कुमरपत – देश के समस्या के सोर : बाति के बतंगड़ – 18

– ओ. पी. सिंह


अब बतंगड़ ले के आगा बढ़ीं ओह से पहिले जरुरी लागत बा कि कुछ बतकुच्चन करत चलीं। काहे कि हो सकेला कुछ लोग कुमरपत आ सोर के सही मतलब ना समुझ पावे। आ जब सोरे झुरा जाई त पतई कइसे निकली ?

सोर आ शोर जइसन शब्दने का चलते भोजपुरी में देशज शब्दन के तत्सम करे से कई बेर मने कइल जाला। देश के देस लिखीं भा देश। एहसे कवनो फरक नइखे पड़े के। बाकिर शंकर के संकर भा शोर के सोर लिख देब त मतलब बदले के अनेसा बन जाई। तेज आवाजन के घेलमेल से शोर बन जाला। आ पेड़-पौधन के जड़ सोर कहल जाला। सोर माने जहां से शुरुआत भइल। एकरा के स्रोतो से जोड़ सकीलें। स्रोत बिगड़ के सोत हो जाला बाकि सोता झरना भा सीरत बहे वाला पानी के कहल जाला। बहे के त कई बेर आँखिन के लोरो सोता जइसन बहे लागेला जइसन नोटबंदी का बाद कुछ लोग का आँखिन से बहे लागल बा। गइल माघ दिन उनतीस बाकी वाला अन्दाज में 50 दिन में से 30 दिन से बेसी निकल गइल बा बाकि कतार छोट नइखे होखत, बढ़ले जात बा। सकल पदारथ एही जग माहीं, लउकत बा पर ठेकत नाहीं। तनखाह खाता में चहुँप गइल बाकि खाता में के रुपिया चहुँप का बाहरे बा।

अब आईं कुमरपत पर। एक लाइन में कहे के होखे त कहल जा सकेला कि देश के समस्या के सोर कुमरपते में लुकाइल बा। देश के राजनीति के वर्गीकरण करे के होखे त ओकरा के समाजवाद-बाजारवाद, बँवारा-दवाँरा से ओतना बढ़िया से ना समुझल जा सके जतना कुमरपत का आधार प। देश में दुइये तरह के राजनीतिक गोल बाड़ी सँ – कुमरपत वालन के आ बे-कुमरपत वालन के। कुछ गोलन के मलिकाई ओह हाथन में बा जिनकर कुमरपत हो गइल बा। आ कुछ गोलन के मलिकाँव ओह हाथन में बा जिनकर कुमरपत नइखे भइल। शब्दन के खासियत होले कि इस्तेमाल होखेला कि रगड़ाई से ओहनी के रुप बदले लागेला आ कुछ दिन बाद अंदाजा ना लागे कि एह नयका शब्द के सोर कहवाँ से आइल बा। कुछ जगहा त कुमरपतो बिगड़ के कुँहरउत भा कोहँरत हो गइल बा। बाकि कुमरपत हमरा हिसाब से बेसी सही लागेला।

कुमरपत माने कौमार्य-पतन। कबीलाई जिनिगी में कौमार्य-पतन के बहुते महता रहत रहे आ जिनकर कौमार्य-पतन हो जाव उनुका दण्ड का रुप में भा जश्न का रुप में भोज देबे पड़त रहुवे। उहे कौमार्य-पतन के भोज आजु ले हमनी का परम्परा में जीयत बा आ बिआह का दिने कुमरपत के भात खियावल जाला। लड़िका के बिआह में लड़िकन के आ लइकी का बियाह में लइकियन के। एहसे ऊ भात खाए वाला लोगो जान जाला कि अगिला नम्बर उनुकर हो सकेला।

कुमरपत के एह विश्लेषण का बाद सभे जान गइल होखी कि देश के राजनीति कवना कवना गोलन का हाथे बा। कुछ लोग के कुमरपत उतर गइल बा आ ओह लोग के राजनीति अपना पर-परिवार आ नात-कुटुम्ब ले सिमट के रहि गइल बा। कुछ लोग कुमरपत के मौका मिलला का बादो आपन कुमरपत ना होखे दीहल। कुछ लोग के कुमरपत पता ना कहिए आ कव बेर हो गइल बाकि ऊ आजुवो अपना कुमरपत से इन्कार क देलें भा क देली। एहिजा केहु के निजी जिनिगी में ताक-झाँक करे के इचिको मनसा नइखे बाकि बाति के खासियते होला कि जब निकले लागेला त दूर ले जाए के अनेसा बनि जाला।

आजु राजनीति का एक छोर प संघ काबिज हो गइल बा आ दोसरा छोर प सभे एकजुट हो के पलड़ा झुकावे का कोशिश में लागल बा। आ अगर पलड़ा नइखे झुक पावत त बस एही चलते कि संघ के कमान वइसनका लोग का हाथे बा जिनकर कुमरपत नइखे भइल।

अब रउरा कवना खेमा के हईं से त हम नइखीं जानत बाकि जिनकर कुमरपत हो गइल बा से जानत होखी कि ऊ टीवी के चैनल ना बदल सकसु आ बे-कुमरपत वाला पूरा देश के नोट बदलवा दिहलसि !

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