गइले. ऊ आव न देखलसि न ताव. बीच काफी हाऊसे में लोक कवि का कान में बता दिहलसि कि, “कमलेश के एड्स हो गइल बा. डाक्टर बतवलसि ह.”
ई सुनते लोक कवि झट से खड़ा हो गइलन. त्रिपाठी जी समेत अउरियो लोग घबरा के पूछबो कइल कि, “का भइल लोक कवि ?” लेकिन लोक कवि संयम बनवले रखले. कहले, “कुछउ ना, कुछ घरेलू बाति ह. ”
काफी हाऊस के बाहर निकलले आ ओह कलाकार के एक तरफ ले जा के गँवे से पूछले, “ओकरा मालूम हो गइल बा ?”
“केकरा ?”
“कमलेश के !”
“नाहीं गुरु जी !”
“त अबही बतइबो मत करीहऽ. ” लोक कवि बोलले, “केहू के मत बतइहऽ.”
“लेकिन गुरु जी कबले छुपावल जाई ?” कलाकार बोलल, “कबो ना कबो त पता चलिये जाई !”
“कइसे पता चल जाई ?” लोक कवि ओकरा के डपटत बोलले, “ओकरा के आजुवे इलाज खातिर बंबई भेज देतानी. ठीक हो जाई आ नाहीं त ओहिजे मर खप जाई.”
“के ले जाई ?”
“करत बानी कुछ इंतजाम. ” लोक कवि बोलले, “लेकिन ई बाति भूलाइयो के केहू के बतइहऽ जिन. ना त बड़हन बदनामी हो जाई. ” ऊ कहले, “इज्जत त जइबे करी मार्केटो चल का जाई डूबिये जाई. कहीं मुंह देखावे लायक ना रह जाएब. से बेटा बात अपने ले रखीहऽ.” लोक कवि ई बाति ओकरा से बहुते पुचकारत अउर ओकर पीठ ठोंकत बहुते मुलायमियत से कहले. फेर पाकिट से पांच सौ रुपए निकाल के ओकरा के देत कहले, “ल कुछ खर्चा-बर्चा रख ल. ”
“अरे नाहीं गुरु जी, एकर का जरूरत रहल. ” पइसा लेत, लोक कवि के गोड़ छूवत ऊ कहलसि.
“ई बतावऽ कि कमलेश कहां होखी एह घरी ?”
“घरही होखे के चाहीं भरसक !”
“ठीक बा तू चलऽ.” कह के लोक कवि रिक्शा लिहले आ बइठ के घरे चल दिहले. ऊ अतना हड़बड़ाइल आ घबराइल रहले कि एह अफरा तफरी में इहो याद ना रहल कि ओहिजा पासे में उनुकर कार मय ड्राइवर के खाड़ बिया. ख़ैर, ऊ घरे गइल. कमलेश पर ख़ूब बिगड़लन. ओकर बहुते लानत मलामत कइलन. लेकिन ना त घर वाले समुझ पावत रहले, ना ही कमलेशे के बुझात रहल कि आखि़र माजरा का बा ?
आखिर में उनुकर पत्नी बीच में कूदली कि, “आखि़र बाति का ह ? का गलती हो गइल ?”
“तू ना समुझबू, चुप रहव आ भीतर जा. ” लोक कवि खिसियइलन. बोलले, “बहुते बड़ पाप कइले बा. नाम डुबा दिहले बा परिवार के !”
“पाप ! परिवार के नाम डुबा दिहलसि !” लोक कवि के पत्नी बुदबुदइली, “का कह रहल बाड़ीं आप ?”
“कहनी नू कि तू भीतर जा !” लोक कवि पत्नी के डपटले.
“ई बेराम लड़िका, काहें डांटत बाड़ीं. ”
“तू जा भितरी !” अब की लोक कवि पत्नी पर गुर्रा के कहले. त ऊ अंदर चल गइली. तेज-तेज कदम से. लगभग दउड़त.
“तू फौरन आपन बोरिया बिस्तर बान्हऽ. ” कमलेश से लोक कवि बोलले.
“लेकिन त !” कमलेश सहमत-सहमत बोलल, “आखि़र त !”
“कवनो लेकिन, कवनो आखि़र वाखिर ना. ” लोक कवि भुनभुनइले. फेर बोलले, “तोहरा के अब अइसन बेमारी पकड़ लिहले बा कि एहिजा इलाज ना हो सके. ”
“त फिर ?”
“घबरा मत. ” लोक कवि कमलेश के पुचकारत कहले, “तोहार इलाज तबहियो कराएब. लेकिन एहिजा ना, बंबई में.” ऊ कहले, “जतना पइसा खरच होखी सब करब. लेकिन बंबई में, एहिजा ना.”
