– नूरैन अंसारी

आजकल काहे लोगवा खुद से नाराज लागत बा.
बड़ा बदलल-बदलल सबकर मिजाज लागत बा.
लोग मवुरा के बिगड़ले बा मुहवा के रौनक,
बुझाता हंसला पर कौनो बेयाज लागत बा.
अपने घर में लोगवा काटत बा बनवास,
गरज के मारल इ पूरा समाज लागत बा.
लोग जिअत बाटे जिनगी बिना बिधि-बिधान के,
तनी-तनी बात में डॉक्टर के इलाज लागत बा.
दिल के रिश्ता के मरम कहा बुझत बा केहू,
हाथ मिलावल बस रश्म -रिवाज लागत बा.
कहा जात बाटे हे भगवन तहार इ संसार,
जहा बेकार में लोग के पूजा नमाज़ लागत बा.


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