अजगर

– संतोष कुमार

BhorBhinusar
गाँव के गाँव लील रहल बा
नीमिया के छाँव
पानी के पाँव
कुल्ही लील गइल
अजगर.

भले ओकर नाम शहर बा
बाकिर ओकरा मे बड़ा जहर बा
जहर बा छल कपट के, दुराव के, तनाव के
विष बा धोखा के, चपलूसी के, बिखराव के
उजड़ गइल गाँव गोरी के माँग नियन
विधवा के मुंह लेखा
सुखल, पाकल, झुराइल.

बचल बा अब नावे के हमार गाँव
ना भोर के लाली बा
ना चाँदनी के छाली बा
फाटल दुध नीयर
मौसम के रंग बा
ना ताल तलैया
ना मोहन के बँसुरी.

अब तऽ
गाँव में जियत बा लोग नावे के
सब कर टंगाइल बा ससरी
जानु लागल होखे फँसरी
गाँव के चमक तऽ
समा गइल अजगर के पेट में
जवना के भूख कबो ना ओराला
भले अदमी ओरा जाय.


(संतोष कुमार के भोजपुरी कविता संग्रह ‘भोर भिनुसार’ से)

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