“लेकिन बीमारी का बा ?” कमलेश सहमत-सहमत बोलल.
“बेमारी के नाम बंबई के डाक्टर बताई. ” लोक कवि रुकले आ किचकिचात बोलले, “जब पाप करत रहल तब ना बुझाइल. अब बेमारी के नाम पूछत बा ?”
“कब जाए क बा बंबई ?” कमलेश तनिका कड़क होत पूछलसि.
“अबहिये आ तुरते ! अबही एगो कलाकार के भेजत बानी. ” लोक कवि बोलले, “बाद में तोरा बाप के भेजब.” कह के लोक कवि एगो कलाकार के बोलवले. कहले कि, “फौरन बंबई चले के तइयारी करऽ !”
“रिकार्डिंग बा कि कार्यक्रम, गुरु जी ?” खुश हो के कलाकार बोलल.
“कुछऊ नइखे. ” लोक कवि खीझियात कहले, “कमलेश के ओहिजा के अस्पताल में देखावे ले जाए के बा.” कह के लोक कवि कमलेश के पांच हजार रुपए दिहले आ कहले कि, “फौरन निकल जा आ ई डाक्टरी पर्चा, रिपोर्ट ओहिजा के अस्पताल के डाक्टर के देखइहऽ, ऊ भर्ती कर ली.”
“राउर नाम बता देब ?” कमलेश पूछलसि.
“केकरा के नाम बतइबऽ ?”
“डाक्टर के. ”
“का ओहिजा के डाक्टर हमार रिश्तेदार लागेला ?” लोक कवि भड़कले, “ओहिजा के जानी हमरा के ? कवनो लखनऊ ह का !” ऊ कहले, “केहू के हमार नाम, गांव मत बतइहऽ. चुपचाप इलाज करवइहऽ. ई डाक्टरी पर्चे सोर्स ह. देखते डाक्टर भर्ती कर ली.”
“कवना अस्पताल में भरती होखे के बा ?”
“जसलोक, फसलोक, टाटा, पाटा बहुते अस्पताल बाड़ी सँ. कतहीं भर्ती हो जइहे. ” ऊ घबरात कहले, “बाकिर हमार नाम कतहीं भूलाइहो के मत लीहे.” फेर लोक कवि ओह कलाकार के एगो कोना में ले जा के समुझवलनि कि, “एकरा के सम्हार के ले जइहऽ. अस्पताल में भर्ती करवा के चल अइहऽ. चपड़-चपड़ मत करीह.” कह के ओकरा के जाए आवे ख़ातिर किराया खर्चा कह के दिहलन आ कहले कि, “ओहिजा मौका पा के रंडियन का फेर में मत पड़ जइह.” कुछ रुकले आ फेर कहले, “आ एह कमलेशवो से रपटीहऽ, चपटही मत. एकरा बड़ा ख़तरनाक बेमारी हो गइल बा.”
“एड्स हो गइल बा का गुरु जी ?” कलाकार घबरा के बोलल.
“चुप साले !” लोक कवि बिगड़त बोलले, “तू डाक्टर हउव ?”
“ना गुरु जी. ” कह के कलाकार उनुकर गोड़ छूवलसि.
“त अंट शंट मत बकल करऽ. ” लोक कवि कहे, “तोहरा के आपन ख़ास मान के बंबई भेजत बानी.” ऊ रुकले आ बोलले, “ट्रेन में एकरा दिक्कत ना होखे एह खातिर तोहरा के साथे भेजत बानी. आ ओहिजा अस्पताल में एकरा के छोड़ के तू तुरते चल अइहऽ.” ओकर तुरते लवटल पक्का हो जाव एहला लोक कवि ओकरा के भरमइबो कइले, “रिकार्डिंग के तइयारी करे के बा आ एक दू ठो लोकल कार्यक्रमो बावे. एहसे डाक्टर फाक्टर के चक्कर में मत पड़ीह. तू फौरन ओही दिने ट्रेन पकड़ लीहऽ.”
“अच्छा, गुरु जी.” कह के ऊ रिक्शा बुलावे चल गइल. फेर रिक्शा से कमलेश के ले के स्टेशन चल दिहलसि.
एने लोक कवि अपना एगो बेटा के गांवे भेजलन कि ऊ कमलेश के बाप के लखनऊ बोला ले आवे. जेहसे समय से ओकरा के कमलेश का लगे बंबई भेजल जा सके. ऊ बुदबुदात रहले, “पता ना साला बाची कि मरी. अउर जे कहीं भेद खुल खुला गइल त हमार सगरी नाम, सगरी इज्जत माटी में मिला दी!” वह रुकले ना, बड़बड़इले, “अभागा साला !”


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
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