भईया बूझलन पियाज भउजाई बूझली अदरख. ना, ना. ई बतवला के कवनो जरूरत नइखे कि ई कहाउत सही ना ह. असल कहाउत दोसर ह, मियाँ बूझलें पियाज, मिंयाइन बूझली अदरख. हमहूं जानत बानी कि असल कहाउत का ह बाकिर पिछला दस दिन से जवन बकतूत आ गलथेथरई सुनत सुनत कान पाक गइल बा ओकरा बाद हिम्मत नइखे कि असली कहाउत कह दीं. पता ना कब एकरा के ले के कवनो बवाल खड़ा हो जाव. उ जमाना दोसर रहे, तब के नेता लोगो दोसर रहे जे मजाक बूझत रहुवे, कार्टून पर कड़कड़ात ना रहुवे. अब त बेबात के बात पर बकतूत करत गलथेथरई करे लागत बा लोग. बतकुच्चन आ बकतूत में सबले बड़का फरक इहे होला कि बतकुच्चन बाते के कूचेला, बेबात के ना. जबकि बकतूत कहल जाला कुतरक के आ गलथेथरई ओहू ले बढ़के होला काहे कि ओकरा में कवनो तर्क ना होखे बस गाल बजा के जीते के कामना होला. गलथेथरई करे वालन के कवनो तर्क, कवनो तरीका से कवनो संबंध ना होखे. आजु के पोसुआ मीडिया खास कर के एह तरह के गलथेथरई में लाजवाब बन गइल बा.

खैर छोड़ीं एह सब के. चलीं लवटल जाव ओह कहाउत पर जवना के आजु का राजनीतिक हालात में हम बदल के, पोलिटिकली करेक्ट बन के, कहले बानी कि भईया बूझलन पियाज भउजाई बूझली अदरख. कहाउत सामाजिक हालात दरसावेला आ समाज अपना बरियारन पर तंज न कसे, मजाक ना करे. बाबू साहब लोग पर कहाउत बनी त कहल जाई कि एक त बाबू साहेब, दोसरे जवान, तिसर प होखे तीन सौ मन धान त मुकदमा ना लड़ीहें त करीहें का. बाकिर अगर समाज के कमजोरकन पर कहाउत बनी त ओहिजा कवनो हिचकिचाहट ना होखी ओकरा के नीचा देखावे में. एही से समय का साथे कहाउतो के भाषा, शब्द चयन बदलत रहे के चाहीं. अइसनके एगो कहाउत ह कि मँसखोर का सरपला से डाँगर ने ना मूए. एहू कहाउत में हम असली जाति सूचक शब्द का जगहा मँसखोर के इस्तेमाल कइले बानी. एह बदलाव से कहाउत के मतलबो ना बदलल आ पोलिटिकली करेक्टो रहि गइनी. आजु का जमाना में सबले कमजोर देश के बहुसंख्यक जमात बा जे अपने सिरफुट्टुवल में आपने नुकसान करे में लागल बा. एह चलते अधिकतर राजनीतिक गोल ओकर अनदेखी करे में, ओकरा भावना के ठेस चहुँपावे में लागल बाड़ें. ना त रामसेतु भा राममंदिर पर राजनीति करे के बेंवत केकरो ना होखीत. संतोस बस अतने बा कि हालात कुछ कुछ बदले लागल बा. ना त भर जिनिगी हिन्दू विरोधी राजनीति करे वाला आदमी अपना के कर्मकांडी हिंदू साबित करे खातिर अतना बेचैन ना होखीत. कारसेवकन पर गोली चलवावे खातिर वाहवाही लूटे वाला नेता जी ई ना कहतन कि उनुका कारसेवकन पर गोली चलववला के अफसोस बा.

आ अब जब एतना राजनीति बतियाइए लिहनी त काहे ना फर्ज आ फर्जीओ पर कुछ कह सुन लिहल जाव. फर्ज कब फर्जी बना दिहल जाई आ फर्जी बनवला के कब लोग आपन फर्ज बना ली ई केहू तय से ना बता पाई. सोचे वाला बात बा कि आखिर कइसे फर्ज आ फर्जी अतना अगल बगल आ गइल कि एक दुसरा में पलटे लागल. कवनो फर्द बयान पर आपन फर्ज निभावे वाला के फर्जी मुठभेड़ के दोषी बना दिहल जाव केहू ना बता सके. रउरा त बस अतने जान लीं कि फर्द कागज के टुकड़ा भर होला. कागज के पन्ना पर लिखल फर्दबयान के कतना तरजीह दिहल जाव?

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