– डा॰ गोरख प्रसाद मस्ताना

लोर से भरल आँख अउरी मुँह पर पसरल उदासी साफ साफ झलका देला कि कवनो परानी दुख में केतना गोताइल बा. बेयाकुल चिरई के बोली में चहचहाहट ना होला, बस बुझवइया के समझला के फेर हऽ. एही लेखा-जोखा में नीतू के उदासी के पढ़े ला केहू के फुरसत ना रहे. बस रहली उनकर फुुआ जे नीतू के समझावत-बुझावत तोख बन्हावत रहली. बाकिर नीतू के जवन सुसुकी चढ़ल रहे, उ तऽ उतरे के नावे ना लेत रहे.

अबही सबेर के आठ बजल रहे. नीतू इस्कूल जाये के तइयारी में लागल रहली तबले उनका बाबू जी के कड़कदार बोली सुनाइल – ‘सुनऽ तारू नीतू के माई. कहाँ बाडू? कुछु सुनलू हऽ, लागत बा हमनी के नाम, इज्जत कुल्ह माटी में मिल जाई. तोहार बेटी नीतू इस्कूल में पढ़े नइखी जात बलुक हमनी के मरजाद के माटी में मिलावे जात बाड़ी.’
नीतू के माई धीरे से कहली, ‘बोली ना, का भइल हऽ? भोरे-भोरे एतना काहे रोसाइल बानी?’
‘तू रोसाइल कहत बाड़ू. हम जवना किरोध में बानी ओकरा के थामे के एके गो उपाय बा, नीतू के इस्कूल जाइल बन्द.’
नीतू के माई आवाक होके महेन्द्र बाबू, आनी कि नीतू के बाबूजी, के मुँह ताके लगली. अँचरा के तनिका माथ पर सरिआवत धीरे से पूछली, ‘आखिर का भइल हऽ जे नीतू पर एतना किरोध बा?’
‘त सुनऽ’, झनकत-पटकत महेन्द्र बाबू कहे लगले. ‘सूने के चाहत बाडू तोहार बेटी गाँव के एगो जूता बनावे वाला के बेटी सुरसतिया का सँगे ओकरे थरिया में बइठ के खिचड़ी खात रहे. उ त छोटका भाई के बचवा आके हमके बतवलस ना त हमहूँ कहाँ जनती? अब तू बताव कि इ नीतूआ पढ़े जात बिया कि जाति नसावे जात बिया. हम ए पढ़ावला लिखवला से बाज अइनी. आज ओहू सुरसतीया के डँटाई करब. चलल बिआ बरोबरी करे.’
नीतू के माई बड़ा धीरज वाली रहली. महेन्द्रर बाबू के समझावत बोलली – ‘देखी जी, नीतू कवनो बूढ़ नइखी नू, लइके नू बाड़ी, उनका केतना बुधिए बा जे जात-पात बुझस. हम उनका के समझा देहब. अब इस्कूल बा त लइका खेलबे करीहे सन.’
महेन्द्रर बाबू आँख लाल कइले कहलें – ‘खेले कूदे के मनाही नइखे नू,नान्ह जात के सँगे खाये के बात ना चली.’ एतना कहत उहाँ के नीतू के बोलवनी आ खूब डँटाई कइनी.

ना जानी आजुओे आदमी जात-पात, ऊँच-नीच के बन्हन में कबले बन्हाइल रही. समय के बदलत रंग-रूप के पढ़े से कबले भागत रही. एक ओरिया लोग चान पर जाये के तैयारी में बा त कुछु लोग अजहुँओ जातिए-पातिए के पढ़ाई में लागल बा. अब एमे ओकर अंहकार बा कि परिवारिक रूढ़ी, इ त उहे जानो. बाकिर नीतू के जवन रोआई आइल उहे सुसुकी चढ़ा देले रहे. माई समझा-बुझा के इस्कूली भेज दिहली. दू दिन त नीतू, सुरसती से तनिका फरका-फरका रहली, फेरू उहे हाल. एके संगे खेलल आ एके संगे खाइल शुुरू हो गइल. उपर से नीतू सुरसती के सखी कहे लगली. दूगो लइकियन के बीचे सखी के जवन नाता बने ला ओकर ओजन मित्र भा दोस्त शब्द से जादे होला. अब दूनू जानी एक दोसरा के नाम ना धरे लोग. सखिए कही के बोले बोलावे लोग. दूनू जानी के संघत देख के मास्टरो साहिब लोग बडा अघात रहे लोग. बातो अघाए के रहे. मास्टरे अइसन परानी होला जेकरा नजर में सब लइका-लइकी बराबर होले. ना केहू छोट ना बढ़ ना केहू ऊँच ना नीच.

