नाता जोरे भर नेह

– डाॅ. अशोक द्विवेदी


आज फजिरहीं बहरा निकलते झमरझम बरखा से सामन भइल. राजधानी घंटन बरखा से नहात रहे. गाँवे़ं फोन लगाइ के एगो सँघतिया से टोह लेहनी त पता चलल कि उहाँ बादर क नाँवे-निशान नइखे. परसों तनी मनी सीति चाटे भर पानी परल रहुवे. हुड़ुक भउवे कि धान त गइल. दइबो, सरकारे लेखा चीन्हि चीन्हि के रेवड़ी बाँटत बा !

हमनी का पूर्वांचल में त चीन्हि-चीन्हि के रेवड़ी बँटला के रेवाज ढेर दिन से चलल आवऽता. उहाँ क सरकारे अइसन बा. हमनी किहाँ भक्ति आ पूजा-परसादी तनी ढेरे चलेला. सूखा मे़ं हरिकीर्तन; बरखा में हरिकीर्तन. एक लेखा ई कीर्तन असरा जियावे आ सपना पुरावे क उतजोग ह. जथारथ चाहे जतना डरावन, कुरूप भा त्रासद होखे, नाँव-सुमिरन आ कीर्तन में भुला जाईं. देवियो देवता लोग खुशामद पसंद हवे. ऊपर से हमन क डेराभुत मनोभाव, कीर्तन मे़ मन भुलवा लीं. जब देविये देवता क ई हाल बा त मंत्री, नेता आ नोकरशाह काहे ना करी ? ऊ अपना चेलन आ पछलगुवन के छोड़ दोसरा के काहे सुनी ? जब भगवाने का सोझा अइसन अनेत, अधरम आ अन्याय होत बा त अदिमी के कवन बिसात ? अइसे पुरान पोथी पतरा आ शास्त्र बेद से प्रमान ईहे मिलेला कि अधर्म,असत्य के पक्ष बहुत सजोर आ बरियार होला बाकिर साँच आ धर्मो के पाटी में कम्मे सही जूझे-मरे वाला बटुराइये जालन. आज काल्ह के जथारथ तनी बदलल बा. बाकि साँच के पक्षो में लोग लउकि जात बाड़न.

बात बरखा के होत रहल हा नू ? हमनी का परंपरा मे़ पावस ऋतु के एगो अलगे महातम बा. बरखा ना त जीवन ना. तँवाइल-तड़फड़ाइल धरती आ जीव एही ऋतु में जुड़ाइ के हरियराला आ पनपे बढ़ेला. माघ आ मेघ दूनों अकथ आ अनिर्वच मनालन स. इनहन के समझे-कथे मे़ कतने कवि लोगन क जिनिगी गुजरि गइल. माघ आ मेघ के देखे खातिर सौन्दर्य-दृष्टि चाहीं. नाता जोरे भर नेह चाहीं, बिलगाव ना लगाव चाहीं.

कालिदास त माघ के मास्टरे रहलन बाकि ऊहो मेघ के महातम बूझि के आ ओकर निहोरा कइलन, ओके अइसन दूत बनवलन कि ऊ सगरी आर्यावर्ते घूमि आइल. रामगिरि का टेकड़ी प बिलमल मेघ क हिया अनुनय आ निहोरा से अइसन पसिजल कि ऊ यक्ष के दूत बन गइल. नात जोरे भर नेह जतावल काम क गइल. ओघरी से लेके आजु ले दुनिया आ ओमें रहे वाला जीव जंतु केतना बदल गइल कि प्रकृति आ ओकरा ऋतुचक्र के वाहक मेघ क भाव-सुभाव ठीक से ना समझि पवलस. कतनो कयास लगवलस अपरिचिते पवलस. बदलाव का तेज रफ्तार में हमनी का त बदल गइनीं जा बाकि मेघ स्वतंत्र आ अमाने रहल. पहिलहूँ गरजत तड़पत-बरिसत निकल जाव आ आजुओ.

ई त हमनी क आपन फितरत आ कल्पना ह कि कबो ओसे नाता तूड़ लेनी आ कबो जोरि लेनी जा. हमनी के मनसा ओकर उपभोगे करे भर ले बा. असलियत ईहे बा कि ऊ आपन काम करत बा आ हमन आपन करत बानी जा. कालिदास के वेदना आ चाह मेघ से आत्मीय संबंध बनावे क उतजोग जरूर कइले रहे. यक्ष के विरह पीर से मोक्ष दियावे खातिर ऊ मेघ से धरती के बन परबत, नदी, मैदान, खेत खरिहान से भरल प्रकृति परिक्रमा करावत कैलासपति क पूजन अर्चना कर देले रहलन. पृथिवी पर अनेकता आ विविधता का जथारथ से परिचित करावत मेघ के माध्यम बनवला के ई पुरान नाता ए माडर्न जुग का रेलम रेल आ ठेलम ठेल में कहाँ निबाहल जाता ? मेघो सोचत बा कि चलऽ “जइसन तोहार मनसा तइसन सिद्धि!” अपना भाखा में कहीं त “जइसन तहार खेत-खरिहानी (देन-दुवारी) तइसन मोर चरवाही !”

त भइया हो हमनियों के जरूर सोचे के चाही़ं कि मेघ हमनी क करजा नइखे खइले, ना ऊ बन्हुवा मजूरे ह! हमहन ओसे जतना पावल चाहत बानी जा ओतना उतजोग भा कोसिस कइले बानी जा ? ओतना मजूरी नइखे जुटत त बदरा के पोल्हावे -परिकावे आ ओसे नाता जोरे भर नेह त देखावहीं के परी !

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