– डॉ. कमल किशोर सिंह

उत्तर टोला बर तर,
बईठल चबुतर पर,
धनिया ढील हेरवावत रहे,
सुबुकत सब सुनावत रहे –
कतना दुःख सुनाईं बहिनी
ई ना कभी ओराला,
आ धमकेला दोसर झट से
जसहीं एगो जाला.

भादो में भोला के कसहूँ
गोडवा गइल छिलाय.
धान निकौनी करत रहलन ,
टेटनस गइल समाय.
जबड़ा जकड़ल, देहिया अकड़ल,
धर लिहलस फेर छाती,
पटना पहुंचे से ही पहिले,
बुतल उनुकर बाती.

पुनिया के पुतर कॉलेज से
कइलस  बी ए पास.
बहुत दिन से घरे बइठल
बबुआ भइल उदास.
खोजत रहे सगरो बाकी
कहूँ ना मिलल ओकरा नोकरी.
एक दिन चढ़  ऊपर गर्दन में
हाय! लगा लिहलस खुद फसरी.

छट्ठीये के दिन  झुनिया के
बचवा गइल जम्हूआय.
स्तन, बोतल, सितुही से दूध
सब लेलीं आज़माय.
झार-फूंक, दवा सब कइनी,
बत्तको दिहनी बइठाय,
डाक्टर कतनो कोशिश कइलें,
बचवा गइल बिलाय.

रोजी रोटी खातिर –
गोबर गइलें गौहाटी.
साले भर में बाबू हमार
सूख के भइलें काठी.
गहना-गुड़िया बेचनी सबकुछ,
बेचनी गईया बाछी.
केहू कहे रोग टी. बी. के,
केहू कहे एच. आई. भी. के,
हमरा त लागत बा बहिनी
ई सब रोग गरीबी के.

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12 thoughts on “ई सब रोग गरीबी के”
  1. दिल छोडी अईनी घरवा , खुद रहेनी  परदेश !
    चिंता में डूबल मनवा , कौनो ना मिलल सन्देश !
    केतना दिन भईल  कौनो चिठ्ठी  ना आईल !
    सोची सोची के   बिरह    में   मन घबराईल !
    केकरा से जा के कहीं  अब  दिल के  कलेश !
    घरनी  त  घर में   बाड़ी    हम बानी बाहारा!
    का करिहन उ जब दिल में उठी लाहारा !
    ख़त लिखे  आवेना अब   के भेजी उपदेश !
    भसुर ससुर ही सब आस     पास बाडन ! 
    देवर    ननद केहू अबो  ना  पढ़े जालन !
    दिल के हाल के अब लिखी सोच उठे कलेश ! 
    बाबूजी से कहनी  मोबाइल      ना लियायील !
    गाँव में केहू के कौनो फोन ना खरीदायील !
    केकरा से कहाँ कहीं कौनो दिल के सन्देश !
    गाँव में अनेकों  ही    मंत्री आवेलन जालन !
    कवनों विकास के आधार ना   रखवावेलन !
    वर्मा दुनिया आगे गईल   पीछे  हमार देश !
    दिल छोडी अईनी घरवा , खुद रहेनी  परदेश !
    श्याम नारायण वर्मा 

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