समय के पखेरू उड़त जात रहे. मैट्रिक के परीक्षा दूनू जानी प्रथम श्रेणी में पास कइली. सुरसती के दस नम्बर बेसी रहे. एकर खुशी नीतू के जादे रहे, सुरसती के कम. सुरसती कहस कि हमनी दूनू सखी के एके बराबर नम्बरवा आइल रहित तब नू ठीक रहित. इ सुनके नीतू हँस पड़स.

कहल बा जे लइकन के दोस्ती त निभ जाला बाकिर लइकिया के दोस्ती ना निभे कारणो बा, लइकियन के भाग केकरा के कहंवा ले जाई ई त केहू ना जानेला काहे कि बेटी त पराया घर के धन होली. एने नीतू पढ़ी-लिखी के बीए पास कर गइली. ओने सुरसती जे पढे़ मे बड़ा तेजगर रहली सरकारी स्कॉलरशिप पाके खूब पढ़ली आ, पढ़ी लिखी के बीडीओ हो गइली. नोकरियों में बड़ा नाम आदर पवली. उनकर दुल्हा शिक्षा विभाग के एगो लमहर हाकिम रहलें. संजोग से एक दिन नीतू के इस्कूल में दोपहर के भोजन कार्यक्रम के जायजा करे ला उनका जाये के परल. नीतू के इ बात ना मालूम रहे जे सुरसती के दुल्हा शिक्षा विभाग के हाकिम बाड़े, बाकिर सुरसती बीडीओ हो गइल बाड़ी, इ बतिया नीतू जानत रहली.

आदमी के कवनो-कवनो बात के आभास अचके में हो जाला. आजू नीतूओं के बुझात रहे कि मन मेें, भोरही से ना जानी, कवनो हुलास छहाँड़ मरले बा. दिन सोहावन लागत बा. आउर सबकर बतिया मीठ. ठीक ग्यारह बजे एगो भारी-भरकम गाड़ी इस्कूली में पहुँचल. गाड़ी से एगो अफसर नियर बेकती उतरलें आउर उनका पहिले उनकर अरदली. एगो अउरी अदमी उतरल, ओकरा हाथ में फाइल अउर डायरी रहे, बुझात रहे जे हाकिम के पीए होखे. बाकिर खासियत त इ रहे कि गाड़ी से अफिसर नियन लागत एगो जनानियों उतरली. पहिले त केहू ना बुझल कि उ के हई, तनिका नगीचे अइली त नीतू के मुँह खुलल रह गइल. हिया में खुशी आउर आँखी में लोर, अजबे हाल भइल जात रहे नीतू के ना बुझात रहे कि का बोलस. पहिले त सकुचइली बाकिर धीरे से कहली, ‘सखी!’ एतना कह के अबही आगे बढ़े के चहली कि सरसती तपाक से उनका के अँकवारी में भर लेहली. दूनू जानी के दोस्ती के दम से आँखी में जवन लोर भरल रहे उ बतावत रहे कि दूनू जानी के परान एक दोसर में केतना बसेला.

