बतिया पंचे के रही बाकिर खूंटवा रहिए पर रही – बतंगड़-84

गाँव के एगो रंगदार आपन भईंसिया सड़के पर बान्हत रहुवे. आवे जाए वाला लोग ओकरा से परेशान रहलन. आखिर पंचइती बइठल आ कहल गइल कि बाबू तू आपन भईंस कहीं अउर बान्हल करऽ आ रहिया पर से खूंटवा हटा ल. रंगदार कहलसि कि पंचन के फैसला सिर माथे बाकिर खूंटवा त ओहिजे रही. वइसने कुछ हाल आजु काल्हु देश का पंचन का साथे हो रहल बा.
कुछ चालाकी से, कुछ सरकारी गोल के बझा सोझा के पंच अइसन राह निकाल लिहलें जवना से तय हो गइल कि अब से पंचे तय कइल करीहें कि के पंच बनी आ एह मामिला में ना त जनता जनार्दन कुछ कहि सकेले ना सरकार. तब के सरकार अपना घोटालन में अइसन अझूराइल रहल कि ऊ पंचन से रार लेइए ना सकत रहुवे. पंच लोग नयका कायदा से अपना लगुआ भगुआ नाते रिश्तेदारन के भरे लगलें. केहू केहू के बेटा त केहू केहु के दामाद. सभे कवनो ना कवनो पंच के रिश्तेदार भा कबो कबो सरकारी गोलो के बझवले राखे खातिर ओकरा से जुड़लो लोग के चुनाए लागल.
एक जमाना से चलल आवत एह सिस्टम से हालात अइसन बनि गइल कि जनता के चुनल सरकार जनता का फायदा खातिर कुछ करे चले त सात गो अड़ंगा ले के पंच तइयार भेंटइहें. हद त तब हो गइल कि एही पंचन में से एगो चौकड़ी सरपंचे का खिलाफ बगावत कर बइठलें. होखल त चाहत रहल कि एह चौकड़ी का खिलाफ अभियोग लगावल जाइत बाकिर चौकड़ी के इशारा पा के, भा जेकरा इशारा पर ऊ चौकड़ी काम कइलसि, ऊ देश के विरोधी गोल सरपंचे का खिलाफ अभियोग लगावत कूद पड़ल मैदान में.
देश के नियम कायदा बनावे वाला लोग अइसन ताना बाना बुनले रहलें कि तीन गो बरियार खंभा पर ओकरा के टिका दिहलें. चउथका खाना खाली देखि के मीडिया ओहिजा आपन कान्ह लगा दिहलसि. अब विधायिका आ न्यायपालिका संगे कदमताल करत मीडिया, खास क के टीवी वाला, अइसन चक्रव्यूह रचलसि कि पता ना कतना अभिमन्यु एहमें घेरा के मरा गइलें. अब बदलल हालात में टीवी मीडिया के जजमानन के खेवा खरचा त निकलही लागल, कई जने मीडिया से निकलि के विधायिका में आ गइलें. कार्यपालिका त हमेशा से तेज तर्रार रहल बा. ऊ हर हालात में अपना कमाए खाए के इन्तजाम खोजिए निकालेला.
बाकिर आजादी का बाद पहिला बेर अइसन सरकार आइल जवना के मुखिया के अपना परिवार के चिन्ता कबो ना रहल. दसियन बरीस मुख्यमंत्री रहला आ चार बरीस से देश के प्रधान मंत्री रहला का बावजूद उनुकर माई, मेहरारु, भाई, भतीजा, परिवार, ससुराल सभे आम आदमी के जिनिगी जीयत बा. दोसरा तरफ देखीं त बिना कवनो धंधा कारोबार कइले नेहरू-गाँधी-लालू-मुलायम परिवारन का लगे खरबों के संपति होखे के बाति कहल जाला. बेटा-बेटी-दामाद देखते देखते अकूत संपति वाला हो गइलें. अगर कवनो एक बात पर अगिला चुनाव में फेरु मोदी सरकार के जितवावे ला होखे त इहे एके गो बाति बहुत बा. बाकिर कांग्रेस समेत सगरी विपक्ष उनुका के घेरे बान्हे में लागल बा. मीडिया आ न्यायपालिका का सहारे फेरु विधायिका पर काबिज होखे के हर जतन हो रहल बा. ई लोग नइखे चाहत कि सरकार न्यायपालिका में क्षेत्रीय संतुलन बनवा सके, अनुसूचित जाति जनजाति के प्रतिनिधित्व दिलवा सके. अगर कॉलेजियम के हर सलाह बिना ना नुकुर कइले मानिए लेबे के बा त न्यायपालिका सीधे अपने बहाल कर लीहल करे, सरकार का लगे प्रस्तावो भेजला के जरुरते का बा.

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