– डा. अशोक द्विवेदी

ashokdvivedi
दिल्ली फजिरहीं पहुँच गउवीं. तर-तरकारी कीने क बेंवत ना बइठुवे त सोचुवीं आलुवे-पियाज कीनि लीं. दाम पुछते माथा घूम गउवे. साठ रुपिया किलो पियाज रे भइया. हम सोचुवीं..”बकसs ए बिलार ,मुरुगा बाँड़े होके रहिहें !” इहाँ देखुवीं कि पियाज बेछिलले रोवावत बा. पियाज पैदा करे वाला पहिलहीं रोवत-रोवत चुपा गइल बाड़े सs. हाय रे जमाखोरी, हाय-हाय रे महँगाई. केकरा से पूछीं, कहवाँ फरियादीं? आमे आदमी के सरकार बा. आमे आदमी अब आन हो चलल बा.

का जमाना आ गइल ए भइया? इहवाँ चोरे चोर-चोर चिचियाता; भ्रष्टाचारी, भ्रष्टाचार का बिरोध में अनशन प बइठ गइल बा. घोटालन क सरदार घोटाला पर भाषन देबे लागल बा. कुकुरे चाम के रखवार बा ! दाल के पुछहीं के का जब ऊ करिये में सीझे लागल ! हाय रे हमार सोना क देश, लोग सोना छोड कोइले प टूट परल.

कहीं बाढ़ कहीं सूखा आ कहीं अतिवृष्टिये जान मरले, डहले-डहकरले बिया. हमनी का गाँव का ओर छोट किसान जियका जोगाड़त, बेटहल क टहल नधले बा. ओकर पढ़ल-लिखल लड़िका नोकरी खातिर गाँव-शहर छिछियाता आ एइजां व्यवस्था “कींचड़-फेंक-गेम” में फँसल बिया. देश के संसद टुकुर टुकुर तिकवत बिया कि कब जनप्रतिनिधि जगिहें स, आ देश के, देश का लोगन का भलाई खातिर बतकही -बहस करिहे़ सँ. कुछ राहत मिलित कुछ रोजी रोजिगार क बात होखित, कुछ बेवस्था सुधरित. बाकि ना, इहवाँ त डमकच होता.

जन प्रतिनिधि अपना ड्यूटी से गायब बाड़े सs. हमनिये का नू उन्हनी के चुनले बानी जा. उनहन लोगन क कवनो जिमवारी बा कि ना ? हम सोच कहि के थाकि गइलीं. तनी रउवों सब सोचीं ! कुछ करीं कि जिनगी के गाड़ी डगरो, कुछ बोईं कि आगा काटल जाव. तबहिए नू आवे वाली पीढ़ि के जिनिगी सँवरी.


डा. अशोक द्विवेदी भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के संपादक आ प्रकाशक हईं.
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