बापे पूत परापत घोड़ा, बहुत नहीं त थोड़ा थोड़ा (बतकुच्चन 162)

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बापे पूत परापत घोड़ा, बहुत नहीं त थोड़ा-थोड़ा. इहाँ ले कि जेकरा बारे मे कहल गइल कि ‘डूबल बंश कबीर के जमले पूत कमाल’ उ कमालो एह कहाउत प ठीक बइठेले. हालांकि कबीर के हर बात के उलटबाँसि बतियावत कमाल के कहना रहे कि ‘बाचल बंश कबीर के जे जमले पूत कमाल’. अब एह बहस में हमरा पड़े के ना त मनसा बा ना जरूरत. मनसा माने हीक माने इच्छा. मन के इच्छा खातिर हीक के इस्तेमाल खूब होला. हीक भर खइला भा खियवला के बात खूबे सुने के मिलेला. एह इच्छा कइला के हीकत भा हीकल दुनू कहल जाला. बाकिर तनिका फरक राखत. जइसे कि केहू हीकत रहे आ सामने वाला ओकरा एह हीकला से परेशान रहो. अपने मन कछु अउर है बिधना के कछु अउर. अब हम कवनो बात ला हीकत रहीं बाकिर अगर बिधाता के हमार हीकल पसंद भा मंजूर ना होखे त हमरा हीक के कवन मोल.

बाति तनि बहकि गइल जइसन कि हरमेस होत रहेला. कहे के कुछ अउर शुरू करीलें आ बीचे में कवनो अइसन बाति आ जाले कि मुद्दा छूट जाले आ बाति के बानि दोसरा तरफ निकलि जाले. अब फेर उहे हो गइल. बानि आ बान ला संस्कृत के शब्द ह वाणी आ वाण. हर बाति के वाणी ना कहल जाव. वाणि ओही बात के कहाला जवन बान जस कवनो मकसद के निशाना बनावे ला कहल गइल होखे. सतसइया के दोहरे अरू नावक के तीर देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर. कबीर आ रहीम के दोहा अगर आजु ले देश समाज याद रखले बा त एहीसे कि ओह दोहन में कहल बात सामाजिक समस्यन पर वाण लेखा चोट करेले. बाति दोसरा तरफ निकल गइल बाकिर एहू ला सोचत बानी कि निकसल के इस्तेमाल काहे ना कइनी. निकलल आ निकसल दुनू एके तरह के गतिविधि ह बाकिर निकलला के मकसद कहीं अउर ले गइल होले जबकि निकसला में निकसले मकसद रहेला कहीं अउर गइल ना. हालांकि निकलला आ निकसला का बाद कहीं ना कहीं जाहीं के पड़ेला.

लवटत बानी फेरू बापे पूत पर. अइसने एगो कहाउत ह ‘जइसन रहलऽ हो कुटुम्ब, तइसन पवलऽ हो कुटुम्ब’. आदमी जइसन खुद होला उ आपन संगी सघतिया ओइसने खोजेला. मिलल त मिताई ढेर दिन ले रही ना त बीचे में कवनो तिताई का चलते संबंध टूट जाई. बहुत दिन से एगो दामाद के चरचा होखत रहे. बाकिर तब केहू के मन में ई खयाल ना आइल कि ‘जइसन रहलऽ हो कुटुम्ब तइसन पवलऽ हो कुटुम्ब’. बाकिर अब लागत बा कि छोटका मियाँ के चरचा अनेरे भइल बा एह कहाउत में कि ‘बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभानअल्लाह’. कहे के चाहत रहे कि ‘छोटे मियां त छोटे मियां, बड़े मियाँ सुभान अल्लाह’. काहे कि दामाद से तनिको कम ना रहली सासु. अलगा बाति बा कि दमदा का खिलाफ बोले ला बोल देत रहे लोग बाकिर सासु के नाम लेबे में सभकर साॅस रुके लागत रहुवे. अब जब सासु आ सार के कारनामा सामने आइल बा त लागत बा कि ‘को बड़ छोट कहत अपराधु’. अलग बात ह कि बड़ सार के सार होखला का बावजूद सार ना कहाव.

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