डॉ. हरेश्वर राय सियासी छेनी से कालिमा तरासल बिया I चांदनी हमरा घर से निकासल बिया II भोर के आँख आदित डूबल बा धुंध में I साँझ बेवा के मांग जस उदासल बिया II सुरसरी के बेदना बढ़ल बा सौ गुना I नीर क्षीर खाति माछरि भुखासल बिया II कोंपलनपूरा पढ़ीं…

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– ऋचा चलऽ, फेरु सपनन के फेंड़ लगाईं जा ! मउरल-दनात अमराई से अलगा सड़की का गुलमुहरन का नीचे लुकवा दीं जा कूल्हि पुरान योजना हरियर सुतरी अस लटकत सहजन का झोंप में बान्हि आईं जा आपन चाह-चिन्ता जवन होई, तवन होई आवऽ रेंगनी का काँटन से लथरल जथारथ मेंपूरा पढ़ीं…

– आनन्द संधिदूत जब आँगन का बीच में डँड़वार आ खेत का बीच में सड़क निकललि त खेत क बगड़ी आँगन का गउरइया किहें आके कहलसि कि लऽ ए बहिनी तोहके त आराम हो गइल एक बखरी से दू बखरी हो गइल दूनो ओर दाना-दूनी, जूठ-कांठ गिरी आ तोहार बालपूरा पढ़ीं…

आनन्द संधिदूत एही दीयर में बा हमरो खेत क एगो छोट-मोट टुकड़ा जवन हम देखले नइखीं। ओही खेत क गोजई-रहिला जब हमरा आँगन में गिरे त हमार माई ओइसहीं खुस हो जाय जइसे कवनो लइका खेलवना पाके अगरा जाला ऊ कुछ झारे कुछ झूरे कुछ कूटे कुछ पीसे कुछ अँगऊपूरा पढ़ीं…

– डॉ. हरेश्वर राय हमार सान ह हमार पहचान ह भोजपुरी, हमार मतारी ह हमार जान ह भोजपुरी। इहे ह खेत, इहे खरिहान ह इहे ह सोखा, इहे सिवान ह, हमार सुरुज ह हमार चान ह भोजपुरी। बचपन बुढ़ापा ह, इहे जवानी चूल्हा के आगि ह, अदहन के पानी, हमारपूरा पढ़ीं…

– तारकेश्वर राय जोगीरा सा रा रा रा … राब गुर त भेटाते नइखे, महंग भइल चाउर ।। बी.पी.एल. के कारड लेके, झनकऽ का करबऽ आउर ।। जोगीरा सा रा रा रा … का करबऽ भोपाल जाके, कइसे तोड़बऽ मायाजाल के ।। रंग अबीर ढोल आ चंग बा, होली कपूरा पढ़ीं…

– तारकेश्वर राय देख ए बाबू, सुनऽ ए भाई देशवा हमार जरऽता । कहीं बस, कहीं कार, केहू खुनसे में बरऽता ।। सद्बुद्धि छोड़ छाड़ के, मनई धावऽता । कइसे कहीं ए भइया, कि फगुवा आवऽता कुछ खुरचलियन के फितरत देखीं । समाज के टुकड़न में, बटत छीटात देखीं ।।पूरा पढ़ीं…

– तारकेश्वर राय पुरनकी पतईया, फेड़वा गिरावे । जइसे गिरहथ, कवनो खेतवा निरावे ।। नइकी पतइया बदे, जगहा बनावे । जाए के बा एक दिन, इहे समझावे ।। चइती फसलिया, बा गदराइल । लागत फगुनवां, बा नियराइल ।। सरसो पियरकी से, खेतवा रंगाइल । अमवाँ मउराइल, महुवा मोजराइल ।। चारुपूरा पढ़ीं…

गीतकार- लाल बिहारी लाल स्त्री स्वर- सांवरिया आ जइतऽ एक बार अंखियाँ कब से राह निहारे, नैना तरसे हमार सांवरिया आ जइतऽ एक बार…. पानी बिन मछरी के जइसे, तड़पी रोज पिया तोहरे याद मे बेसुध होके, भटकी रोज पिया दिने-दिन प्यास बढ़त बा, लागे ना जीया हमार सांवरिया आपूरा पढ़ीं…

– शिलीमुख जेकरा पर बा तोहके नाज ओकरे से बा बिगरत काज ! अँइचा के ऊजर ना लउके आन्हर के सूघर ना लउके सब बाउर, नीमन कुछ नाहीं ओकरा के बस गद्दी चाहीं जाति-बरग में भेद बढ़ा के सुबिधा-शक्ति-अफीम चटा के जतना चाही लूटी खाई खुरचुन के परसाद खियाई। पुहुतपूरा पढ़ीं…

– डॉ. कमल किशोर सिंह सुन्दर सरोबर हो कि कौनो पंक दल-दल , पता केकरा बा कि कहँवा खिली एगो कमल शतदल। कठिन बा ई कहल केकर कहँवा होई प्रसुति घर। रोडसाइड, बाथरुम भा साफ़ सुथरा हॉस्पिटल, झोपड़ी झाड़ी महल , कारावास आकि अस्तबल हमेसा ई असंभव बा कहल किपूरा पढ़ीं…