ओने शिक्षा अधिकारी जी इस्कूल के कागज पतर जाँचे में लाग गइली एने दूनू जानी अपना अपना जिनिगी के कथा कहानी एक दोसरा के सुनावे में लाग गइली. नीतू के दूबराइल देखके सुरसती पूछ बइठली, ‘ए सखी! आखिर एतना काहे दुबराइल बानी, काहे इ हालत बा?’
नीतू दबले मन से बतवली कि उनकर बिआह गाँव के बगल के पंचाइत में एगो धनी-मनी घर में बाकिर बेरोजगार से हो गइल. एगो लइको बा. ना जानी जे ओ लइका के भाग में का बा? ओकरा बपसी के कवनो कमाई-धमाई त बा ना, खेतिए के आसरा बा. ले दे के हम जे कमाई ले उ हमरा दवाईये बीरो में लाग जाला. डाक्टर बतवात बाडें जे किडनी में खराबी बा, एकर इलाज बड़ा मँहगा बा. चाहे त किडनी बदलाई ना त जान जाई. अब हमरा लगे कवनो उपाय त बा ना. हमार बाबूजी के गाँव में केहू से पटल ना. जिनिगी भर ऊँचे-नीच करत अपने त भगवान के सिधार गइनी बाकिर हम ओकर भोग भोगत बानी. माई बेमारे रहत बाड़ी. आउर हमार हाल इहे बा. अब त भगवान नू मालिक बानी.’ एके साँस में जब कुल्ह कह गइली त सुरसती उनका के बाँही पकड़ले धीरज बन्हावे लगली. एही बीचे उहाँ ओह लोगन के पुरनका दू गो गुरूजी लोग आ गइले. सभे सुरसती के चिन्ह के आ उनके पद के जान के बड़ा आनन्दित भइल लोग. सुरसती जब गुरूजी लोगन के पवलगी कइली त गुरूजी लोगन के हिया जुड़ा गइल. संस्कार के कवनो गाछ ना होला ना बाजारे में बिकाला. इ त विचार के पूंजी हऽ जवन आदमी के माटी से सोना बना देला. शिक्षा अधिकारी जी जाँच पड़ताल के बाद जब आफिस से निकलनी त सुरसती उनके परिचय नीतू से करवली कहली कि इ हमार सखी हई. ई जान के अधिकारी जी बड़ा खुश भइनी बाकिर नीतू के बेमारी के बारे में जान के उहों के दुखा गइली. नीतू के समझा बुझा के दूनू जाने गाड़ी में बइठे गइले. नीतू अपना सखी के हाथ पकड़ के सुसकत रहली आ कहली कि, ‘ए सखी! जाईं भगवान चइहें त फेरू भेंट होई ना त हमार हालत देखते बाडू.’ सुरसती ए बात के सुनत फफक-फफक के रोए लगली. रवीन्द्रर बाबू आनी कि सुरसती के दुल्हा एने नीतू के समझावत त ओने सुरसती के. अपना सखी नीतू ला सुरसती के आँख में जवन लोर रहे ओकरा के पढ़ल बड़ा कठिन लागत रहे.

ओने गाड़ी बढ़त जात रहे नीतू के करेज बइठल जात रहे. लोर सुखे के नावे ना लेत रहे. इहे सचकी दोस्ती हऽ! जवन जात-पात ऊँच-नीच, छोट-बड़ के भेदभाव से बहुत उपर होला. कृष्ण सुदामा के मितई के कथा जे अमर बा तऽ एही भावे अमर बा.

नीतू के हालत दिने-दिन बिगड़ले जात रहे. ओने घरे चहुँप के सुरसती बस नीतू के इयादे सुतस आउर जागस. उनका के उदास देखी के एक दिने रवीन्दर बावू पूछनी कि ‘सुरसती! बताव जे आखिर नीतू ला का कइल जाव.’ सुरसती कहली जे ‘इ त डॉक्टरे बतइहें बाकिर हमरा मन में जवन बा, ओकरा ला राउर आज्ञा जरूरी बा. हम चाहत बानी एगो किडनी अपना सखी के दान दे के उनके जान बचाईं.’ रवीन्द्रर बाबू इ बात सुनके पहिले त अचकलें बाकिर सुरसती के अपना सखी ला त्याग भाव देख के आ उनकर बात सुनके उनका आँखी में लोर भर गइल. आ कहलें ‘धन बाडू सुरसती आ धन बा तोहर दोस्ती. सचहूँ तू महान बाडू. हमार भाग बा जे तोहरा नियर हमार दुल्हिन मिलल. अइसने विचार से इ दुनिया चलत बा. चलऽ आजुए डॉक्टर से सलाह लिहल जाव.’

आखिर उहे भइल. नीतू के आपन एगो किडनी दान देके सुरसती उनकर जान बचा लिहली. बाकिर इ घटना जब नीतू के हित परीत सगा सम्बन्धी लोग जानल त पहिले उ सभे मुँह करवाहिन कईल काहे कि एगो दलित के अंग एगो सवर्ण के देह में लागल इ घोंटाते ना रहे. दोस्ती जात-पात से बहुते उपर होला. आज नीतू के सखी देखा दिहले रहली. बाद में सभे सुरसती के त्याग के बड़ाई करे लगलें. काहे कि साँच के सोर पताल में होला. मानवता से बड़ कवनो रिस्ता-नाता ना होला. आज सगरे सुरसती को जयकार होखत रहे. नीतू के बचवा जब अस्पताल में मउसी कह के सुरसती के गोदी में सट गइल त सुरसती के लागल कि उनकर हिया जुड़ा गइल बा. ओमे नीतू के धीरे-धीरे होस आवत रहे एनेे समय के देवाल पर दूनू सखी लोगन के कहानी अपना रंग में अउरी गाढ़ भइल जात रहे.


डा॰ गोरख प्रसाद मस्ताना, वरिष्ठ साहित्यकार

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